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आज से नवरात्र शुरू हो चुके है। यानी की नारी शक्ति की आराधना, विधिवत व्रत और पूजन वाले त्योहार की शुरुआत। याद रहे कि ये ‘नारी शक्ति’ का ताल्लुक़ जीती-जागती नारी से नहीं बल्कि मूर्ति-मंदिर वाली ‘देवी शक्ति’ से है। नवरात्र भारत के हिंदू धर्म में नौ दिनों तक चलने वाला एक त्योहार है जिसे सदियों से लेकर आजतक हम इसे मनाते है। ‘हम’ माने महिलाएँ। वो महिलाएँ जिन्हें सूरज ढलते ही घर से बाहर निकलने में डर लगता है। ‘डर’ किन्हीं जानवरों से नहीं बल्कि ‘पुरुषों’ से, वो पुरुष जिन्हें पितृसत्ता में बक़ायदा तैयार किया गया है। वही पुरुष जो कभी-कभार नवरात्र में व्रत रखते, हमेशा पंडाल में सत्ता चलाते और ‘जय माता दी’ के साथ-साथ ‘तेरी माँ की’ कहते दिखते है।  

ऐसे में अगर ये कहूँ कि भारत विडंबनाओं और विरोधाभासों का देश है तो ग़लत नहीं होगा। अब इस नवरात्र की तहें खोलें तो इन विडंबनाओं की मिसाल हम साक्षात देख सकते हैं, जब देवी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम करते पुरुष मंदिर में या पूजा पंडाल में महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते। या फिर अपने घर की महिलाओं पर कभी हाथ उठाकर तो कभी उनका साथ देने की बजाय ‘इज़्ज़त’ और मर्यादा का हवाला देकर उनपर हज़ारों पाबंदियाँ लगाते है।

ऐसे में जब भी नवरात्र शुरू होने के एकदिन पहले या इन नौ दिनों तक हिंदी के अख़बार देखती हूँ तो शुरुआती के पन्नों में महिला-हिंसा, बलात्कार और उत्पीड़न की ढेरों खबर पटी होती है, लेकिन आख़िर के दो-तीन पेजों में बक़ायदा ‘माँ दुर्गा’ की तस्वीरों के साथ देवी के विशेष स्वरूप का बखान करते हुए नवरात्र में व्रत कैसे करें, पूजन कैसे करें और इस दौरान किन बातों का ध्यान रखें वग़ैरह-वग़ैरह का विशेषांक भी होता है। ये क्रम नौ दिनों तक एक जैसा चलता है, न तो महिला हिंसा की ख़बरें कम होती है और न नवरात्र में नारी शक्ति का बखान करते लेख। ये सब देखकर महसूस होता है कि अपना भारत देश भी ना कितना कमाल का है, यहाँ संदर्भ, आदर्श, दर्शन, विचार और संस्कार सब भूलकर प्रतीकों को हमेशा याद रखा जाता है। शायद यही अपना असली धर्म है, जो हमारे घरों, मोहल्लों से लेकर मीडिया-संस्कृति हर पहलुओं में रचा-बसा है।

‘हिंसा’ और ‘नारी शक्ति पूजन’ को ढोती औरतें  

ग़ौरतलब है कि जिस देश की अधिकतर जनता ‘नारी शक्ति’ के नामपर बने इस नवरात्र में भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करती है, उसी देश में अपने जन्म से लेकर मौत तक औरतें कन्या भ्रूण हत्या, बाल-यौन शोषण, बलात्कार, लैंगिक भेदभाव, दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा जैसी तमाम हिंसाओं से जूझती अपने नामपर बने इन तमाम पर्वों का बोझ ख़ुद उठाती है। फिर बात चाहे व्रत की हो, पूजन की हो या घर में फलहार के इंतज़ाम की हो ये सारा भार महिलाओं के हिस्से होता है। यही तो है अपने देश में पूजा का मतलब। धर्म का सारा ठीकरा महिलाओं के नामपर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में देवी-देवता का इससे कोई वास्ता नहीं और सबसे ज़्यादा महिलाएँ असुरक्षित।  

जिस दिन पंडाल या मंदिर की मूर्ति का नहीं बल्कि दफ़्तर में बैठी और घरों में सांस लेती औरत का सम्मान होगा उस दिन नवरात्र की भक्ति सार्थक होगी।

समाज के इन दोहरे चेहरों को देखकर लगता है कि औरत का सिर्फ़ वही स्वरूप पूजनीय है जब वो मूर्ति हो, मंदिर में विराजमान हो, शेर पर सवार हो, उसके हाथों में तलवार-कृपाण-धनुष-बाण हो या फिर उसे जीते-जी जलाकर सती कर दिया गया हो। या यों कहूँ कि जब वो धर्म का बोझ ढोते-ढोते मर चुकी हो। क्योंकि हमारे यहाँ तो साँस लेती, जीती-जागती, सोचने-बोलने वाली, पढ़ने-बढ़ने वाली और अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीने वाली औरतों के हिस्से सिर्फ़ हिंसा होती है। वो हिंसा जो उनपर पितृसत्ता करती है, क्योंकि ये औरतें उन्हें चुनौती देती है।

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मूर्ति वाली ‘शक्ति पूजन’ से नहीं बल्कि हर ‘नारी’ के सम्मान से भक्ति होगी सार्थक

मैं नवरात्र के विरुद्ध नहीं हूँ, बल्कि मैं विरुद्ध हूँ इसके विचार और सरोकार के बीच पड़ी फाँक से। ‘समय बदल रहा है या बदल चुका है।’ अक्सर कहते हैं हम, पर महिलाओं के संदर्भ में अभी कुछ नहीं बदला है, क्योंकि इस बदलाव की ज़िम्मेदारी भी हमने महिलाओं के कंधे डाल दी है। हम चाहते है कि महिलाएँ ही पढ़ें-समझें और इन सबसे उबरे। लेकिन अब इस विचार को बदलने की ज़रूरत है। अब इसमें हमें पुरुषों की भागीदार भी तय करनी होगी।   

क्योंकि जिस दिन पंडाल या मंदिर में बैठी मूर्ति का नहीं, दफ़्तर में बैठी और घरों में सांस लेती औरत का सम्मान होगा, जिस दिन शेर पर बैठी दुर्गा का नहीं बल्कि साइकिल पर जा रही लड़की या अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीती लड़कियों को ‘समानता’ की नज़र से उसके अधिकारों का सम्मान किया जाएगा तो उस दिन देश में नवरात्र के त्योहार में भक्ति के अलावा सार्थकता का भी रंग होगा। इसके साथ ही, अख़बारों के विशेषांकों में ‘पुरुषों’ को केंद्रित कर नवरात्र या किसी भी पर्व के नियम और पूजन-विधि को प्रकाशित किया जाए। क्योंकि पितृसत्ता की जड़ें कई स्तर पर सदियों से पैठ जमाए हुए है, ऐसे में उनके अलग-अलग स्तर पर व्यवहारिक परिपेक्ष्य में ख़त्म करने की ज़रूरत है। इसलिए हमारी मीडिया और संस्कृति को भी पुरुषों को संवेदनशील और लैंगिक समानता का पैरोकार बनना होगा। बाक़ी हर साल की तरह इस साल भी ‘नारी शक्ति की आराधना’ के नामपर पुरुष ही इसे मना रहे हैं।  

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तस्वीर साभार : Twitter

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