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भारत में नागरिकता के लिए संघर्ष की लड़ाई पुरानी नहीं है बल्कि इसका इतिहास से बड़ा ही गहरा नाता है। भारतीय भूमि पर अपनी पहचान के लिए लोग सालों से संघर्ष करते आ रहे हैं। भारत में विभाजन के दौरान अनेक ऐसी तस्वीरें सामने आई थी, जो हृदय विदारक थी। उस समय अनेकों घटनाएं ऐसी घटी, जिसने वर्तमान को बदलने का साहस रखा। इसी कड़ी में बंगाल की धरती पर घटित हुए एक भीषण जनसंहार की घटना है, जिसने भले ही वर्तमान राजनीतिक को ज्यादा प्रभावित नहीं किया मगर उस जनसंहार की शोर आज भी बाकी है। मरीचझापी जनसंहार बिल्कुल जालियांवाला बाग की तरह था। सामने 40,000 के आसपास निहत्थे, मज़बूर बच्चे, औरत और मर्द थे तथा दूसरी ओर सैकड़ों की संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल के हथियारबंद जवान।

सबसे बड़ा फर्क केवल इतना था कि जालियांवाला बाग में पुलिस ब्रिटिश सरकार की थी और यहां पुलिस पश्चिम बंगाल सरकार की थी। यह सब उस जगह हुआ जहां गंगा की दो धाराएं हुगली और पद्मा समुद्र में मिलती हैं। यह जनसंहार मरीचझापी द्वीप पर 26 जनवरी 1979 को हुआ था। आज इस घटना को 41 साल हो गए हैं मगर इस घटना के बारे में बहुत ही कम देखने और सुनने को मिलता है। 

भारत के विभाजन के दौरान अनेकों घटनाएं हुई हैं और मरीचझापी की कहानी भी भारत के विभाजन से ही शुरू होती है। भारत का विभाजन पूरब और पश्चिम दो तरफ हुआ था। पश्चिम में पंजाब का विभाजन त्रासदी तो था लेकिन वह हिस्सा जल्द ही स्थिर हो गया लेकिन पूरब में बंगाल का विभाजन एक निरंतर त्रासदी लेकर आया। ऐसी त्रासदी जो इतिहास के पन्नों पर काले अक्षरों में दर्ज़ हो गया। बंगाल का विभाजन ब्रिटिश सरकार की उस योजना के तहत हुआ था, जिसमें बंगाल के हिंदू और मुस्लिम बहुल इलाके के प्रतिनिधियों को विभाजन के पक्ष या विपक्ष में वोट डालने के लिए कहा गया था। इनमें से अगर किसी भी हिस्से के प्रतिनिधियों का अधिकांश वोट विभाजन के पक्ष में होता तो विभाजन का फैसला होना था। 

जिसमें मुस्लिम बहुल इलाके के प्रतिनिधियों ने एकीकृत बंगाल के लिए वोट डाला जबकि हिंदू बहुल इलाके के प्रतिनिधियों- कांग्रेस, हिंदू महासभा और कम्युनिस्ट ने विभाजन के पक्ष में वोट डाला।बंगाल एकीकृत रहता तो मुस्लिम बहुल होता मगर आखिरकार इस वोटिंग के बाद बंगाल का बंटना तय हो गया लेकिन बीच में एक मुश्किल आ गई। बंगाल के शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के प्रतिनिधियों ने विभाजन के खिलाफ एकीकृत बंगाल के लिए वोट डाला। 

वर्तमान समय की राजनीति में खासकर बंगाल की राजनीति में मरीचझापी के विषय पर बात नहीं होती है। इस तरह से जब लोगों ने सांप्रदायिक नहीं होने का फैसला किया उसकी कीमत उन लोगों को जान देकर चुकानी पड़ी।

पूर्वी बंगाल में दलित और मुसलमान दोनों ज़्यादातर छोटे किसान और खेत मज़दूर मिल कर रहे रहे थे इसलिए दलितों ने विभाजन के बाद भी पूर्वी बंगाल में रहना तय किया और उनके नेता जोगेंद्रनाथ मंडल आज़ाद पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बने। इसी बात की बंगाल के दलितों को बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी। चूंकि दलितों ने सांप्रदायिक नहीं होने का फैसला किया। वहीं अगर वे सांप्रदायिकता को अपनाते तो शायद आज के हालात थोड़े अलग होते मगर ऐसा नहीं हुआ।  

वर्तमान परिपेक्ष्य में अगर सांप्रदायिकता की बात की जाए तो उसे बुरा ही कहा जाएगा क्योंकि इससे धर्मों और जातियों का बंटवारा होता है मगर मारीझापी के इतिहास में यह सही कदम साबित होता। हालांकि वहां बसे लोगों के साथ हुआ व्यवहार हर तरह से गलत था। 1950 के दशक के दौरान, खुल्ना और जेसोर में बढ़ती खाद्य कीमतों और निम्न श्रेणी के सांप्रदायिक दंगों ने डराना धमकाया। अक्टूबर 1952 में भारत और पाकिस्तान के बीच पासपोर्ट प्रणाली की शुरुआत के साथ ये अनिश्चितताएं वास्तविक हो गईं।

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उसके बाद अनुसूचित जाति नामसुद्र और पौंड्रो क्षत्रियों ने पश्चिम बंगाल में पहले छोटे समूहों उसके बाद बड़े समूहों में पलायन करना शुरू कर दिया। लेकिन भारत अब इन अवांछित लोगों को स्वीकार करने को तैयार नहीं था क्योंकि ये वही लोग थे, जिन्होंने विभाजन के दौरान पाकिस्तान में रहने का विकल्प चुना था। 

पलायन का सिलसिला तब और तेज़ हो गया जब शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम छिड़ गया और इस दौरान एक करोड़ से ज़्यादा हिंदू दलित भारत आ गए। मगर भारत ने उन्हें नागरिकता नहीं दी और उन शरणार्थियों को ट्रांजिट कैंपों में रखा गया। इस कल्पना के साथ कि कभी उन्हें बांग्लादेश वापस भेज दिया जाएगा। तत्कालीन उन्हें भारत के उन इलाकों में भेज दिया गया जहां लोग रहना नहीं चाहते थे। जैसे- अंडमान द्वीप समूह, छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य जंगल और उत्तर प्रदेश के मलेरिया प्रभावित तराई क्षेत्र आदि मगर उनकी नागरिकता का मामला संशय में ही रह गया। उन्हें अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र तक भी नहीं मिला। 

पुरानी कथाओं के अनुसार राम ने भी दंडकारण्य जंगल में वनवास के दौरान समय व्यतीत किया था इसे डार्क फॉरेस्ट भी कहा जाता है। यही जगह शरणार्थियों के लिए भी चुना गया। यहां उन लोगों ने सुंदरबन के एक सुनसान द्वीप मरीचझापी की धरती को खेती के लायक बनाया मछली पालन का कार्य शुरू किया और वहां छोटे स्कूल अस्पताल आदि खोले गए। 

मगर वाम मोर्चा सरकार के इरादे नेक नहीं थे। सरकार में भद्रलोक बंगालियों का वर्चस्व था और वे भूल नहीं पाए थे कि इन दलितों ने बंगाल के विभाजन का विरोध किया था। मरीचझापी एक द्वीप था जो मैनग्रुव के पैरों से घिरा हुआ था। सरकारी यहां शरणार्थियों को रखने के मूड में नहीं थी और उसने इस जगह को रिजर्व फॉरेस्ट घोषित कर दिया। साथ ही कहा गया कि यह लोग यहां के कानून का उल्लंघन कर रहे हैं और यहां के जीव-जंतुओं को परेशान कर रहे हैं। इसके बाद 26 जनवरी 1979 ज्योति बासु की लेफ्ट फ्रंटियर की सरकार ने मरीचझापी की आर्थिक रूप से घेराबंदी कर दी।

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लोगों को वहां से आना-जाना रोक दिया गया। मरीचझापी में पीने के पानी के एकमात्र स्रोत में जहर मिला दिया गया। मरीचझापी के चारों तरफ समुद्री पानी था लेकिन पीने के लिए एक बूंद पानी नहीं था। पुलिस ने चारों तरफ से उनके द्वीप को घेर लिया। उन पर आंसू गैस छोड़े गए, गोलियां बरसाई गई पुलिस द्वारा अनेकों महिलाओं को स्टेशन में ले जाकर गैंगरेप किया गया। लोगों ने बचने का संपूर्ण प्रयास किया लेकिन वह बच नहीं सके। लोगों की हत्या कर दी गई। शवों को आस पास फेंक दिया गया जिससे वहां के जानवर खाकर आदमखोर बन गए। साथ ही शब्दों को रायमंगल समुद्र में भी फेंक दिया गया। 

यह बिल्कुल जालियांवाला बाग की तरह चित्रित किया गया था। मरीचझापी से संबंधित ज्यादा जानकारियां नहीं मिलती हैं मगर यहां हुए जनसंहार पर किताबें लिखी गई हैं और उन किताबों में वहां के परिस्थिति को दर्शाने का भरपूर प्रयास किया गया है। उसमें से ही एक किताब है जिसमें लिखा गया है, – ‘वर्तमान समय की राजनीति में खासकर बंगाल की राजनीति में मरीचझापी के विषय पर बात नहीं होती है। इस तरह से जब लोगों ने सांप्रदायिक नहीं होने का फैसला किया उसकी कीमत उन लोगों को जान देकर चुकानी पड़ी।’ क्या सच में अगर वे सांप्रदायिक होने का फैसला करते तो आज उनकी जान बची होती और ना ही यह मरीचझापी जनसंहार होता? 


तस्वीर साभार : thenarrativeworld

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