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कोविड-19 यानी कि कोरोना ने दुनियाभर में जैसे सबकी ज़िन्दगी ही रोक दी है। भारतीय इतिहास में शायद पहली बार सम्पूर्ण लॉकडाउन किया गया है। जनता कर्फ़्यू से शुरू हुआ ये सिलसिला 14 अप्रैल तक जारी रहेगा। लोग घरों में बंद हैं और सारा काम ख़ुद कर रहे हैं। काफ़ी हंसी मज़ाक वाले चुटकुले या मीम्स के ज़रिये ये संजीदा माहौल भी हल्का रखने की कोशिश जारी हैं।

आपको याद होगा उस जनता कर्फ़्यू के बाद शाम 5 बजे की तालियों से लेकर बर्तन बजाने तक के समय से किस तरह मध्यमवर्गीय परिवार प्रधानमंत्री जी के कहने पर बर्तन उठाये घर के बाहर तक निकल आये। उसदिन मेरे पास एक मेसेज आया था कि कल बालकनी में थाली बजाने की बजाय सभी ज़ोर से चिल्लाना ‘नो सीएए एंड एनआरसी’ मैंने ठीक वैसे ही किया। थालियों की गर्जन के बीच मैं चिल्लाई पर वो मेरी अकेली आवाज़ थी जो तालियों और थालियों के ज़ोर में गुम हो गयी। फिर भी मुझे ऐसा करने में बेहद ख़ुशी हुई। इसी बीच मन में ख़्याल आया कि जनता कर्फ़्यू के बाद ये थालियों के शोर में किस तरह सामर्थ्यवाद ने अपनी शेखी बघारी और न जाने कितनों ने तो पटाखे तक फोड़ दिए। ये लोग भूल गए कि  समाज में ओटिस्टिक लोग भी जीते हैं और विकलांग भी शामिल हैं वो लोग भी जिन्हें अक्युट एंग्जायटी होती है पैनिक अटैक आते हैं और घबराहट होती है तेज़ आवाजों से।

ये लोग भूल गए उन सबका दर्द जैसे प्रधानमंत्री ये बताना भूल गए कि ताली बजाने का ये विचार सबसे पहले इज़राईल से निकला और वहां पर तालियाँ तमाम मेडिकल से संबंधित स्टाफ़ के लिए बजाई गई। यहां भी तालियां बजी लेकिन तालियाँ बजाने के बाद बहुत से डाक्टरों को उनके किराए के घरों से बेघर तक कर दिया गया सिर्फ इस बात के कारण की कही मकान मालिकों का घर संक्रमित न हो जाए। ये एक दोमुहे समाज की निशानी नहीं तो और क्या है?

मर्दानगी को लगातार बघारते लोग

इन सभी थाली बजाने के वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब शेयर किए गये और कई ने कैप्शन लिखा गया कि ‘ये तालियाँ उन बहादुर नायकों के लिए जो युद्ध कर रहे हैं कोरोना के ख़िलाफ़ और इस जंग में सबसे आगे खड़े हैं, वो हमारे हीरो है!’ वग़ैरह-वग़ैरह। अब अगर मैं इस भाषा की गहराई में जाऊं तो ये दिखता है कि इसमें मर्दानगी की किस तरह शान दिखाई गयी जिसके तहत युद्ध संस्कृति की प्रकृति पर गर्व किया गया। इसके साथ ही, इन कैप्शन में किस तरह की विषमलैंगिक भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिसने सिरे से अन्य लैंगिक पहचानों को एक ही वाक्य में दर-किनार कर दिया।

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घर शोषण का पहला स्थान भी हो सकता है, इसबात को स्वीकारना हमारे समाज के बर्दाश्त के बाहर है।

विशेषाधिकारियों के लिए तो ‘सज़ा भी मज़ा’ है

यहां तक की लोगों के विशेषाधिकारों को भी गौर से देखा जाए तो वो ये एक दिन का जनता कर्फ़्यू ख़ुशी से मना रहे थे। माना की ये ज़रूरी है लेकिन मेन लैंड्स में आने वाले इन शहरों की ये सहूलियत थी कि इस कर्फ़्यू को उन्होंने मनाया। वहीं ब्राहमणवाद इस समय डंके की चोट पर खानपान की राजनीति में जुड़ा है। शाकाहारी भोजन का लगातार प्रचार किया जा रहा है और मांसाहारी भोजन खाने वालों को बुरी नज़रों से देख कर भेदभाव किया जा रहा है। सोशल डिसटेंसिंग की आड़ में छुआछूत जैसी कुरीतिओं को सही साबित करने की कोशिशों में लगातार मनुवादी दिमाग़ जुटे हुए है। ऐसे में लोगों को भड़काऊ मेसेज फ़ोर्वोर्ड करके छोटी सोच में तब्दील किया जा रहा है।

ये महानगर, इसबात को नहीं समझेंगे की अफ़्स्पा जैसे कानून जिन जगहों पर आज भी लागू हैं, उनके लिए ऐसे कर्फ़्यू आम बात हैं। शायद इसी विशेषाधिकारों ने इन महानगर के लोगों को ये सहूलियत दी है कि इस लॉकडाउन में वो लोगों से और आपस में सोशल मीडिया के ज़रिये कह रहे हैं कि ‘ध्यान लगाना चाहिए! किताबें पढ़नी चाहिए!’ इन बातों में कोई बुराई नहीं है, बस बात उन विशेषाधिकारों की है जो लोग नहीं देखते! ये एक ऐसी पूंजीपति सोच है जिसमें आपको कर्फ़्यू के दौरान बाहर निकलने पर सैन्य बलों द्वारा मार दिए जाने का डर नहीं है।  

श्रमजीवी, मज़दूर मिस्त्री वर्ग जिनके पास अपने श्रम से पैसा कमाने के अलावा और कोई चारा नहीं आज बेबस बैठा है कि जिससे या तो वो भूख से दम तोड़ देगा या फिर कोरोना के कारण। ऐसे में मध्यमवर्गीय उच्च्यवर्गीय लोग जो लगातार सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि ‘ख़ुद की देखभाल का समय है, सेल्फ़ केयर का समय है।’ काश वो इस समय में अपने जन्म से मिले विशेषाधिकारों पर ज़्यादा गौर फरमाएं।

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घर भी हो सकता है शोषण का पहला स्थान

इस 14 अप्रैल तक के लॉकडाउन के कारण क्वीयर समुदाय के लोगों की जीवनशैली पर कितना प्रभाव पड़ा है हम उसके बारे में सोच तक नहीं सकते। खासकर की वो क्वीयर लोग जिन्हें अभी तक अपनी इच्छाएं और पहचान अपने घर से छिपानी पड़ रही है और इस बोझ के साथ घर में घुटकर कैद रहना पड़ रहा है। ये पूंजीपति विषमलैंगिक पितृसत्तात्मक महानगरों के घरों में रहने वाले लोग नहीं समझ सकेंगे। इस तथ्य को स्वीकाराना भी हर किसी के लिए ‘ये घर-घर नहीं होता।’ सोचकर इसबात को गले से उतारना बेहद मुश्किल है।

वहीं घरेलू हिंसा से जूझ रहीं महिलाओं का घरों में लगातार इतने दिन उन व्यक्तियों के साथ रहना कितना कठिन है ये उनके बारे में फ़िलहाल कोई नहीं सोच रहा। ध्यान रहे कि कोरोना की तरह घरेलू हिंसा भी ‘विश्वमारी’ है इसे स्वीकारना विषमलैंगिक परिवारों के लिए मुँह छुपाने जैसा है। मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे लोगों के लिए भी ये समय बेहद मुश्किल है, जिन्हें दोस्तों का साथ कभी-कभी मिल जाया करता था। ठीक उसी तरह जैसे घरेलू हिंसा झेल रही महिलाओं को कुछ अपना खुद का समय मिल जाया करता था। घर शोषण का पहला स्थान भी हो सकता है, इसबात को स्वीकारना हमारे समाज के बर्दाश्त के बाहर है।

खैर मैंने इतना सबकुछ सिर्फ़ इसीलिए कहा क्योंकि मेरे और आप सभी के लिए ये कर्फ़्यू लॉकडाउन एक बड़ी नई और विचित्र सी चीज़ मालूम पड़ती है। पर वहीं कश्मीर कई सालों से कैद में है। ये कर्फ़्यू तो वहां की आम दिनचर्या जैसा है हर उस जगह का जहाँ सैन्यबलों की कड़ी निगरानी है। इसीलिए इस पूरे कर्फ़्यू के समय, गौर करिए और गिनिये अपने तमाम जन्मसिद्ध विशेषाधिकारों को जो आपको आपकी लैंगिकता, जेंडर, धर्म, जाति, जगह और वर्ग के कारण मिली है। थोड़ा ध्यान उसपर भी ज़रूर दीजियेगा, कोशिश करियेगा समाज को परत-दर-परत से पढ़ने की और समझने की।


तस्वीर साभार : indiatoday

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