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हाल ही में आए नागरिकता संशोधन कानून के चलते देशभर में एकजुट होते लोगों के समूह इस बात का सबूत हैं कि अब देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब में अलगाव लाना अंग्रेज़ों के समय जितना आसान नहीं है। पर क्या सचमुच स्थिति यही है? क्या नागरिकता संशोधन कानून हिन्दू-मुस्लिम एकता में फूट डालने की कूटनीति के सिवा कुछ भी नहीं? यह समझने के लिए नागरिकता संशोधन कानून के सभी पहलुओं को जान लेना बेहद ज़रूरी है। साथ ही उसका भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रेजिस्टर से जुड़ जाना किस तरह सरकार की इस्लामोफ़ोबिक मंशा सामने लाता है।

असम में ‘भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रेजिस्टर (एनआरसी)’

असम में एनआरसी का लागू होना एक असफ़ल प्रयास था। इस तथ्य से कोई भी राजनैतिक दल मुह नहीं मोड़ सका, बीजेपी भी नहीं। 19 लाख अमान्य नागरिकों की सूची में पूर्व राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद का परिवार भी शामिल है, अब इससे बदतर स्थिति और क्या हो सकती है। असम के अनेक मूल निवासी जो इतने सालों में तीन से चार दफ़े अधिकारियों को अपने कागज़ दिखा चुके हैं, वे भी अमान्य ठहराए गए। सिलचर, असम के बीजेपी विधायक दिलीप कुमार पॉल ने यह दावा किया है कि लाखों अवैध बांग्लादेशी मुसलमान एनआरसी का हिस्सा हैं।

साल1951 के असम में बढ़ते घुसपैठियों के खिलाफ़ एनआरसी लाया गया था। इतने साल में जिस योजना पर करोड़ों रुपए व श्रम लगा हो उसे उसकी खामियों के चलते तुरंत खारिज भी नहीं किया जा सकता। पर जो प्रयास अपनी नीतियों में इतना विफ़ल रहा हो और जिसमें अब भी सुधार की कितनी ही गुंजाइश हो उसे देशभर में लागू करना कहाँ का सुशासन है भला! देश में लगातार गिरती अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोज़गारी और औरतों के खिलाफ़ बढ़ते अपराधों से जूंझने के बजाए लाखों, करोड़ों अवैध प्रवासियों को नागरिकता देना सवाल का नहीं, शंका का विषय है।

असम के नागरिक आज भी अपनी संस्कृति और संसाधनों की सुरक्षा के लिए सीएए के विरोध में खड़े हैं। वे एनआरसी के परिणामों से निराश हैं पर एनआरसी को पूरी तरह से खारिज करने की स्थिति में भी नहीं है। वहाँ के लोगों के लिए घुसपैठिए सिर्फ़ घुसपैठिए हैं, हिन्दू-मुसलमान नहीं। ऐसे लोगों से अपनी संस्कृति को बचाने के लिए साल 1979 का असम आंदोलन सामने आया जिसका परिणाम था साल1985 का असम समझौता।

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क़िस्सा : नागरिकता संशोधन कानून का

सरकार का कहना है की यह कानून पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफ़ग़ानिस्तान में धर्म के आधार पर सताये गए अल्पसंख्यक लोगों के लिए है जो 31 दिसम्बर 2014 से पहले भारत में आ बसे। लेकिन इन लोगों में भी सिर्फ़ हिन्दू, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों को नागरिकता दी जाएगी। मुस्लिम धर्म का नाम यह कहकर नहीं लिया गया कि ये तीनों देश मुस्लिम प्रधान देश हैं जहाँ किसी भी मुसलमान व्यक्ति को धर्म के आधार पर ज़ुल्म नहीं सहना पड़ता।

यहाँ मुख्यतः दो पहलू हैं, पहला ‘धर्म के आधार पर सताये गए अल्पसंख्यक’ लोगों की पहचान किस तरह होगी? या किसी भी व्यक्ति के दिये गए धर्मों में से होने की पहचान? इस बारे में कानून कुछ नहीं कहता। क्या यह कानून दरअसल घुसपैठियों/आतंकवादियों को वैध रास्ता देने का एक माध्यम भर है? दूसरा पहलू यह कि भारत के उन मुसलमानों का क्या जो पीढ़ियों से यहीं रहते आए हैं पर कमज़ोर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के चलते नागरिकता साबित करने में असमर्थ हैं?

अगर वैध रूप से कोई व्यक्ति भारत का नागरिक बनना चाहे तो वह नागरिकता कानून के तहत ऐसा कर सकता था। नागरिकता कानून के समीकरण के माध्यम से यह अवसर प्रदान करता है जिसके मुताबिक़ भारत में 11 साल का प्रवास करके भी व्यक्ति इस देश का नागरिक बन सकता है। संशोधन इस ’11’ साल के प्रवास को घटाकर ‘6’ साल करता है जो कि 2014 से लेकर 2019 तक की अवधि है। यही कारण है कि 31 दिसम्बर 2014 की तारीख निश्चय की गयी।

देश में लगातार गिरती अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोज़गारी और औरतों के खिलाफ़ बढ़ते अपराधों से जूंझने के बजाए लाखों, करोड़ों अवैध प्रवासियों को नागरिकता देना सवाल का नहीं, शंका का विषय है।

देशभर में सीएए + एनआरसी

राष्ट्रीय नागरिक रेजिस्टर अगर देशभर में लाया गया तो बहुत मुमकिन है कि कई लोग असम की ही तरह रेजिस्टर की उस सूची में शामिल न किए जाएँ, जिन लोगों का नाम उस सूची में नहीं होगा वे अवैध प्रवासी माने जाएंगे पर उनमें भी कुल 6 धर्मों के लोग सीएए के तहत भारत की नागरिकता वापस पा जायेंगे। वे मुसलमान, नास्तिक या रह गए धर्मों के लोग जो किसी भी वजह से नागरिकता साबित नहीं कर पाये उन्हें बसे बसाये घरों से उठाकर डिटेनशन कैम्प्स में भेज दिया जाएगा। उस वक़्त यह बेहद मुश्किल होगा। आज देश भर में हो रहे प्रदर्शनों को दंगों का नाम दिया जा रहा है, लोगों से उनके हक़ छीने जाने पर, उनसे उनके घर छीने जाने पर क्या होगा?

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और देश के बुनियादी मुद्दे?

सीएए और एनआरसी को समझने की उधेड़-बुन ने देशभर को इस तरह उलझा दिया है कि अर्थव्यवस्था या रोज़गार या भूखमरी जैसी बुनियादी समस्याओं पर चर्चा करना तो क्या हमने विचार करना भी छोड़ दिया। सरकारी तथ्य लगातार आर्थिक मंदी के संकेत देते हैं। भारत की गिरती अर्थव्यवस्था पर न केवल पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने चिंता जताई बल्कि हाल ही में आईएमएफ़ की प्रमुख अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने भी भारत सरकार को जल्द से जल्द सही कदम उठाने की हिदायत दी है।

सरकार चाहती तो विशेषरूप से छह धर्मों का नाम ना लेकर केवल प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को संशोधन का हिस्सा बना सकती थी पर ऐसा ना कर ये हमें एहसास दिलाना चाहती है कि उसके पास हिन्दू-मुस्लिम विवाद को जन्म देने के ढेर सारे पैंतरे मौजूद हैं। क्या हुआ अगर राम मंदिर का फैसला हो गया, गैर-ज़रूरी मुद्दे कभी कम नहीं पड़ने चाहिए।

ऐसी परिस्थिति में जब भारत अपने ही नागरिकों को मूलभूत सेवाएँ देने में असमर्थ है, सरकार लाखों करोड़ों लोगों का ज़िम्मा अपने सर लेने को एक संशोधन कानून बनाती है। बात शरणार्थियों को जगह देने की ही थी तो ज़रूरी था कि शरणार्थियों के लिए एक नया कानून बनाया जाये। यही नीति दुनियाभर के देशों में अपनाई जाती है। नागरिकता कानून में संशोधन लाना साफ़तौर पर एक धर्म के खिलाफ़ सोची समझी साज़िश है, इस्लामोफ़ोबिक है।

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तस्वीर साभार : aljazeera