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‘फेमिनिज़्म’ एक विवादित शब्द है। हमारा समाज, ख़ासकर मर्द, इसे शक़ की निगाह से देखते है। फ़ेमिनिस्टों पर अक़्सर ये आरोप लगता है कि हम मर्दों से नफ़रत करते हैं। मर्द और औरत के बीच के रिश्ते को ख़त्म करना चाहते हैं और घर तोड़ना चाहते हैं। जब भी कोई लड़की ख़ुद को फ़ेमिनिस्ट कहती है तो उससे पूछा जाता है कि क्या वो मर्द-विरोधी है? औरतों के अधिकारों के लिए लड़नेवाले एक आंदोलन को ‘पुरुष-विरोध’, ‘पागलपन’, ‘नफ़रत’ जैसे तमगे दे देना भी पितृसत्ता की एक चाल है, ताकि औरतें दबी रहें और पागल या नफ़रती दिखने के डर से अपने हक़ की मांग न करे।

इसी तरह जब कोई औरत कुछ ग़लत बोलती या करती है तो मर्द उस औरत को नहीं, पूरे फ़ेमिनिस्ट आंदोलन को ही ग़लत बता देते हैं। चाहे वो औरत ख़ुद को फ़ेमिनिस्ट भी न कहती हो या चाहे फेमिनिज़्म उसकी बातों या व्यवहार का समर्थन भी न करता हो। उस एक औरत की ग़लती का इलज़ाम पूरे फ़ेमिनिस्ट आंदोलन पर ही लगता है।

यही हुआ रियलिटी शो ‘एमटीवी रोडीज़’ के ऑडिशंस के दौरान। एक पुरुष कंटेस्टेंट ने ऑडिशन देते वक़्त ये स्वीकार किया कि उसने एक बार अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड को थप्पड़ लगाया था। हुआ ये था कि वो जिस औरत से प्यार करता था, वो उसके अलावा पांच और मर्दों के साथ रिश्ते में थी। जब उसे पता चला तो उसने उन सारे मर्दों को एक जगह बुलाया और उन सबके सामने उस औरत को थप्पड़ मारा। उसने ये भी कहा कि इस औरत के साथ वो ‘और भी बहुत कुछ कर सकता था’ पर उसने बात थप्पड़ तक ही रहने दी। शो की जज, अभिनेत्री नेहा धूपिया से ये बर्दाश्त नहीं हुआ। गुस्से में उन्होंने उस कंटेस्टेंट से कहा, “सुन मेरी बात! अगर कोई औरत अपनी मर्ज़ी से बहुत सारे मर्दों के साथ संबंध बनाए तो वो उसकी पर्सनल चॉइस है! तुझे कोई हक़ नहीं है एक औरत पर हाथ उठाने का!”

नेहा का ये बयान इंटरनेट पर वायरल हो गया। इंटरनेट के मर्दों की प्रतिक्रिया ये रही कि फेमिनिज़्म और फेमिनिस्टों के मुताबिक़ अगर औरत मर्द को धोखा दे, उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करे तो वो उसका पर्सनल मैटर हो जाता है। पर इसकी वजह से अगर मर्द औरत को थप्पड़ भी मार दे तो वो गुनहगार हो जाता है। ट्विटर और फ़ेसबुक पर फ़ेमिनिस्टों को तरह-तरह की गालियां और बददुआएँ दी गईं और बात वहीं नहीं रुकी। नेहा को भी गंदी भाषा में अपमान सहना पड़ा और ट्रॉल्स की नफ़रत का ज़हर उनके पिता और उनकी बेटी को भी झेलना पड़ा।

फेमिनिज़्म ये कभी नहीं कहता कि औरतों की गलतियां माफ़ कर देनी चाहिए सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वे औरतें हैं।

ट्रोलिंग की सारी हदें पार हो जाने के बाद नेहा ने ट्विटर पर एक स्टेटमेंट दिया। उन्होंने कहा, “एक मर्द या एक औरत अपने रिश्ते में जो भी फ़ैसला लेते हैं, वो उनकी पर्सनल चॉइस है, चाहे ये फ़ैसला अच्छा हो या बुरा। पर चाहे फ़ैसला कितना भी बुरा हो। इसके आधार पर शारीरिक हिंसा को कभी भी जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। मैं इस बात पर कायम हूं कि चाहे कुछ भी हो जाए, किसी का शारीरिक शोषण करना कभी भी जायज़ नहीं हो सकता। ख़ासकर जब मर्द आमतौर पर औरतों से ज़्यादा ताक़तवर होते हैं और हमारे देश में मर्दों द्वारा औरतों का उत्पीड़न एक बहुत बड़ी समस्या है। मैं सबसे विनती करती हूं कि चाहे आप मर्द हों या औरत, घरेलू हिंसा के बारे में ज़रूर पढ़ें और अगर आप घरेलू हिंसा के शिकार हैं तो अपनी आवाज़ उठाने से डरे नहीं। आप अकेले नहीं हैं। ”

नेहा साफ़-साफ़ कहती हैं कि वो प्यार में बेवफ़ाई का समर्थन नहीं करतीं पर औरतों पर शारीरिक आक्रमण की भी निंदा करती हैं। और अपनी जगह वे सही भी हैं। क्योंकि माना कि उस औरत ने अपने पार्टनर का भरोसा तोड़कर बहुत ग़लत किया हो, इससे कहीं ज़्यादा ग़लत था उसे थप्पड़ मारना और सबके सामने उसे शर्मिंदा करना।

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भारत एक ऐसा देश है जहां हर तीसरी औरत घरेलू हिंसा की शिकार है। कम से कम 31 फ़ीसद विवाहित औरतों ने अपने पति के हाथों शारीरिक, मानसिक या यौन उत्पीड़न झेला है। ऐसे में अगर कोई मर्द टीवी पर आकर गर्व से कहे कि वो अपनी पार्टनर को पीटता है और अगर वो चाहता तो पीटने के अलावा और भी बहुत कुछ कर सकता तो इसपर गुस्सा आएगा ही। कोई भी समझदार इंसान, ख़ासकर अगर वो ख़ुद औरत हो, इसे बर्दाश्त नहीं कर पाएगा और उसकी प्रतिक्रिया बहुत भावुक होगी। एक रिश्ते की बुनियाद आपसी भरोसा होता है और इस भरोसे को तोड़ना रिश्ते के लिए ख़तरनाक होता है, ये बात सही है। लेकिन अगर दो लोगों के रिश्ते में किसी एक ने ऐसा किया है, तो उसको प्रताड़ित करके इसका हल नहीं किया जा सकता। रिश्ता भले ही टूट जाए और भले ही दूसरे के लिए मन में गुस्सा पैदा हो पर इस गुस्से को हिंसा में बदलने से रोकना बहुत ज़रूरी है।

कोई भी फ़ेमिनिस्ट किसी आपसी रिश्ते में धोखा देने का समर्थन नहीं करती, चाहे धोखा देनेवाला मर्द हो या औरत। फेमिनिज़्म ये कभी नहीं कहता कि औरतों की गलतियां माफ़ कर देनी चाहिए सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वे औरतें हैं। विरोध है सिर्फ़ इस ज़हरीली मर्दवादी मानसिकता के लिए, जिसके मुताबिक़ औरतों को उनकी ग़लतियों के लिए ‘सबक’ सिर्फ शारीरिक हमले के ज़रिए ही सिखाई जा सकती है। चाहे थप्पड़ मारकर या चेहरे पर एसिड उछालकर।

किसी का दिल दुखाना गलत है। पर उससे भी ज़्यादा गलत है हिंसा और प्रताड़ना। और अगर आपको ये ग़लत नहीं लगता तो शायद समस्या आपके अंदर है।

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तस्वीर साभार : ichowk

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