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बेटी के जन्म के साथ पिता का भी जन्म होता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ पिता और बेटी ज़िंदगी और रिश्तों में गढ़ते-बढ़ते है। पिता और बेटी का रिश्ता संवेदनशील होने के साथ-साथ ज़िम्मेदारी भरा और नाज़ुक माना जाता है। बचपन से एक बेटी अपने पिता के सबसे करीब होती है और उसके लिए उसका पिता सुपर हीरो होता है। वह अपने पिता में हमेशा एक प्रोटेक्टिव इंसान की छवि देखती है, जो उसे हर परेशानियों से निकलने में मदद करता है। बचपन से ही वह अपने पिता से हर बात शेयर करती है। अपनी फरमाइशों और नखरों को अपने पिता के सामने रखती है ताकि पिता अपनी बिटिया को गोद में उठाकर दुलार-प्यार करे मगर एक उम्र में प्रवेश करते ही, यह रिश्ता दायरों में बंधना शुरु हो जाता है। बेटी धीरे-धीरे अपनी माँ के करीब होते चली जाती है और पिता का दामन प्रत्यक्ष रुप से कमज़ोर पड़ने लगता है क्योंकि पिता पर समाज और ज़िम्मेदारियों का आवरण गहराने लग जाता है।

हमारा समाज हमेशा कई चेहरों को गढ़ता है क्योंकि समाज कई पीढ़ियों को सामने रखकर चरित्र का गठन करता है। एक पिता और बेटी जो हमेशा से हर परेशानियों और मज़ाक को साथ बैठकर बांटने का काम किया करता हैं, वह अचानक से दूर होने लग जाता है। आखिर यह अनकही दूरी क्यों आने लग जाती है कि एक बेटी अपने पिता से बातें छुपाने पर मज़बूर हो जाती है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ‘समाज’ होता है क्योंकि समाज कभी भी पिता और बेटी के रिश्तों को दोस्ती में ढ़लने नहीं देता है। साथ ही एक दूसरा पहलू यह भी है कि एक पिता की मानसिकता में भी बदलाव आने शुरु हो जाते हैं, जिसके लिए समाज के साथ-साथ कुछ अन्य कारण भी ज़िम्मेदार होते हैं।

समाज के सामने पिता की छवि कड़क स्वभाव और शांत प्रवृति की गढ़ी गई है ताकि बच्चे खासकर बेटियां अपने पिता से दूर रहे। यही कारण बनता है कि एक बेटी अपने पिता से दूर होने लग जाती है। कभी-कभी अपनी बेटी को खुश रखने और उसकी ख्वाहिशों को पूरा करने का वादा करने वाला यही पिता अपनी बेटी की खुशियों को भूलकर समाज के झूठे आडंबर में फंस जाता है, जिसके बाद उसकी बेटी की खुशियां सामाजिक इज़्जत और मान-प्रतिष्ठा के सामने धूमिल पड़ जाती है और यही से दूरियों का सिलसिला बढ़ना शुरू हो जाता है। फिर यही पिता अपनी बेटी की नज़र में बदल जाता है। बेटी सोचती है कि उसके पापा अब बदल गए हैं क्योंकि उनके लिए बेटी की खुशियों से ज्यादा अब समाजिकता ज़रुरी हो गई है।

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हर उम्र में एक पिता और बेटी को बातें शेयर करनी चाहिए ताकि बातचीत का अभाव न हो और रिश्ते की डोर मज़बूत बनी रहे।

वही पिता की एक ऐसी छवि भी देखने को मिलती है, जिसमें पिता अपनी बेटी के लिए समाजिकता के हर आडंबर से लड़ने को तैयार हो जाता है। यहां उस पिता के लिए बेटी की खुशी सबसे ज्यादा ज़रुरी होती है क्योंकि उसने अपनी बेटी से वादा किया है कि वह हर परिस्थिति में अपनी बेटी का साथ निभाएगा। यह पिता समाज की नज़रों में कमज़ोर माना जाता है क्योंकि समाज की नज़र में इस पिता ने अपनी बेटी को बहकने के लिए उकसाया है। उसने अपनी बेटी को हिस्से का आसमान दिया है इसलिए समाज उस पिता को कमज़ोर करार देता है, मगर यही पिता अपनी बेटी के लिए बेस्ट फादर होता है।

हर बेटी अपने पिता को बेस्ट मानती है मगर पिता को भी अपनी बेटी की खुशियों की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। बेटी को भी अपने पिता का साथ हर कदम पर देना चाहिए ताकि दोनों साझे तरीके से रिश्ते को निभा सकें। कभी भी समाज के नज़र से अपने रिश्ते को नहीं तोलना चाहिए क्योंकि अगर रिश्ता मायने रखता है, तब समाज को भूल जाना चाहिए और अगर समाज मायने रखता है, तब रिश्ते को भूल जाना चाहिए क्योंकि दोनों को बचाना संभव नहीं है। आप किसी एक के साथ ही आगे बढ़ सकते हैं।

हर उम्र में एक पिता और बेटी को बातें शेयर करनी चाहिए ताकि बातचीत का अभाव न हो और रिश्ते की डोर मज़बूत बनी रहे। माँ के साथ लड़की एक समय बाद ज्यादा खुल जाती है और स्कूल से लेकर कॉलेज तक की बातों को शेयर करने लगती है मगर पिता के साथ आज भी कई लड़कियां, कई बेटियां अनेकों बात शेयर नहीं कर पातीं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमने पिता और बेटी के रिश्ते को संयमित कर दिया है। संवेदना के साथ-साथ रिश्तों में प्यार भी बना रहना चाहिए।

इन बातों को समझते हुए आज स्थिति थोड़ी बदली ज़रुर है मगर अभी भी बातचीत का दायरा एक उम्र के बाद सिकुड़ जाता है, जिसमें बदलाव करने की जरुरत है। समाज में बदलाव लाने के लिए हमें ख़ुद से शुरुआत करनी होगी ताकि रिश्तों का दायरा उम्र की रेखा को पार कर सके। इसी तर्ज़ पर, इस फादर्स डे पर देखिए ये विडियो ‘बाप वाली बात’ –

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तस्वीर साभार : thebetterindia

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