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कंसेंट, यानी सहमति या रज़ामंदी। वो चीज़ जो एक यौन संबंध के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। दो लोगों की मर्ज़ी से बना संबंध ही यौन संबंध या सेक्स कहलाता है। पर अगर किसी को किसी भी तरह सेक्स करने के लिए मजबूर किया जाए तो उसे बलात्कार या रेप कहा जाता है। अब कंसेंट सिर्फ़ ‘हां’ या ‘ना’ तक सीमित नहीं है। इसके कई सारे पहलू हैं। अगर ‘हां/ना’ बोलने के बजाय कोई व्यक्ति चुप है तो क्या इस चुप्पी को कंसेंट माना जा सकता है? अगर किसी सोते हुए व्यक्ति के साथ सेक्स किया जाए तो क्या ये सेक्स हुआ या बलात्कार? अगर हम जिसके साथ सेक्स कर रहे हैं वो नशे में है, बेहोश है या उसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है तो क्या ये बलात्कार हुआ?

ज़ाहिर सी बात है कि कंसेंट का मुद्दा इतना आसान नहीं है जितना हम सोचते हैं। बलात्कारियों के लिए फांसी या कड़ी सज़ा की मांगें तो हम कर लेते हैं, लेकिन चूँकि हमें कंसेंट की समझ बहुत कम है, हम अक्सर खुद ही बलात्कारियों को छूट दे देते हैं ये सोचकर कि, ‘अरे, लड़की की भी तो मर्ज़ी थी।‘ ऐसी ही ग़लती एकबार हमारे देश के सबसे बड़े न्यायालय ने भी की थी, जिसका नतीजा ये हुआ कि संविधान में लिखे बलात्कार और यौन हिंसा के ख़िलाफ़ कानूनों को ही बदलना पड़ा। ये ‘मथुरा रेप केस’ था। आइए बात करते है इस रेप केस की।

1970 के दशक की बात है। महाराष्ट्र के गढचिरौली क्षेत्र के देसाईगंज ज़िले में एक आदिवासी लड़की रहती थी। उसकी उम्र 14 या 16 साल रही होगी। असली नाम कोई नहीं जानता, पर घटना के बाद अख़बारों ने उसे ‘मथुरा’ नाम दिया था।

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मथुरा अनाथ थी। उसके दो बड़े भाई थे, जिनमें से वो एक के साथ रहती थी। घर में दो पैसे आए इसके लिए लोगों के घरों में काम करती थी। एक घर में जहां वो काम करने जाती थी, एक औरत, नुशी भी काम करती थी। नुशी का एक भतीजा था, अशोक। वो अक्सर उस घर में आया-जाया करता था। मथुरा और अशोक की मुलाक़ात होती रहती थी और वो अच्छे दोस्त बन गए। धीरे-धीरे वो एक दूसरे से प्यार करने लगे और मथुरा ने अशोक को शादी के लिए ‘हां’ कह दिया। नुशी को भी ये रिश्ता मंज़ूर था और वो मथुरा कोअपनी बहू मानने लगी। मथुरा और अशोक के रिश्ते के बारे में पूरे गांव को पता चल गया। मथुरा के भाइयों को भी।

मथुरा के भाइयों को ये रिश्ता बिलकुल मंज़ूर नहीं था। उन्होंने पुलिस में अशोक के ख़िलाफ़ शिकायत की कि उसने मथुरा को अगवा करके रखा था और उससे वेश्यावृत्ति करवा रहा था। 26 मार्च 1972 को पुलिस ने मथुरा, अशोक और उनके परिवार वालों को थाने में बुलाया। सबसे पूछताछ करने के बाद पुलिस ने बाक़ी सबको घर भेज दिया पर मथुरा को रोककर रखा ये कहते हुए कि थोड़े और सवाल करने हैं। रात के साढ़े दस बज रहे थे। दो पुलिसकर्मी मथुरा को एक बंद कमरे में ले गए जहां एक ने उसका बलात्कार किया और दूसरे ने उसे ग़लत तरीके से छुआ।

हम अक्सर खुद ही बलात्कारियों को छूट दे देते हैं ये सोचकर कि, ‘अरे, लड़की की भी तो मर्ज़ी थी।’

बलात्कारियों ने मथुरा को डराने की कोशिश की। उन्होंने उससे कहा कि थाने में जो भी हुआ, उसके बारे में किसी को बताए न। पर मथुरा आसानी से डर जाने वालों में नहीं थी। उसने अपने भाइयों और रिश्तेदारों को सब बताया और उन्होंने कोर्ट में जाने का फैसला किया। स्थानीय सेशंस कोर्ट में ये केस 1 जून 1974 तक चला। जज ने फैसला सुनाया कि मथुरा के बलात्कारी निर्दोष हैं, क्योंकि मथुरा की मेडिकल जांच से पता चला है कि वो वर्जिन नहीं है। घटना से पहले भी उसने मर्दों के साथ यौन संबंध बनाए थे और न्यायालय के मुताबिक़ इसका मतलब ये था कि ‘उसे सेक्स करने की आदत है और उसने पुलिसवालों के साथ भी अपनी मर्ज़ी से सेक्स किया है।’

न्यायाधीशों का ये शर्मनाक और बेहूदा बयान गुस्सा दिला देनेवाला था। केस की दोबारा सुनवाई के लिए बंबई हाईकोर्ट में अपील की गई। सेशंस कोर्ट के जजमेंट को ख़ारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा, ‘अगर पीड़िता डर या किसी और वजह से ना नहीं बोल पा रही तो उसे कंसेंट नहीं माना जा सकता। ऐसे में हम ये नहीं कह सकते कि उसने अपनी मर्ज़ी से सेक्स किया है।’ दोनों दोषी पुलिसकर्मियों को 1 और 5 साल की सज़ा सुनाई गई।

पर इसके बाद जो हुआ वो बिलकुल अप्रत्याशित था। साल 1979 के सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने फिर ये केस खोला। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सिंह, जस्टिस कैलाशम और जस्टिस कौशल ने बंबई हाईकोर्ट का फ़ैसला ख़ारिज कर दिया और ये फैसला सुनाया कि ‘लड़की को सेक्स करने की आदत थी और उस वक़्त दोनों पुलिसवाले शराब के नशे में थे। लड़की ने मौके का फ़ायदा उठाया और दोनों को सेक्स के लिए उकसाया। अपने प्रेमी के सामने मासूम बनने का नाटक करने के लिए ही उसने उन बेगुनाहों पर रेप का इलज़ाम लगाया।’

देशभर में तहलका मच गया। दिल्ली विश्वविद्यालय में लॉ के प्रोफेसर उपेंद्र बक्शी, रघुनाथ केलकर और लतिका सरकार ने पुणे की वक़ील वसुधा धागमवार के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को एक खुला ख़त लिखा। ख़त में उन्होंने इस फ़ैसले की कठोर निंदा की और कोर्ट से आग्रह किया कि इसे वापस ले लिया जाए। इसी दौरान इस फैसले के ख़िलाफ़ देशभर में कई महिला संगठन तैयार हो गए, जिनमें से एक था ‘फ़ोरम अगेंस्ट रेप’, जिसका नाम बाद में ‘फ़ोरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ़ वीमेन’ (FAOW) पड़ा।

मथुरा रेप केस ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर किया था कि ‘बलात्कार’ क्या है। कंसेंट का उल्लंघन कब और कैसे होता है। इसी के आधार पर नए क़ानून बने ताकि बलात्कार की पीड़िताओं की सुरक्षा बेहतर तरीके से की जा सके।

दबाव में आकर सुप्रीम कोर्ट फैसले पर पुनर्विचार करने को मंज़ूर तो हुआ, मगर जजों के मुताबिक़ मथुरा के पक्ष में फ़ैसला सुनाने के लिए कोई ‘locus standi’ नहीं था। यानी क़ानून की नज़रों में मथुरा पीड़िता नहीं थी और उसे अपने लिए इंसाफ़ मांगने का कोई हक़ नहीं था। उस समय रेप के क़ानून इतने मज़बूत नहीं थे और रेपिस्ट से ज़्यादा पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाते थे। इसलिए क़ानूनी तौर पर मथुरा पीड़िता थी ही नहीं, बल्कि दोषी भी ठहराई जा सकती थी।

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देशभर में नारीवादियों, वक़ीलों, लॉ अध्यापकों ने विरोध प्रदर्शन किया। संगठन बने। आलोचनाएं हुईं। पहली बार पूरा देश एक बलात्कार पीड़िता के साथ खड़ा हुआ था। उसे इंसाफ़ दिलाने के लिए आवाज़ उठाई थी। नतीजा ये हुआ कि इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 376 में चार नए विभाग, ए, बी, सी और डी जोड़े गए। इनके तहत अगर कोई भी पुलिसकर्मी, सरकारी कर्मचारी, या महिला/बाल संस्था या हॉस्पिटल का मालिक अपनी हिफ़ाज़त में किसी औरत को रेप करता है तो उसे 10 साल की सज़ा से लेकर उम्रक़ैद तक हो सकती है।

और भी बदलाव आए। ‘एविडेंस ऐक्ट’ में सेक्शन 114ए जोड़ा गया जिसके तहत “अगर पीड़िता ये कहती है कि उसने यौन संबंध के लिए हां नहीं कहा था, तो कोर्ट को इस बात का यक़ीन करना चाहिए कि उसके साथ ज़बरदस्ती की गई थी (अगर इसके ख़िलाफ़ कोई सबूत न हो तो।)”1983 में ‘क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट ऐक्ट भी आया जिसके तहत “अगर पीड़िता मानसिक तौर पर विचलित हो या वो नशे में हो और ऐसे में उसे यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया हो तो इसे बलात्कार माना जाएगा।”

मथुरा रेप केस ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर किया था कि ‘बलात्कार’ क्या है। कंसेंट का उल्लंघन कब और कैसे होता है। इसी के आधार पर नए क़ानून बने ताकि बलात्कार की पीड़िताओं की सुरक्षा बेहतर तरीके से की जा सके।

दुःख की बात ये है कि क़ानून चाहे कितनी भी बार बदला गया हो, समाज नहीं बदला है। देशभर में आज भी न जाने कितनी मथुराएँ हैं जिनका ताक़तवर पुरुषों के हाथों हर रोज़ उत्पीड़न होता है। जिन्हें अपने शोषण के लिए खुद दोषी ठहराया जाता है। और जो दुनिया को अपनी आपबीती बताने के लिए ज़िंदा ही नहीं बचतीं। संविधान तो हम बदल लेते हैं पर इसका फ़ायदा तब तक नहीं होगा जब समाज से इस बीमार मानसिकता को जड़ से उखाड़कर न फेंका जाए।

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तस्वीर साभार : cnn 

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