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पूरा देश कोरोना वायरस की बला से जूझने की कोशिश कर रहा है। 24 मार्च को देशभर में लगे तीन हफ़्ते के लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ा दिया गया है और अस्पताल के कर्मचारी अपने सीमित संसाधनों की मदद से ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की मदद करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। देश संकट में है क्योंकि इस तरह की भयानक महामारी का सामना शायद इतिहास में हम पहली बार कर रहे हैं। इस वक़्त हमारा लक्ष्य होना चाहिए इंसानियत को बचाना। जाति, वर्ग, धर्म भुलाकर एक दूसरे के साथ खड़े होना और अपने देश को इस महामारी की चपेट से मुक्त करने में सहायता करना। पर हक़ीक़त से जिसका भी नाता है, वो यही कहेगा कि दूर-दूर तक भी ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा। सांप्रदायिकता, नफ़रत और अंधविश्वास हमारे समाज की जड़ों में हैं। हमारी नस-नस में इस तरह भरे हुए हैं कि इस तरह की एक आपातकालीन स्थिति में भी हमने मुस्लिम द्वेष फैलाने का मौक़ा ढूंढ लिया है। एक वैश्विक महामारी का इलज़ाम मुसलमानों पर थोपते हुए हम झिझक नहीं रहे।

हुआ ऐसा कि पिछले महीने की शुरुआत में दिल्ली के निज़ामुद्दीन में ‘तबलीग़ी जमात’ का कार्यक्रम रखा गया था। ‘तबलीग़ी जमात’ ये एक इस्लामी पंथ है और इसका वैश्विक मुख्यालय दिल्ली में स्थित ‘निज़ामुद्दीन मर्क़ज़’ है। ये कार्यक्रम या ‘इजतेमा’ 1 से 15 मार्च तक चला और इसमें लगभग 1500 से 1700 लोगों ने भाग लिया, जिनमें से बहुत लोग विदेशी भी थे। ध्यान रहे कि इस समय कोरोना वायरस के ख़तरे का आभास ज़्यादातर लोगों को नहीं था। ख़ुद केंद्रीय सरकार का ये कहना था कि ये कोई बड़ा ख़तरा नहीं है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी 17 मार्च से पहले इस तरह के सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों पर रोक नहीं लगाई थी। इसलिए ऐसा किसी भी हालत में नहीं कहा जा सकता कि इस इजतेमा ने किसी क़ानून या नियम का उल्लंघन किया हो।

पर जब बात सामने आई कि इसमें उपस्थित 24 लोग कोरोना-पॉज़िटिव पाए गए हैं, भारत में कोरोना फैलाने का पूरा इलज़ाम ही तबलीग़ी जमात पर लगा दिया गया। नैरेटिव इस तरह का बनने लगा कि अगर ये कार्यक्रम न हुआ होता, अगर देश-विदेश से जमाती एकत्रित न हुए होते तो आज भारत में ऐसी भयावह स्थिति पैदा नहीं हुई होती। तबलीग़ी जमातियों की निंदा के बहाने पूरे मुस्लिम समाज को ही निशाना बनाया जाने लगा और भारत में कोरोना वायरस फैलाने के लिए उन्हें ज़िम्मेदार ठहराए जाने लगा।

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ट्विटर पर ‘कोरोना जिहाद’ नाम का हैशटैग ट्रेंड होना शुरू हुआ। इस हैशटैग के अनुसार जमातियों ने इस समय ये कार्यक्रम जानबूझकर रखा था ताकि पूरे भारत में वायरस फैल जाए और ये देश अंदर से ख़त्म हो जाए। व्हॉट्सऐप पर भी झूठी ख़बरों की बौछार आ गई। एक वीडियो फैल गया जिसमें एक मुस्लिम फल विक्रेता फलों में थूक लगाता नज़र आता है और एक और जिसमें कुछ लोग थालियों और बर्तनों को चाटते नज़र आते हैं। संदेश ये था कि ये लोग खाना बेचने या परोसने से पहले उसे अपने थूक से गंदा कर देते हैं, इसलिए इस समुदाय से दूर रहिए। ये दावा झूठा साबित हुआ है। पता चला है कि पहले वीडियो में फल विक्रेता मानसिक रूप से बीमार है और दूसरे वीडियो के लोग दाऊदी वोहरा संप्रदाय के हैं, जिनके यहां खाने के बाद थाली चम्मच चाटने का रिवाज़ है ताकि खाने की बर्बादी न हो।

ये झूठ सिर्फ़ सोशल मीडिया पर फैल रहा है ऐसा नहीं है। ज़ी न्यूज़ उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड ने ख़बर चलाई कि यूपी के फ़िरोज़ाबाद में तबलीग़ी जमातियों ने उनकी जांच करने आ रही मेडिकल टीम पर पत्थरबाज़ी की। फ़िरोज़ाबाद पुलिस ने बयान दिया कि ऐसी कोई भी घटना नहीं हुई थी। ‘अमर उजाला’ ने ये दावा किया कि सहारनपुर में क्वारंटाइन किए गए जमाती खुले में शौच कर रहे हैं, जिसे सहारनपुर पुलिस ने अपने ट्विटर हैंडल पर झूठी ख़बर बताया। कन्नडा न्यूज़ चैनल ‘पब्लिक टीवी’ के रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक के भटकल में चार लोगों ने ‘धार्मिक कारणों’ की दुहाई देते हुए टेस्ट करवाने से इंकार किया,पर ऑल्ट न्यूज़ ने स्थानीय अधिकारीयों से बात करके पता किया कि ऐसी कोई घटना नहीं हुई।

जाति, वर्ग, धर्म भुलाकर एक दूसरे के साथ खड़े होना और अपने देश को इस महामारी की चपेट से मुक्त करने में सहायता करना। पर हक़ीक़त से जिसका भी नाता है, वो यही कहेगा कि दूर-दूर तक भी ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा।

आए दिन तबलीग़ी जमातियों द्वारा अस्पताल के कर्मचारियों के साथ बदतमीज़ी करने की खबरें आती हैं। इनमें से कुछ झूठी साबित हो चुकी हैं। एक वीडियो जिसमें एक आदमी नंगा घूमता नज़र आता है और जिसे ‘जमाती’ का दुर्व्यवहार बताकर शेयर किया जा रहा है, वो दरअसल पाकिस्तान से बहुत पुराना वीडियो है। अस्पताल में सिगरेट और शराब मांगने और नर्सों से अश्लील हरकत करने की ख़बरें भी आई हैं, जिनका कोई ठोस सबूत नहीं है। इन्हीं झूठी और आधी-अधूरी ख़बरों के आधार पर मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ ज़हर उगला जा रहा है। मुस्लिम-द्वेषी कार्टून छप रहे हैं। सोशल मीडिया पर मुस्लिमों के ‘संपूर्ण बहिष्कार’ का आव्हान करते हैशटैग चलाए जा रहे हैं।

जहां भारत में कोरोना वायरस फैलाने का पूरा इलज़ाम जमातियों और मुस्लिम समुदाय पर लगाया जा रहा है, वहीं कोई ये नहीं पूछ रहा कि 18 मार्च को आंध्र प्रदेश के तिरुपति में क़रीब 4000 श्रद्धालुओं की भीड़ क्यों थी? 22 मार्च को ‘जनता कर्फ्यू’ के दिन प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार तालियां और थालियां बजाने इतने लोग घर से बाहर क्यों निकले थे? हिंदू महासभा ने कोरोना को ‘भगाने’ के लिए गौमूत्र की पार्टियां क्यों रखी और बीते हफ़्ते इतने लोग हाथ में मोमबत्तियां लिए सड़कों पर क्यों आए थे? (वैसे ये भी प्रधानमंत्री की ही नसीहत थी।)

कोरोना वायरस एक बहुत बड़ा ख़तरा है पर इस ख़तरे का ज़िम्मेदार कोई एक समुदाय या वर्ग नहीं है। ये किसी इंसान द्वारा रचा ‘जिहाद’ नहीं बल्कि प्रकृति द्वारा फैलाई गई बीमारी है। इस बीमारी से मुक़ाबला करना है तो ज़रूरत है वैज्ञानिक और तर्कसंगत चिंतन की। डर, द्वेष और अंधविश्वास हम सबको ले डूबेंगे।

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तस्वीर साभार : aljazeera

 

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