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हम एक ‘हेटेरो नॉर्मेटिव’ समाज में रहते हैं। एक ऐसा समाज जहां विषमलैंगिकता यानी हेटेरोसेक्शुऐलिटी को ही ‘स्वाभाविक’ माना जाता है। समलैंगिक, द्विलैंगिक, ट्रांसजेंडर और अलैंगिक लोगों को आमतौर पर नफ़रत या तिरस्कार की नज़रों से देखा जाता है। इसका नतीजा ये होता है कि ऐसा हर शख्स, जो समाज के निर्धारित ‘मर्द’ या ‘औरत’ की कठोर परिभाषाओं के बंधन में नहीं बंध पाता, समलैंगिक या ट्रांसजेंडर करार दिया जाता है। जिसके कारण उसे हर तरह का अपमान, लांछन और शोषण बर्दाश्त करना पड़ता है।

व्यवहार, शरीर या पोशाक से ‘लड़की जैसे’ दिखने वाले मर्दों को ‘हिजड़ा’, ‘छक्का’ जैसे शब्दों से अपमानित किया जाता है। ‘मर्दानी’ औरतों को लेस्बियन समझकर उन्हें हंसी-मजाक का पात्र बनाया जाता है। कई बार माता-पिता भी अपने इन ‘ऐबनॉर्मल’ बच्चों को ‘सुधारने’ के लिए उन पर शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा करते हैं या ‘कंवर्जन थेरपी’ के लिए डॉक्टर के पास भेजते हैं। इसकी वजह से कई लोगों ने आत्महत्या तक की है।

पिछले कुछ सालों में भारत में ‘टिक टॉक’ ऐप बहुत लोकप्रिय हुआ है। ये एक वीडियो-शेयरिंग ऐप है जिस पर लोग छोटे-छोटे एक-देढ़ मिनट तक लंबे वीडियो पोस्ट करते हैं। इन वीडियोज़ में वे नाच रहे होते हैं, गाने या फ़िल्मी डायलॉग पर होंठ हिला रहे होते हैं या ऐक्टिंग, मेकअप, चित्रकला जैसी चीज़ों में अपनी प्रतिभा दिखा रहे होते हैं। ‘टिक टॉक’ की खासियत ये है कि इसका प्रभाव समाज के हर तबके तक बराबर पहुंचा है। अमीर या गरीब, बूढ़ा या नौजवान, हर कोई इस ऐप पर नए नए तरीकों से खुद को अभिव्यक्त कर रहा है। और इसमें एक बड़ी संख्या है कुछ मर्दों की जो ‘औरतों जैसी हरकतें’ करते हुए नज़र आते हैं। अपने वीडियोज़ में ये लड़के साड़ी पहनकर, फ़ुल मेकअप करके ठुमके लगाते नज़र आते हैं। वे सारे काम जो मर्द आमतौर पर नहीं करते।

कैरीमिनाटी भी आखिर इसी संस्कृति में पला बढ़ा है, जिसकी वजह से जेंडर की सीमाओं का उल्लंघन करते लोग उसे ‘अजीब’ और हास्यास्पद लगते हैं।

इसकी वजह से उन्हें अनगिनत गालियां पड़ती हैं। कई लोगों ने भारत में टिक टॉक को बैन तक करने की मांग उठाई है क्योंकि लिपस्टिक लगाए, साड़ी पहने इन जवान लड़कों को कमर मटकाते देख उन्हें घिन आती है। हर दूसरे मीम पेज पर इन लड़कों को ‘औरत’ कहकर उन पर मज़ाक किए जाते हैं। कई यूट्यूब चैनल, जिनकी खासियत है ‘रोस्ट’ करना यानी इंटरनेट पर किसी कंटेंट के बारे में अपमानजनक तरीके से अपने विचार व्यक्त करना, इन्हीं लड़कों को अपने ‘रोस्टिंग’ का पात्र बनाते हैं और उनके लिए ‘हिजड़ा’, ‘नचनिया’ जैसे अपमानजनक शब्द इस्तेमाल करते हैं।

ऐसा ही एक रोस्ट वीडियो बनाया था सेलेब्रिटी यूट्यूबर ‘कैरीमिनाटी’ ने। कैरीमिनाटी उर्फ़ अजेय नागर के लगभग दो लाख सब्सक्राइबर हैं और वह अपने मुंहफट और गुस्सैल अंदाज़ के लिए जाना जाता है। उसके लगभग हर वीडियो में अश्लील गालियों की भरमार होती है, जो उसके फ़ैन्स को बहुत पसंद आता है। अपने इस वीडियो में कैरीमिनाटी ने टिक टॉक स्टार आमिर सिद्दीक़ी का रोस्ट किया था। वीडियो में उसने टिक टॉक पर वीडियो डालनेवाले मर्दों को ‘टिक टॉक की बेटियां’ कहकर संबोधित किया। आमिर सिद्दीक़ी को बार बार ‘बेटी’ कहकर पुकारा। ‘बहन’, ‘बेटी’ जैसे शब्दों को अपमान की तरह इस्तेमाल किया। साथ ही इस बात का इशारा किया कि स्कर्ट पहनने वाले लड़के ‘मर्द’ नहीं होते। पूरे वीडियो में कैरीमिनाटी की बातों से ये आभास हो रहा था कि अगर कोई मर्द ‘मर्दानगी’ के पैमानों पर नहीं बैठता तो इसका मतलब वह औरत है। और उसका ‘औरत जैसा’ होना बुरी बात है।

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इस वीडियो के ख़िलाफ़ काफ़ी विरोध हुआ। कई लोगों ने ये कहकर आपत्ति जताई कि इसमें ट्रांसजेंडर और समलैंगिक लोगों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाई गई है। इसी विरोध के चलते यूट्यूब ने ये वीडियो हटा दिया। वीडियो के हटाए जाने का दुःख कैरीमिनाटी ने इंस्टाग्राम पर जताया, पर एक बार भी उसने अपने शब्दों के लिए माफ़ी नहीं मांगी। या जानना नहीं चाहा कि उसके आलोचकों को उसकी किस बात से ऐतराज़ था।

ट्विटर पर कैरीमिनाटी की कठोर आलोचना हो रही है। और ज़रूर होनी चाहिए। पर इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि यहां गलती उसकी अकेले की नहीं है। हम एक ऐसी रूढ़िवादी, कट्टरपंथी संस्कृति में रहते हैं जहां बचपन से हमारे दिमाग में भर दिया जाता है कि मर्द और औरत कभी एक जैसे नहीं हो सकते। कि या तो हम मर्द हैं या औरत। और अगर कोई मर्द ‘औरतों जैसा’ या औरत ‘मर्द जैसा’ व्यवहार करे तो‌ इसका मतलब है कि वह दिमागी या शारीरिक तौर पर ठीक नहीं है। कैरीमिनाटी भी आखिर इसी संस्कृति में पला बढ़ा है, जिसकी वजह से जेंडर की सीमाओं का उल्लंघन करते लोग उसे ‘अजीब’ और हास्यास्पद लगते हैं। उसे शायद पता ही नहीं कि उसके इस ‘रोस्ट’ ने कितने ट्रांसजेंडर और समलैंगिक मर्दों को उनके साथ हो रहे रोज़ के अत्याचार की याद दिलाई हो। उन्हें मानसिक पीड़ा पहुंचाई हो। वह कैसे माफ़ी मांगेगा जब उसे पता ही न हो उसकी क्या गलती है?

इसी तरह के ‘मज़ाक’ हमारे समाज में इस हद तक नॉर्मलाईज़ हो चुके हैं कि हमें पता ही नहीं चलता कि ये ग़लत हैं। हम नहीं जान पाते कि हमारा यही मज़ाक लोगों को आत्महत्या करने को मजबूर करता है। उन्हें ‘अजीब’, ‘पागल’ या ‘बीमार’ होने का एहसास दिलाता है। समाज में यह भावना पैदा करता है कि ‘छक्के’ हमसे अलग होते हैं और सिर्फ़ लांछन और बहिष्कार के योग्य हैं।

जेंडर की परिभाषाएं आज बदल रही हैं। उम्मीद है इसके साथ साथ मज़ाक की भी परिभाषा बदलेगी। एक ऐसे भविष्य की कामना है जहां एक मर्द का साड़ी पहनना एक औरत के जीन्स या शर्ट पहनने जितना ही स्वाभाविक होगा। जहां एक लड़का लिपस्टिक लगाए तो उसे अपमान की जगह तारीफ़ मिलेगी। जहां हर मर्द को अपनी पसंद के कपड़े पहनकर टिक टॉक पर ठुमके लगाने की आज़ादी होगी, और कैरीमिनाटी जैसे बड़े नाम ऐसे कंटेंट क्रिएटर्स का अपमान करने की जगह उनका हौसला बढ़ाएंगे।

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तस्वीर साभार : newsd

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2 COMMENTS

  1. ha.ha.ha😂😂😂 jinhe yeh nahi pta carryminati ke 1.5 crore se zyada subscriber hai wo yeh bta ki carryminati ka character kesa hai 😂😂
    Andh feminist

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