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सुशांत सिंह राजपूत के निधन के बाद हर कोई स्तब्ध है क्योंकि यह हर किसी के लिए सोच से परे है। हम सबने उन्हें हमेशा हंसते-मुस्कुराते देखा है, उन्हें कभी हताश या निराश नहीं देखा है। शायद वे अपने आंसू किसी को नहीं दिखाना चाहते हो क्योंकि समाज एक पुरुष के आंसू स्वीकार नहीं कर पाता है। इसके साथ ही और भी कई वजह हो सकती होंगीं। जैसे- बॉलीवुड के सितारे अगर सबके सामने आकर अपना दुख बताएंगे, ऐसे में उनके आंसुओं का गलत मतलब निकाला जा सकता था। यहां आंसुओं की कीमत लगाना लोग बखूबी जानते हैं।

हमारे समाज की विडंबना है कि हमें पुरुषों को रोते देखना बेहद अज़ीब लगता है क्योंकि हमारी सामाजिक संरचना में पुरुष रोते नहीं हैं। पुरुष अगर रोते हों तो उन्हें कहा जाता है कि अरे! आंसू बहा रहा है। लड़कियों को रोना और हालात को कोसना अच्छा लगता है मगर तुम्हें नहीं। लड़के रोते नहीं हैं क्योंकि मर्द को दर्द नहीं होता है। समाज के ढ़ांचे के कारण ही पुरुषों को अपने आंसू छिपाने पड़ते हैं क्योंकि समाज पुरुषों को रोते हुए नहीं देखना चाहता है। उसने मर्दों को आंख तो दिए हैं मगर रोने की इजाज़त नहीं दी है। हमारे समाज में हमेशा पुरुषों को बलशाली, लड़ाकू, हिम्मती और गुस्सैल माना जाता है। 

यह कभी नहीं देखा जाता है कि एक पुरुष के अंदर भी कई भावनाएं हो सकती हैं, उसे भी लोगों के साथ मिलकर न केवल हंसी मज़ाक बल्कि उसके साथ अपनी परेशानियों को भी शेयर करना है क्योंकि उसके अंदर भी दर्द का तूफान है, जो किनारा तलाशता है ताकि दिल शांत हो सके मगर समाज इतनी आसानी से यह किनारा नहीं मिलने देगा। साथ ही अधिकांश पुरुष भी अपनी इस भावना को ज़ाहिर नहीं करेंगे। अपनी गर्लफ्रेंड के सामने अगर अपने जज्बातों को खुलकर रखा तो हो सकता है कि वह कहे कि तुम बहुत चीप हो रहे हो। कुछ लड़कियां यहां तक भी कह सकती हैं कि लड़कियों के तरह क्यों कर रहे हो?

इसके साथ अगर घर पर अपनी मां या अन्य किसी सदस्य के सामने भी दिल खोलकर अपने जज्बात ज़ाहिर नहीं किए तब एक रास्ता दोस्तों का बचता है, मगर ऐसे दौर में सच्चे दोस्तों का होना भी खुशनसीबी है। अब पुरुष इसके बाद अपनी फिलिंग्स को अपने अंदर ही रखेंगे ओर किसी से नहीं कहेंगे। यह सारी चीज़ें ही डिप्रेशन की ओर लेकर जाती हैं, जिसके बाद इंसान कोई भी गलत कदम उठा लेता है। 

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आत्महत्या करने का सबसे बड़ा कारण अपनी फिलिंग्स को छिपाना है। इसके साथ आंसुओं की कीमत लगाने वाले भी कई मिलेंगे। पुरुषों को इन सब धारणाओं को तोड़ना है। समाज के लोक-लाज के चक्कर में अपने आप को एक्सप्रेस ना करना आपको भारी पर सकता है। इससे कई परेशानियां होनी शुरु हो जाती है, जिसमें आत्महत्या सबसे बड़ा कदम है। इसके बाद घर में डिप्रेशन और हाइपरटेंशन की दवाएं शामिल हो जाती हैं। लोग घुटन का शिकार होने लगते हैं, अकेले रहना शुरु कर देते हैं और खुद को बुरा महसूस करने लगते हैं। धीरे-धीरे स्थिति बद्तर होनी शुरु हो जाती है। पुरुष बोलते नहीं हैं कि वे किस तरह की स्थिति से गुज़र रहे हैं, जिससे वे अवसाद के दलदल में फंसते चले जाते हैं। इस तरह की मानसिकता से बाहर निकलना ही होगा क्योंकि तभी पुरुष भी अपनी भावनाओं को व्यक्त कर पाएंगे। हालांकि इसमें आसपास के लोगों को भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। केवल एक कदम भी अगर कोई इंसान बढ़ाता है, उससे एक संबल मिलता है। 

विनोद कुमार शुक्ल की लिखी कविता रोज़ वर्तमान समय को बिल्कुल सही दर्शाती है। 

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे

अभी भी लोगों को इसी कविता को आधार मानकर आगे बढ़ना होगा। पुरुषों को भी इस मानसिकता से बाहर आकर खुद और समाज के बनाए ढ़ांचे से बाहर आना होगा। अपनी भावनाओं को सबके सामने रखना होगा ताकि परेशानियों और अकेलेपन का मंज़र सामने आकर खड़ा हो जाता है।

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तस्वीर साभार : livingnow

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