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आमतौर पर हमारे भारतीय समाज में महिलाओं को लैंगिक भेदभाव के चलते कई तरह की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें से पीरियड्स से जुड़ी परेशानियां बहुत देखी जाती हैं। इसमें से एक है असामान्य रुप से ब्लीड होना, जिसे अक्रियाशील गर्भाशय रक्तस्राव या एबर्नामल युटरिन ब्लीडिंग भी कहा जाता है, इसमें यूटरस से अनियमित ब्लीडिंग होती है। यह किसी भी कारण से हो सकता है। सामान्यतः पीरियड्स 21 से 35 दिनों का होता है। यही अगर 21 दिन से कम और 35 दिन से ज़्यादा हो जाए तो पीरियड्स में गड़बड़ी हो जाती है, जिसे एबर्नामल युटरिन ब्लीडिंग कहा जाता है। इस रक्तस्राव के कारण एनीमिया मतलब खून की कमी भी हो जाती है।

एबर्नामल युटरिन ब्लीडिंग के लक्षणों में ज़्यादातर ब्लीडिंग होना दिखाई देता हैं, इसमें ब्लीडिंग के अलग-अलग पैटर्न भी दिखाई देते हैं। जैसे-

  • पीरियड्स में हैवी ब्लीडिंग होना।
  • ब्लीडिंग में कई संख्या में थक्के या बड़े-बड़े अनेकों थक्के होना।
  • सात दिनों से ज़्यादा ब्लीडिंग होना।
  • 21 दिनों से पहले ही ब्लीडिंग हो जाना।
  • स्पॉटिंग।

एबर्नामल युटरिन ब्लीडिंग में कुछ लक्षण भी दिखाई देते हैं, जैसे- सूजन और पेल्विक दर्द या दबाव। इसके साथ यह लक्षण भी दिखाई देते हैं, जैसे- 

  • चक्कर आना।
  • बेहोशी।
  • कमज़ोरी।
  • लो ब्लड प्रेशर का होना।
  • हार्ट रेट का बढ़ जाना।
  • त्वचा का पीला हो जाना।
  • शरीर में दर्द होना।
  • खून में बड़े-बड़े थक्के आना।
  • हर घंटे पैड बदलना।

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एबर्नामल युटरिन ब्लीडिंग हार्मोन में होने वाला एक असंतुलन है। जब गर्भाशय एग रिलीज करता है, तब हार्मोन यूटरस की लाइन को बहाने (वहां जमे रक्त कोशिकाओं) के लिए प्रोत्साहित करता है। इस प्रक्रिया को एंडोमेट्रियम कहा जाता है, जो लड़कियां टीनएज में हैं या जिनकी उम्र मेनोपॉज के करीब हैं, उनमें एंडोमेट्रियम की प्रक्रिया ज़्यादा होती है, जिससे पीरियड्स में अनियमितता या ज़्यादा स्पॉटिंग होती है। 

एबर्नामल युटरिन ब्लीडिंग के कई कारण हो सकते हैं, जैसे- 

  • बर्थ कंट्रोल दवाएँ और दूसरी दवाएं लेना।
  • बहुत तेज़ी से वजन का घटना या बढ़ना।
  • मानसिक या शारीरिक तनाव का होना।
  • अंतर्गर्भाशयी डिवाइस (IUD) का इस्तेमाल। 

असामान्य ब्लीडिंग के अन्य कारणों में यूटरस में प्रॉब्लम भी हैं। साथ ही कई महिलाओं को फाइब्रॉइड हो जाता है, यह नॉन-कैंसर ट्यूमर होता है, जो यूटरस या यूटरस की दीवारों की मांसपेशियों में बढ़ता है। पॉलिप भी इसी तरह यूटरस में बढ़ जाता है, जो यूटरस की लाइन में अपनी जगह बनाता जाता है। इसके अलावा एडिनोमायोसिस ऐसी स्थिति है, जिसमें कोशिकाएं यूटरस की लाइन में बढ़ने वाली कोशिकाओं के जैसी होती हैं और यूटरस की मांसपेशियों हिस्से में ही विकसित होती हैं।

मेडिकल में हुए बदलावों से एबर्नामल युटरिन ब्लीडिंग के जांच में आसानी हो गई है। इसमें डॉक्टर अनेकों सवाल पूछते हैं, जैसे- 

  • अल्ट्रासाउंड – डॉक्टर रिप्रोडक्टिक पार्ट्स को देखने के बाद अल्ट्रासाउंड करने को कह सकते हैं। इस टेस्ट से पॉलिप्स और फाइब्रॉइड की ग्रोथ की जानकारी मिलती है।
  • ब्लड टेस्ट – ब्लड टेस्ट के जरिए हार्मोन का स्तर और कंप्लीट ब्लड काउंट का पता लगाया जाता है। लाल रक्त कणिकाएं कम होने पर एनीमिया हो सकता है।
  • एंडोमेट्रियल बायोप्सी –  यूटरस से ब्लीडिंग का कारण किसी तरह की एब्नॉर्मल ग्रोथ या यूटरस लाइन मोटी है तो डॉक्टर टेस्ट के लिए यूटरस का टिश्यू लेकर जांच कर सकते हैं।

एबर्नामल युटरिन ब्लीडिंग का इलाज सर्जरी और दवाओं के जरिए किया जाता है। हार्मोन थैरेपी, रिलीजिंग हार्मोन एगोनिस्ट, और ट्रानेक्सामिक एसिड जैसे दवाएं शामिल हैं। सर्जरी में एंडोमेट्रियल एब्लेशन, मायोमेक्टॉमी और हिस्टेरेक्टॉमी शामिल है। महिलाओं को अपनी जांच करवाते रहना चाहिए ताकि सही वक्त पर बीमारी का पता चल जाए। परिवारवालों को भी महिलाओं के स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए क्योंकि महिलाएं ही घर की नींव होती हैं। 

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तस्वीर साभार : healthline


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