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उम्र के बढ़ने के साथ-साथ इंसानों में कई तरह की शारीरिक समस्याएँ बढ़ने लगती है, जो यों तो आम होती है लेकिन कई बार ये गंभीर रूप भी ले लेती हैं। ऐसे ही महिलाओं को एक उम्र के बाद पीरियड से जुड़ी परेशानियां बहुत गंभीर साबित होती हैं। महिलाएं घर के साथ-साथ बाहर के कामों में भी अपनी पूरी भागीदारी देती हैं मगर हमेशा अपनी सेहत को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। हम सभी अपने अपने घरों में महिलाओं को यह कहते हुए सुना होगा कि “मेरी तबीयत ठीक है, मुझे कुछ नहीं हुआ है।” जबकि उनकी सेहत ठीक नहीं रहती है। इनका ऐसा कहना ही अनेकों बीमारियों को निमंत्रण देता है।

बेवक्त खाना, सेहत की अनदेखी करना, लाइफ स्‍टाइल का बिगड़ने और स्‍ट्रेस के कारण आजकल महिलाएं अनेकों बीमारियों से ग्रस्त रहने लगी हैं, जिनमें कैंसर, हार्ट डिजीज और अर्थराइटिस जैसी बीमारियों के नाम शामिल हैं। आज हर दूसरी महिला इन बीमारियों से परेशान हैं। इन्हीं बीमारियों में से से एक है, पॉली सिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी पीसीओएस या पॉली सिस्टिक ओवरी डिसऑडर। डॉक्टरों के अनुसार पीसोओएस की समस्या पिछले 10-15 सालों में दोगुनी हो गई है। भारत में हर दूसरी महिला पॉली सिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) या पॉली सिस्टिक ओवरी डिसऑर्डर (PCOD) से ग्रसित है।

एक ऐसी मेडिकल कंडिशन है, जिसमें रिप्रोडक्टिव उम्र की महिलाओं में हॉर्मोन असंतुलन पाया जाता है। इसमें महिला के शरीर में पुरुषों के अंदर बनने वाले हॉर्मोन एंड्रोजेन का स्तर बढ़ जाता है। साथ ही ओवरीज में एक से ज़्यादा सिस्ट हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर का हार्मोनल बैलेंस बिगड़ जाता है, जिसका असर अंडों के विकास पर पड़ता है। जिस कारण ओवयुलेशन और पीरियड साइकिल रुक सकता है। 

सेक्‍स हार्मोन में असंतुलन पैदा होने और हार्मोन में ज़रा सा भी बदलाव पीरियड्स पर तुरंत असर डालता है। इस अवस्था के कारण ही ओवरी में सिस्ट बनने लगता है। साथ ही इस समस्या के लगातार बने रहने से ओवरी के साथ-साथ फर्टिलिटी पर भी असर पड़ता है। ये सिस्ट छोटी-छोटी थैलीनुमा संरचना की होती हैं, जिनमें तरल पदार्थ भरा होता है। ओवरी में ये सिस्ट इकट्ठा होते रहते हैं और इनका आकार भी धीरे-धीरे बढ़ते चला जाता है और आगे चलकर महिलाओं को प्रेगनेंट होने में भी परेशानियां होने लगती हैं।

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यह बीमारी अनुवांशिक भी हो सकती है। इसके साथ ही ज़्यादा वज़न होने पर भी इसके होने की संभावना बढ़ जाती है। साथ ही ज़्यादा तनाव भरी ज़िंदगी भी इसका एक मुख्य कारण हो सकता है। इसे जानने के कुछ मुख्य बिंदू इस प्रकार हैं- 

  • अनियमित पीरियड्स
  • एंड्रोजन (पुरुष हार्मोन) का बढ़ना
  • चेहरे पर मुंहासों का होना
  • चेहरे पर अत्यधिक बाल
  • अंडाशय अर्थात् ओवरी का बढ़ना
  • पीरियड्स के दौरान ज़्यादा ब्लीडिंग होना
  • वज़न का बढ़ना
  • त्वचा पर काले धब्बों का होना
  • सिर दर्द
  • बालों का पतला होना 
  • सेक्स में रुचि का घटना 

पॉली सिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) या पॉली सिस्टिक ओवरी डिसऑर्डर (PCOD) 5 से 10 प्रतिशत महिलाओं को 15 और 44 वर्ष के बीच होने का खतरा रहता है। साथ ही उस वक्त के दौरान भी जब वह मां बनने वाली होती हैं, उस वक्त भी वे PCOD से पीड़ित हो जाती हैं। अधिकांश महिलाओं को उनके 20 और 30 की आयु में पता चलता है कि उनको पीसीओडी (PCOD) है, जब उन्हें गर्भवती होने में किसी प्रकार की समस्या आती है।  इस समस्या का सही समय पर अनुमान जल्दी नहीं हो पाता है क्योंकि इसके लक्षणों पर महिलाएं ध्यान नहीं देतीं। हालांकि इसके कुछ लक्षणों पर गौर किया जा सकता है, जिसमें इंसुलिन की बढ़ी हुए मात्रा, शरीर में सुजन के लक्षण और अनुवांशिकता। 

हार्मोन्स के संतुलन में गड़बड़ी का असर फौरन भूख, नींद और तनाव के स्तर पर दिखने लगता है। असंतुलन से अर्थ है कि शरीर में किसी हार्मोन का ज़्यादा बनता है या बहुत कम बनना। इससे शरीर में अनेकों परेशानियां अपना बसेरा करती हैं। 

 पॉली सिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) शरीर में अन्य जटिलताओं को जन्म देती है, जिसमें 

  • गर्भधारण करने में दिक्कत
  • डायबिटीज
  • गर्भपात
  • प्री मेचयोर डिलीवरी
  • लीवर की सूजन
  • स्लीप एप्निया
  • डिप्रेशन तथा मूड विकार
  • गर्भाशय से असामान्य रक्तस्राव
  • कैंसर

पॉली सिस्टिक ओवरी सिंड्रोम के कुछ घरेलू उपाय भी हैं मगर बिना डॉक्टर के परामर्श के कोई भी कदम उठाना गलत साबित हो सकता है। जैसे-

  • खानपान में बदलाव
  • जिंक, संयुक्त विटामिन डी और कैल्शियम, कॉड लिवर ऑयल जैसे सप्लीमेंट्स का सेवन करना
  • प्रोबायोटिक्स को खाने में शामिल करना 
  • स्वस्थ वजन बनाए रखना
  • अपने व्यायाम को संतुलित करना
  • अच्छी नींद लेना
  • तनाव कम लेना आदि। 

पॉली सिस्टिक ओवरी सिंड्रोम महिलाओं से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है, जिससे बचने के लिए महिलाओं को अपने सेहत के प्रति खुद सजग होना होगा। साथ ही एक निश्चित उम्र के बाद डाक्टर का परामर्श भी जरुरी होता है क्योंकि इससे शरीर की जटिलताएं सामने आ जाती हैं और स्वस्थ्य होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए जरुरी है कि महिलाएं अपने सेहत के प्रति जागरुक होकर रहें। साथ ही घर के अन्य सदस्य भी महिलाओं के सेहत के प्रति जागरुक रहें क्योंकि महिलाएं घर के कामों में बंधने के लिए नहीं होतीं हैं। उनके सेहत का ध्यान रखना और उन्हें डॉक्टर के पास परामर्श के लिए लेकर जाना भी घर के लोगों का ही दायित्व होता है। 

एक महिला अनेकों परेशानियों की गठरी बांधे कामों में लगी रहती है इसलिए महिलाओं का साथ देना और उन्हें खुश रखने का दायित्व भी घर वालों का भी होता है। डॉक्टर से परामर्श जरुर लें क्योंकि वही सही जानकारियां दे सकते हैं।  

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तस्वीर साभार : Youth Ki Awaaz

सौम्या ज्योत्स्ना बिहार से हैं तथा मीडिया और लेखन में कई सालों से सक्रिय हैं। नारीवादी मुद्दों पर अपनी आवाज़ बुलंद करना ये अपनी जिम्मेदारी समझती हैं क्योंकि स्याही की ताकत सबसे बुलंद होती है।

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