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माहवारी, पीरियड, मासिधर्म या महीना आना। ये शब्द कुछ साल पहले तक ‘गंदी बात’ में शुमार हुआ करते थे। ये वो शब्द थे जिन्हें हमेशा दबे स्वरों में कहा जाना ‘सभ्य’ होना माना जाता था। लेकिन समय के साथ बाज़ार ने इस मुद्दे को कुछ यूँ उजागर किया कि अब धीरे-धीरे दुकानों से सेनेटरी पैड देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अख़बार और काली पालिथीन हटने लगी। शब्द ऊँचे तो नहीं लेकिन चर्चा में आने लगे। चुनिंदा दिन ही सही इसपर पोस्ट होने लगी।  

बेहद अच्छा होता अगर ये सब ज़मीनी सरोकार से जुड़ता, हर शहर-हर द्वार से जुड़ता। कहते हैं कि कोई भी सामाजिक बदलाव जल्दी नहीं आता है, इसके लिए वक्त लगता है। क्योंकि सामाजिक बदलाव एक लंबी प्रक्रिया है। ऐसे में अगर किसी बदलाव को तेज़ी से लाने की कोशिश भी की जाए तो उसका असर कम समय के लिए और वो भी सिर्फ़ खोल (माने दिखावे) तक ही सीमित रह जाता है। हमारे समाज में माहवारी भी एक ऐसा विषय है, जिसपर समाज की चुप्पी सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रही है, ऐसे में चंद फ़िल्मों या अभियानों से इससे संबंधित उत्पादों के बाज़ार में तो तेज़ी आयी पर इससे हम किसी सकारात्मक बदलाव की उम्मीद नहीं कर सकते है।

मैं बीते कई सालों से ख़ुद बनारस शहर के आसपास के गाँवों में ‘माहवारी’ के मुद्दे में काम कर रही हूँ। शुरुआती दौर में इस मुद्दे पर काम करने के लिए मुझे और मेरी टीम को हेय दृष्टि से देखा जाता था। लगातार ये कहा जाता कि ये कोई काम करने का विषय नहीं है और कुछ तथाकथित शहरी प्रगतिशील लोग कहते ‘अरे हाँ! ये सब की गाँव में बहुत ज़रूरत है।’

अब अपने अनुभवों के आधार पर कहूँ तो ‘माहवारी के विषय पर काम करने और सतत विकास की तर्ज़ पर सकारात्मक बदलाव लाने की ज़रूरत शहर और गाँव दोनों में एक समान है।’ क्योंकि एकतरफ तो गाँव में माहवारी के विषय पर बात करने के लिए लोगों को जुटाना और उनकी चुप्पी तोड़ना एक चुनौती है। वहीं दूसरी तरफ़, शहर में फ़ैंसी दिखने के लिए माहवारी जैसे विषय पर काम करने के सम्मान में भव्य आयोजन करके ‘माहवारी’ शब्द पर ज़बान का लड़खड़ा जाना भी एक चुनौती है।

ध्यान रहे जब हम किसी बात को किसी ख़ास दिन के लिए रखते है तो वो सिर्फ़ दिखावा बनकर रह जाता है। आधुनिकता के दौर में वो सोशल मीडिया की पोस्ट और चंद अभियानों में सिमटकर रह जाता है।

इन दोनों चुनौतियों से लगातार हम दो चार होते रहते है। गाँव में सेनेटरी पैड की पहुँच न होना एक चुनौती है और शहरों में माहवारी से जुड़े मिथ्यों का सख़्ती से पालन एक चुनौती है। बाज़ार के ज़ोर के बाद धीरे-धीरे ‘माहवारी स्वच्छता दिवस’ भी फ़ैशन का हिस्सा बन रहा है। इस दिन तमाम लोग अपने सोशल मीडिया पर इस विषय पर पोस्ट करने लगे है, लेकिन सवाल फिर वही आ जाता है – सरोकार का। हो सकता है आपको मेरी बात पर यक़ीन न हो। आपको लगे कि अब तो सब बदल गया है, महिलाएँ और लड़कियाँ अभी जागरूक हो चुकी है। सब समझती है, उन्हें कुछ भी बताने या माहवारी पर बात करने की ज़रूरत नहीं है। तो आपके लिए एक प्रयोग है करके देखिएगा – अपने घर, कार्यस्थल, स्कूल, कॉलेज या किसी भी महिला व किशोरी समूह (जहां आप और दूसरे सहज महसूस करें) वहाँ सभी से सवाल करिएगा कि ‘आप में से कितने ऐसे लोग है, जो पहली बार माहवारी आने पर डर गए थे?’ आपको ज़वाब ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जाएगा।

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मैं ख़ुद ये प्रयोग हर उस जगह करती हूँ जहां लोग इस विषय को किसी वर्ग-विशेष के लिए ज़रूरी मनाने लगते है और मैंने हमेशा पाया है कि इस सवाल पर चार बच्चों की माँ से लेकर चौदह साल की किशोरी तक, बड़ी कम्पनी में नौकरी करने वाली महिला से लेकर अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ने वाली किशोरी तक, दलित बस्ती में रहने वाली ग्रामीण महिला से लेकर मेट्रो सिटी की महिला तक – सभी के हाथ उठ जाते है। इसका मतलब है कि अभी कुछ नहीं बदला है। क्योंकि उम्र, वर्ग, जाति, रंग और संस्कृति इन सारी विविधताओं के बाद भी इस विषय पर अपने अनुभवों के आधार पर महिला स्थिति एकसमान है।  

ध्यान रहे जब हम किसी बात को किसी ख़ास दिन के लिए रखते है तो वो सिर्फ़ दिखावा बनकर रह जाता है। आधुनिकता के दौर में वो सोशल मीडिया की पोस्ट और चंद अभियानों में सिमटकर रह जाता है। इसलिए हमें समझना होगा कि ‘माहवारी’ महिला स्वास्थ्य से नहीं बल्कि स्वस्थ समाज से जुड़ा एक अहम विषय है। इसलिए माहवारी पर बात करना सिर्फ़ महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए ज़रूरी है। इसी तर्ज़ पर शुरू करिए माहवारी पर बात अपने घर और आसपास। पर याद रखिएगा बात ऐसी हो जो दूर तल्ख़ जाए, ये एकदिन का क़िस्सा नहीं बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हो, क्योंकि जो हम बोलते है वही करते है और जो करते है वही पहले हमारे संस्कार और फिर संस्कृति बनते है।    

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तस्वीर साभार : रामकिंकर कुमार

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