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जनवरी 2018 में लोकसभा में एक नया बिल पेश हुआ। ‘मेंस्ट्रुअल बेनेफ़िट बिल’ जो अरुणाचल प्रदेश के सांसद निमोंग एरिंग द्वारा पेश किया गया था। ये बिल कामकाजी महिलाओं को मेंस्ट्रुअल लीव यानी पीरियड्स के दौरान छुट्टी दिलाने के पक्ष में है। अगर ये कानून बन जाए तो भारत में सभी सरकारी और प्राइवेट संस्थानों में महिला कर्मचारियों को हर महीने दो दिन की वेतन-सहित छुट्टी दी जाएगी। साथ ही, कार्यालयों में भी पीरियड्स से गुज़रती औरतों के लिए ख़ास सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएंगी। एरिंग ने कहा कि उन्होंने ये बिल इसलिए पेश की क्योंकि देशभर से कई महिला संगठनों ने भारत में एक अच्छी ‘मेंस्ट्रुअल लीव पॉलिसी’ की मांग की है।

भारत में अभी तक कोई मेंस्ट्रुअल लीव पॉलिसी तो लागू नहीं है, पर कई कंपनियां‌ हैं जो अपने कर्मचारियों को वेतन सहित मेंस्ट्रुअल लीव देती हैं। इस मुद्दे के पक्ष में जितने तर्क हैं, उतने तर्क विपक्ष में भी हैं। कई तरह के सवाल किए जाते हैं। क्यों ज़रूरी है मेंस्ट्रुअल लीव? क्या औरतें इतनी कमज़ोर हैं कि हर महीने इस तरह छुट्टी लेने की ज़रूरत पड़े? क्या ऐसे वे कंपनी की तरफ़ अपनी ज़िम्मेदारियां निभा पाएंगी? क्या इस तरह कंपनी को नुक़सान नहीं होगा?

एक वैज्ञानिक नज़रिए से देखा जाए तो औरतों को मेंस्ट्रुअल लीव की बेहद ज़रूरत है। ‘डिसमेनोरिया’ यानी पीरियड्स के शुरुआती दिनों में होनेवाली शारीरिक तकलीफ़ महिलाओं के एक बड़े अंश को पीड़ित करती है। इस समय उन्हें पेट दर्द, बदन दर्द, उल्टी, तेज़ बुखार जैसी कई परेशानियाें से गुज़रना पड़ता है। अगर उन्हें पीसीओडी, एंडोमेट्रायसिस, या पेल्विक इंफ़्लैमेटरी डिज़ीज़ जैसी कोई बीमारी हो तो अक्सर ये तकलीफ़ दुगनी हो जाती है और उन्हें अस्पताल में भी भर्ती होना पड़ सकता है।

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2016 में लंडन के युनिवर्सिटी कॉलेज में प्रजनन स्वास्थ्य के प्रोफ़ेसर जॉन गिलेबॉड ने बताया था कि, “पीरियड्स के दौरान कई औरतों को उतनी ही तकलीफ़ होती है जितनी एक हार्ट अटैक के दौरान हो।” डिस्मेनोरिया पर 2012 में किए गए शोध के अनुसार कम से कम 20 फ़ीसद महिलाओं को पीरियड्स के दौरान इतनी तकलीफ़ होती है कि उनके लिए चलना भी मुश्किल हो जाता है।

पीरियड्स के दौरान काम से छुट्टी लेना और खुद को समय देना एक औरत का हक़ है।

ऐसे में मेंस्ट्रुअल लीव ज़रूरी ही नहीं बल्कि एक औरत का अधिकार भी है। एक कंपनी की ज़िम्मेदारी बनती है कि उसके कर्मचारियों की स्वास्थ्य-संबंधित ज़रूरतों को ध्यान में रखा जाए और काम की वजह से किसी कर्मचारी के शरीर को नुक़सान न पहुंचे। हर कार्यस्थल में अगर पुरुष और महिला दोनों के लिए ‘सिक लीव’ का इंतजाम हो सकता है, तो महिलाओं के लिए मेंस्ट्रुअल लीव क्यों नहीं? कुछ लोग मेंस्ट्रुअल लीव पॉलिसी का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि इससे महिलाएं पुरुषों से कमज़ोर नज़र आती हैं। अगर मर्द और औरत बराबर हैं तो औरत के लिए एक्स्ट्रा छुट्टियां क्यों? अगर दोनों के लिए बराबर वेतन की मांग की जा सकती है, तो उनसे बराबर काम की उम्मीद क्यों नहीं की जा सकती? ऐसा विचार रखनेवालों में कुछ महिलाएं भी शामिल हैं, जो नहीं चाहतीं कि उन्हें महज़ उनके शरीर के लिए अतिरिक्त सुविधाएं दी जाएं।

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पर बात ये है कि पीरियड्स के दौरान तकलीफ़ कई औरतों के लिए एक बहुत बड़ी सच्चाई है। इस तकलीफ़ के दौरान उन्हें अपनी सेहत का ख़ास ध्यान रखने की ज़रूरत पड़ती है, जिससे वे कमज़ोर नहीं हो जाती हैं। वैसे ही जैसे महीने में एक दो बार सिक लीव ले लेने से कोई पुरुष कमज़ोर नहीं हो जाता। हर इंसान को कभी न कभी सेहत की समस्याओं से गुज़रना पड़ता है, और इस समय पूरी तरह से ठीक होने के लिए उन्हें कुछ दिन आराम की ज़रूरत होती है। इसका ये मतलब नहीं कि वे दूसरों से कमज़ोर हैं या अच्छे कर्मचारी नहीं हैं।

रूढ़िवादी सोच के भी कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि औरतों को इसीलिए घर पर ही रहना चाहिए क्योंकि उनका शरीर बाहर काम करने के लिए नहीं बना है। ये भी गलत है, क्योंकि सबसे पहले तो औरतें घर पर भी उतना ही काम करतीं हैं जितना बाहर। या शायद उससे भी ज़्यादा। तो ऐसी हालत में घर का काम करना भी उन पर भारी ही पड़ता है। दूसरी बात, छुट्टी लेने की ज़रूरत हर किसी को होती है क्योंकि आखिर हैं हम इंसान ही। बिना रुके दिन रात काम करनेवाली मशीनें नहीं। एक दो दिन छुट्टी ले लेने पर किसी के काम करने की क्षमता विलुप्त नहीं हो जाती।

पीरियड्स के दौरान काम से छुट्टी लेना और खुद को समय देना एक औरत का हक़ है। क्योंकि पीरियड्स भी आखिर एक आम स्वास्थ्य-संबंधित परेशानी ही है। ये हक़ आज़माने में हमें संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि अपने शरीर का ध्यान रखना हमारी ही ज़िम्मेदारी है। और कोई जोखिम उठाया गया तो सबसे ज़्यादा हमारे काम को ही नुक़सान पहुंचेगा। उम्मीद है और कंपनियां भी मेंस्ट्रुअल लीव पॉलिसी लागू करना शुरू करें और इस पर जल्द ही नए कानून भी बनाए जाएं ताकि ये देशभर में लागू हो सके।

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तस्वीर साभार : feminisminindia

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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