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आज का दिन भारतीय इतिहास में बेहद ख़ास है, क्योंकि आज एक इतिहास रचा गया, जब सात साल की लंबी लड़ाई लड़ने के बाद दिल्ली गैंगरेप की पीड़िता के दोषियों को सज़ा मिली। वहीं आज से नब्बे साल से भी पहले आज ही के दिन साल 1927 में भीमराव आंबेडकर की अगुवाई में महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ जिले के महाड स्थान पर दलितों को सार्वजनिक चवदार तालाब से पानी पीने और इस्तेमाल करने का अधिकार दिलाने के लिए किया गया एक प्रभावी सत्याग्रह था। इस सत्याग्रह का नाम था – ‘महाड़ सत्याग्रह’।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के द्वारा छुआछूत का अंत कर दिया है। लेकिन, क्या इस समाज से सचमुच छुआछूत का अंत हो गया हैं? ऐसा तो नहीं लगता । मार्च 2018 में बीबीसी एक रिपोर्ट छपी थी कि गुजरात के भावनगर जिले में एक दलित युवक युवक को इसीलिए मार डाला गया, क्योंकि वह घोड़ी पर चढ़ा था । यह बात सर्वण हिंदुओं को पसंद नहीं आया और उन्होंने उसे मार डाला। फरवरी, 2020 को राजस्थान में दलितों के साथ हिंसा हुई। वक्त बदल गया, आधुनिकता आ गई। लेकिन  हमारी सोच का विकास नहीं हुआ। जाति के नामपर भेदभाव और हिंसा की खबरों से अखबार भरे पड़े हैं। यों तो समाज के हित में सरकार जितने भी कानून बना ले। वे सब बेकार होंगे जब तक की यह समाज उसे नहीं स्वीकारता।

कानून तो है लेकिन वह समाज नहीं है जो उसका पालन करें। ऐसे में हमें याद आता है, महाड़ सत्याग्रह। साल 1923 में, तब के बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के द्वारा एक प्रस्ताव लाया गया कि वो सभी जगह जिनका निर्माण और देखरेख सरकार करती है ऐसी सभी जगहों का इस्तेमाल हर कोई कर सकता है। जिसे साल 1924 में बॉम्बे नगर निगम परिषद के द्वारा लागू किया गया।

यों तो ये बेहद साधारण-सा प्रयास दिखता है, लेकिन इस एक प्रयास ने उस दौर के भारतीय समाज के तथाकथित ऊँची जाति की संकीर्ण जड़ों को हिला दिया था।

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इस कानून की मदद से उन सभी दलितों साथ भी समानता की बात हुई, जिन्हें सदियों से उनकी जाति के आधार पर उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जाता रहा। इसका सर्वण हिंदुओं ने ख़ूब विरोध किया और इसे अमल में नहीं आने नहीं दिया।

तब इस सर्वण हिंदू समाज के खिलाफ और दलितों को उनका हक दिलाने के लिए  डॉ बाबा साहेब आंबेडकर ने दलितों के साथ मिलकर बॉम्बे में स्थित महाड़ नामक जगह को चुना दलितों के हक़ की लड़ाई की शुरुआत के लिए। उन्होंने निश्चित किया कि वे चवदार तालाब के पास जाकर उसका पानी पिएंगे, जो उस समय दलितों को निषेध था। इसके बाद आज ही के दिन बाबा साहेब आंबेडकर हजारों  दलितों के साथ मिलकर महाड़ के चवदार तालाब के पास गए, जहां सबसे पहले आंबेडकर ने अपने हथेली में तालाब का पानी लेकर पिया और फिर बाक़ी हजारों दलितों ने भी ऐसा ही किया। जिसे इतिहास ने महाड़ सत्याग्रह के नाम से जाना जाने लगा।

यों तो ये बेहद साधारण-सा प्रयास दिखता है, लेकिन इस एक प्रयास ने उस दौर के भारतीय समाज के तथाकथित ऊँची जाति की संकीर्ण जड़ों को हिला दिया था।

महाड़ सत्याग्रह एक ऐसा उदाहरण है, जिसने इस समाज को यह बताया कि सिर्फ़ क़ानून बनाने से कुछ नहीं होता बल्कि इसे अमल में लाने की जरूरत है। रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल करने की जरूरत है। वरना हम खुद शोषण का शिकार होते रहेंगे अगर हम आवाज नहीं उठाएंगे। अब इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य महाड़ सत्याग्रह के इतने सालों बाद भी आज भी हमारे समाज में भेदभाव के ख़िलाफ़ हम संघर्ष कर रहे हैं।

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तस्वीर साभार : sabrangindia

एक करुणा से भरा लेखक,जो इस समाज के लिए लिखता है।
पढ़ना जुनून हैं,केवल किताबें ही नहीं, लोगों को भी।

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