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महिलाओं में पीरियड एक समस्या नहीं बल्कि एक बायोलॉजिकल प्रोसेस है पर इस बात को समझने के लिए लोग तैयार नहीं है। उन्हें लगता है पीरियड, माहवारी या महीना एक समस्या है। एक ऐसी समस्या जिससे हर एक लड़की एक तयशुदा उम्र में ग्रसित होती है। कई लोगों को यह लगता है कि एक बार पीरियड हो जाने से लड़कियों के अंदर कई तरह के बदलाव होते भी हैं, जिसके बाद उसे कुछ कामों को नहीं करना चाहिए। 

मेरा ऐसा मानना है और जैसा मैं आज तक देखती आई हूं, पीरियड के वक्त कई लड़कियों को आचार छूने की इजाज़त नहीं होती है, पूजा करने की इजाज़त नहीं होती है, किचन में जाने की इजाज़त नहीं होती है और इसके साथ ही कई तरह की बंदिशें समानांतर चलती रहती हैं। हालांकि इन सब चीज़ों में बहुत हद तक बदलाव आया है और यह बदलाव एक सकारात्मक दिशा की ओर भी ले जा रहा है। इसका श्रेय लड़कियों और हर उन महिलाओं के संघर्ष को जाता है, जिन्होंने इस मुद्दे पर अपनी आवाज़ को लोगों के सामने रखने की भरपूर कोशिश की। 

अभी लॉकडाउन चल रहा है। इस लॉकडाउन के बीच कई तरह की मांगे उठ रही हैं और इन्हीं मांगों में से एक है, लड़कियों से पैड की मांग। यह एक बेहद ही सकारात्मक खबर है क्योंकि इससे यह पता चलता है कि अब कई प्रकार की भ्रांतियां टूट रही हैं। खुलेआम लड़कियों द्वारा पैड एवं अन्य माहवारी से जुड़ी चीजों की मांग करना एक बेहतर कल की ओर इंगित करता है।

ऐसे में हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये बदलाव अचानक से नहीं आया है इसके पीछे कई सालों का संघर्ष है। पीरियड को लेकर कई तरह की बातें हुई हैं। कुछ लोगों ने इससे पौराणिक कथाओं से जोड़ा है, जिसमें से मैं एक वाकया शेयर कर रही हूं। एक दिन यूट्यूब पर स्क्रॉल करते वक्त मुझे एक वीडियो मिला, जिसमें लड़कियों में माहवारी के शुरू होने की कथा के बारे में बताया गया था। उस वीडियो में कहा गया था कि यह लड़कियों को इंद्र द्वारा दिया गया एक श्राप है, जिसे आज तक लड़कियां श्रापित हैं। 

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मुझे ऐसा लगता है कि यह एक श्राप नहीं बल्कि एक वरदान है क्योंकि इस सृष्टि को चलाने के लिए पीरियड्स का होने ज़रूरी है क्योंकि पुरुषों के साथ साथ महिलाओं के अंदर ही वह शक्ति होती है, जिससे वह एक नए जीव को जीवन दे सकती हैं। इसमें महिलाओं का योगदान एक वरदान है। वहीं साइंस के नज़र से देखा जाए तो यह एक साधारण सा बायोलॉजिकल प्रोसेस है, जिसमें लड़कियां प्यूबर्टी यानी कि किशोरावस्था की ओर बढ़ती हैं।

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पीरियड पर बात से खुलती भ्रांतियों की परतें

पीरियड के विषय में आमतौर पर हर लड़कियां आपस में बातें करती हैं क्योंकि आजकल बाज़ार में कई तरह के प्रोडक्ट्स आ रहे हैं, जिसमें पैड के अलावा टैंपून, मेंस्ट्रूअल कप आदि को भी यूज़ करने के बारे में बताया जा रहा है। पीरियड पर जब मैंने अपने दोस्तों से बात की तब मुझे पता चला कि पीरियड पर जानकारी का अभाव अभी भी बना हुआ है। मेरी एक सहेली ने बताया कि जब उसे पहला पीरियड स्टार्ट हुआ तब उसे ऐसा लगा कि उसे बीमारी हो गई है क्योंकि वजाइना से रक्त का स्राव होना उसके लिए अनएक्सपेक्टेड था।  उसके घर पर भी पीरियड्स को लेकर कभी बातचीत नहीं हुई और ना ही उसे बताया या समझाया गया कि यह एक प्रक्रिया है, जो तयशुदा उम्र पर हर लड़की को होती है।

पीरियड्स को लेकर बदलाव हुए हैं और आगे भी यह बदलाव जारी रहेंगे यही उम्मीद की जा सकती है।

वही मेरी एक दूसरी सहेली ने बताया कि जब उसे पीरियड शुरू हुआ था तब उसे इस्तेमाल करने के लिए कपड़ा दिया गया था क्योंकि एक तरफ पैड की कीमत ज़्यादा थी और साथ ही उसके घर में कभी किसी ने पैड का इस्तेमाल नहीं किया था। उसे जो कपड़ा दिया गया था, उसे ही धो धोकर इस्तेमाल करने के लिए कहा गया था। इसके साथ ही उसे बताया गया था कि इसे धूप में नहीं सूखाना है। इसे हर इंसान की नज़र से छुपाकर ही सुखाना है। 

मैंने इस विषय पर अपने एक दोस्त से भी बात की क्योंकि हम हमेशा पीरियड को एक महिला की नज़र से ही देखते हैं और हमेशा उनसे ही पीरियड से जुड़े हर सवालों और मिथकों आदि के बारे में चर्चा करते हैं। मेरा जो दोस्त है, उसने मुझे बताया कि बचपन में उसकी एक दोस्त हुआ करती थी, जिसके साथ वह खेला करता था। कुछ समय बाद जब दोनों बड़े हुए उसके बाद धीरे-धीरे उसकी दोस्त ने उस से दूरी बनाना शुरू कर दिया वह उससे बात नहीं किया करती थी और अब लड़कों के साथ खेला भी नहीं करती थी जब उसने अपने घर में इस बारे में पूछा था उसे कहा गया कि अब बड़ी हो गई है इसलिए वह तुम्हारे साथ नहीं खेलेगी।  उस समय उसे यह नहीं पता था कि बड़े होने का मतलब क्या होता है और आज जाकर उसे यह बात समझ में आई है कि उस समय के बड़े होने का मतलब था कि उस लड़की को पीरियड शुरू हो गए हैं इसलिए उसे लड़कों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए और ज़्यादा नहीं खेलना चाहिए।

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पीरियड पर अभी और भी है बदलावों की ज़रूरत

इस तरह से यह मेरे कुछ अनुभव है़, जो मैंने अपने आसपास के लोगों और दोस्तों से बात करके मुझे मिले हैं। पीरियड से संबंधित संबंधित जो धारणाएं और अंधविश्वास है, वह एक दिन में खत्म नहीं होगा। अगर अभी कुछ बदलाव समाज में आए हैं, तो यह अचानक से ही नहीं आए हैं। इसके पीछे कई सालों का संघर्ष है। ऐसे भी महिलाओं से संबंधित जो भी विषय होते हैं, उन्हें सामने आने में भी समय लगता है। पीरियड को लेकर महिलाओं से ही नहीं बल्कि हर पुरुष से भी उसकी राय ज़रूर लेनी चाहिए क्योंकि यह केवल महिलाओं से संबंधित विषय नहीं है, इससे एक पुरुष भी कहीं ना कहीं जुड़ा हुआ है‌। 

हर मोर्चे पर महिलाओं और लड़कियों को संघर्ष करना होगा। साथ ही बचपन से ही हर बच्चे को पीरियड से संबंधित जानकारी देनी होगी ताकि उसे कहीं और से किसी तरह की जानकारी ना प्राप्त हो क्योंकि कभी-कभी जब बच्चे जाने अनजाने में इंटरनेट आदि चीज़ों का सहारा लेते हैं, तो उसके साथ ही वह ऐसी चीज़ों में भी फंस जाते हैं, जो उनके लिए घातक साबित हो जाती है। 

इसके साथ ही वह बच्चे डर से अपने परिवार वालों को नहीं बताते कि अगर उनके परिवार में किसी को पता चलेगा तो हो सकता है उनके साथ कुछ बुरा हो। इसलिए ज़रूरी है कि बच्चों को एक तय समय से ही पीरियड से संबंधित जानकारी दी जाए। फिर चाहे वह लड़का हो या लड़की। कभी भी किसी बात को लेकर फर्क करना भी गलत है क्योंकि इससे बच्चों के अंदर हीन भावना पैदा हो जाती है। हालांकि पीरियड्स को लेकर बदलाव हुए हैं और आगे भी यह बदलाव जारी रहेंगे यही उम्मीद की जा सकती है।

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तस्वीर साभार : bbc

सौम्या ज्योत्स्ना बिहार से हैं तथा मीडिया और लेखन में कई सालों से सक्रिय हैं। नारीवादी मुद्दों पर अपनी आवाज़ बुलंद करना ये अपनी जिम्मेदारी समझती हैं क्योंकि स्याही की ताकत सबसे बुलंद होती है।

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