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बिहार का जातीय भेदभाव से बहुत ही पुराना नाता रहा है। जाति के नामपर लाशों का बिछना और अपना वर्चस्व स्थापित करना जातीय भेदभाव का एक बहुत ही पुराना तरीका रहा है। बिहार में ऐसे भी जाति व्यवस्था के नाम पर संहार और वाद-विवाद होते रहे हैं और आज भी वर्तमान राजनीति इससे अछूती नहीं है। बिहार राज्य के जहानाबाद जिले में स्थित लक्ष्मणपुर बाथे गांव में 1 दिसंबर 1997 में हुए जनसंहार को लोग आज भी जब याद करते हैं तो उनकी रूह कांप जाती है। इस जनसंहार में ऊंची जाति के लोगों की बनायी गई रणवीर सेना गिरोह के लोगों ने 58 लोगों को गोलियों से मार डाला था, जिसमें मरने वालों लोगों में 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी शामिल थे। साथ ही उन 27 महिलाओं में से करीब दस महिलाएं गर्भवती भी थीं। 

यह कितनी दर्दनाक बात है कि एक ज़िंदगी ने आंखें खोलने से पहले ही मौत को गले लगा लिया। वह भी एक ऐसी मौत जिसमें उस बच्चे का कोई कसूर नहीं था‌। शायद कसूर इतना ही रहा होगा कि वह एक निजी जाति में जन्म लेने वाला था। इस गांव में दलित समुदाय के साथ-साथ ओबीसी और सामान्य जाति के लोग रहा करते थे। इस गांव में रहने वाले दलित जाति के लोग ऊंची जातियों के ज़मीनों पर काम किया करते थे और अपनी रोज़ी-रोटी कमाया करते थे ताकि उनके परिवार की गु़जर-बसर आसानी से हो जाए मगर ऊंची जाति के लोगों को शायद उनकी खुशी देखी नहीं गई। 

कहा जाता है कि जब यह ऊंची जाति के लोग इन्हीं नीची जाति के लोगों के सहारे नाव पार करके उनके गांव पहुंचे वहीं पर उनके गांव को चारों तरफ से घेर के इस रणवीर सेना ने गोलियों की बौछार कर दी। जब तक लोग संभल पाते मौत का वीभत्स तांडव अपने परवाज़ पर था। खून से सनी मिट्टी जाति व्यवस्था पर रो रही थी। 

एक ऐसा विवश से भरा रूदन जिसमें कसूर किसका है, यह समझ में नहीं आ रहा था। हत्या और रक्त की प्यास इन हत्यारों पर इस कदर हावी थी की इन्होंने नदी पार कराने वाले नाविकों को भी नहीं बख्शा। हत्यारों ने तीन नावों में सवार होकर सोन नदी को पार किया और गांव में आ पहुंचे। उन लोगों ने सबसे पहले उन नाविकों की हत्या कर दी, जिनके सहारे उन्होंने नदी को पार किया था। इसके बाद हत्यारों ने भूमिहीन मजदूरों और उनके परिवार के सदस्यों को घर से बाहर निकाल निकाल कर गोलियों से भून डाला। तीन घंटे तक चले इस खूनी खेल में सोन नदी के किनारे बसे बाथे टोला गांव को उजाड़ दिया गया। इस हत्याकांड में कई परिवारों का नामो निशान मिट गया। यहां तक कि आज भी कई परिवार अपने परिजनों को याद करके सुबक उठते हैं।

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उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने गहरी चिंता जताते हुए इस हत्याकांड को ‘राष्ट्रीय शर्म’ करार दिया था।

इतने बड़े खूनी खेल को देखने के बाद लोगों के मन में रोष उभर चुका था। लोगों ने शवों का अंतिम संस्कार तीन दिन तक नहीं किया। 3 दिसंबर को जब राबड़ी देवी ने गांव का दौरा किया उस दौरान ही उन शवों का सामूहिक रूप से अंतिम संस्कार कराया गया। बिहार के इतिहास में यह एक काला दिन है क्योंकि जाति व्यवस्था के नाम पर लोगों से जीने के हक को क्रूरता से छीना गया। इस नरसंहार ने पूरे देश को हिला दिया था। हर आम नागरिक की आंखों में लक्ष्मणपुर बाथे गांव से जुड़े लोगों के लिए संवेदना साफ झलक रही थी। 

उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने गहरी चिंता जताते हुए इस हत्याकांड को ‘राष्ट्रीय शर्म’ करार दिया था। साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल समेत सभी पार्टियों के नेताओं ने भी इस हत्याकांड की घोर निंदा की थी। बिहार में 90 के दशक में पटना, गया, अरवल, जहानाबाद और भोजपुर जिले को लाल इलाका कहा जाता था। इसे लाल इलाका इसलिए कहा जाता था क्योंकि जाति व्यवस्था से मारे गए लोगों की आवाज़ उठाने के लिए इसका गठन किया गया था। इसे भाकपा माले ने तैयार किया था ताकि जमींदार किसी निचली जाति के लोगों के हक को ना मारे क्योंकि भूमिहार ज़मींदारों का कहना था कि ज़मीन हमारा पैतृक अधिकार है। 

कहा जाता है कि लक्ष्मणपुर बाथे गांव भूमिहारों के ही होते थे।‌ यहां रहने वाले छोटी जाति के लोग अपने आप को साबित करने के लिए बंदूक जैसे हथियारों को चलाने लगे थे और ऊंची जाति से लड़ने के लिए निचली जाति के लोगों ने भाकपा माले नाम का गठन किया था ताकि वे अपने हक और संघर्ष के लिए आगे आ सके मगर इन्हें नीचे रखने के लिए इनसे ऊंची जाति के लोगों ने रणवीर सेना का गठन कर दिया। ध्यान दीजिएगा यह वही रणवीर सेना है, जिन्होंने इस लक्ष्मणपुर बाथे गांव में संहार किया था।

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इस तरह से देखा जाए तो यह स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की लड़ाई हो सकती है मगर इस तरह लोगों की हत्या करना कहीं से सही कदम साबित नहीं हो सकता है। आज भी कई परिवारों की गोद सूनी है, उनके घर की खुशियां खतम हो गई है। आंखों में एक अजीब सी वीरानगी पसरी रहती है और उन आंखों में कई सवाल होते हैं, जिसके जवाब आज भी उन्हें नहीं मिल पाए हैं क्योंकि कोर्ट ने भी अपने फैसले में 

साल 2013 में सभी 26 अभियुक्तों को पटना की हाईकोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया है।  इस मामले में कुल 46 लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें से 19 लोगों को निचली अदालत ने ही बरी कर दिया था जबकि एक व्यक्ति सरकारी गवाह बन गया था। 

पटना की एक अदालत ने अप्रैल 2010 में 16 दोषियों को मौत की सजा सुनाई और 10 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। ज़िला और सत्र न्यायधीश विजय प्रकाश मिश्रा ने कहा था कि यह घटना समाज के चरित्र पर धब्बा है। बिहार में स्थिति आज भी ज़्यादा नहीं बदली है। भले ही रक्त पिपासा अभी शांत हुई है मगर लोगों के अंदर बसे जातिगत भेदभाव और ऊंच नीच की सोच में बदलाव नहीं आया है। बिहार को अभी इन सब चीज़ों से आगे निकलने में वक़्त लगना तय है।

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तस्वीर साभार : bbc

सौम्या ज्योत्स्ना बिहार से हैं तथा मीडिया और लेखन में कई सालों से सक्रिय हैं। नारीवादी मुद्दों पर अपनी आवाज़ बुलंद करना ये अपनी जिम्मेदारी समझती हैं क्योंकि स्याही की ताकत सबसे बुलंद होती है।

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