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जैसा कि हम जानते है, जून के महीने में ‘प्राईड मंथ’ मनाया जाता है। यानी LGBTQ या ‘क्वीयर’ होने का जश्न मनाने का महीना। इस दौरान प्राईड परेड निकाले जाते हैं, लिंग और लैंगिकता संबंधित फ़िल्मों की स्क्रीनिंग होती है और विभिन्न लैंगिक परिचयों के लोग एक-दूसरे से मिल सकें, एक-दूसरे से सीख सकें इसके लिए सभाओं और सम्मेलनों का आयोजन होता है। हालांकि एक वैश्विक महामारी के चलते इस साल प्राईड परेड संभव नहीं हो पाया, फिर भी दुनियाभर के क्वीयर व्यक्ति सोशल मीडिया के ज़रिए जुड़कर अपने अपने तरीकों से प्राईड मना रहे हैं। प्राईड अपने मौलिक अधिकारों के संघर्ष में आगे बढ़ने का जश्न है। अपने वजूद, अपने स्वाभिमान और अपनी खुशियों का उत्सव है।

पचास साल पहले शुरू किया गया ‘प्राईड मंथ’ आज दुनियाभर में मनाया जाता है। पर यह सिर्फ एक सालाना उत्सव या लैंगिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि शोषणकारी शासन व्यवस्थाओं और रूढ़िवादी सामाजिक परंपराओं को एक कठोर चुनौती है। एक संदेश है कि अब हम दबेंगे नहीं, न किसी को शोषित होने देंगे। तमाम देशों में क्वीयर समुदाय ने प्राईड परेडों में अपनी सरकारों का विरोध किया है और सामाजिक असमानता व भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है।

पिछले साल ब्राज़ील के साओ पॉलो के प्राईड परेड में ‘लूला लीव्र’ यानी ‘लूला को आज़ाद करो!’ के नारे लगाए गए थे। ‘लूला’ या लूईज़ इनासियो लूला डा सिल्वा ब्राज़ील के पूर्व राष्ट्रपति हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के फ़र्ज़ी मामलों में फंसाकर 13 साल के लिए कैद किया गया है और जिन्हें रिहा करवाने के लिए दक्षिण अमेरिका के तमाम राजनेता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित हुए हैं। इस प्राईड परेड में वर्तमान राष्ट्रपति जाईर बॉल्सोनारो की कट्टरवादी, होमोफ़ोबिक, नस्लवादी, मूलनिवासी-विरोधी सरकार के ख़िलाफ़ भी नारे लगे।

अमेरिका के मिसूरी राज्य के कई प्राईड परेडों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर पुलिसिया दमन का विरोध हुआ है। ‘फ़क द पुलिस’ के नारे लगाए गए हैं। कई और जगह राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति माईक पेंस के इस्तीफ़े की मांग की गई। जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या के बाद से ‘ब्लैक लाईव्स मैटर’ आंदोलन और क्वीयर कार्यकर्ताओं में एकता बढ़ गई है और कई प्राईड परेडों में नस्लीय भेदभाव और ब्लैक लोगों पर पुलिसिया हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठी है।

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इसी साल फरवरी में मुंबई के एक प्राईड परेड में शामिल 51 लोगों को राष्ट्रद्रोह के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार किया गया था क्योंकि उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के ख़िलाफ़ और कश्मीर को भारतीय सेना के शासन से आज़ाद करने के पक्ष में नारे लगाए थे। इससे पहले भी देशभर के कई प्राईड कार्यक्रमों में सरकार या उसकी नीतियों के ख़िलाफ़ विरोध हुआ है और धार्मिक कट्टरवाद, सांप्रदायिकता, जातिवाद जैसी सामाजिक कुरीतियों की निंदा भी की गई है। कई आलोचकों ने कहा है कि प्राईड में राजनैतिक विरोध का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। मुंबई के इस प्राईड परेड के आयोजनकर्ता ‘क्वीयर आज़ादी मूवमेंट’ ने भी बताया था कि वह प्राईड कार्यक्रमों में राजनैतिक विवादों का समर्थन नहीं करता और ऐसा करनेवालों के साथ कोई संबंध नहीं रखता। लोगों की आमतौर पर यही राय है कि प्राईड का पालन प्रेम और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उत्सव की तरह करना चाहिए और इसमें किसी तरह कि राजनैतिक आलोचना नहीं होनी चाहिए।

प्राईड राजनैतिक है। और होना भी चाहिए। शोषणकारी व्यवस्था पर जीत तभी हासिल हो सकती है जब समाज का हर तबका सशक्त हो।

पर देखा जाए तो प्राईड और राजनीति एक दूसरे से पृथक नहीं हैं। बल्कि प्राईड खुद ही एक राजनैतिक ऐलान है। एक शोषित वर्ग का अपने लिए खड़ा होना और अपने बुनियादी हक़ जताना ही प्राईड है और इतिहास पलटकर देखा जाए तो इसकी शुरुआत क्रूर प्रशासनिक ताकतों के विरोध से ही हुई थी। जून 1969 में अमेरिका के न्यू यॉर्क सिटी से कुछ दूरी पर ‘स्टोनवॉल इन’ में इतिहास रचा गया था। यह एक ‘गे बार’ था। उस समय अमेरिकी समाज में समलैंगिकता या भिन्न लैंगिकता को स्वीकार नहीं किया जाता था। क्वीयरता को मानसिक बीमारी या सामाजिक गुनाह की तरह देखा जाता था और कई सार्वजनिक स्थानों पर क्वीयर लोगों का आना-जाना ही वर्जित था। इसी वजह से उन्होंने अपने खुद के क्लब, बार, होटल वगैरह खोलें, जिनमें से एक था स्टोनवॉल। इन जगहों पर आए दिन पुलिस की छापामारी होती थी, निर्दोष क्वीयरों को गिरफ़्तार किया जाता था और उन पर ज़ुल्म किए जाते थे।

28 जून को रात के डेढ़ बजे पुलिस स्टोनवॉल में आ पहुंची। उन्होंने बताया कि यह बार बंद कर दिया जाएगा और वहां मौजूद हर किसी की तलाशी ली जाएगी। आमतौर पर ऐसी ‘तलाशी’ में सबसे ज़्यादा पीड़ित होते थे ट्रांसजेंडर व्यक्ति और महिलाएं। क्योंकि पुलिस महिलाओं के कपड़े पहने हर इंसान से ज़बरदस्ती कपड़े उतरवाकर उनके यौनांग देखकर निर्धारित करती थी कि वे ‘मर्द’ हैं या ‘औरत’। अगर ‘मर्द’ निकले तो उन्हें गिरफ़्तार करके उन पर नृशंस अत्याचार किया जाता था जिससे उनकी मौत भी होती थी।

इस बार भी पुलिस ऐसा ही करने वाली थी पर जो हुआ वह अप्रत्याशित था। स्टोनवॉल में मौजूद लोगों ने पुलिस पर हल्ला बोल दिया। क्रांति के गाने गाते हुए उन्होंने बोतलों, गिलासों, चाकुओं, प्लेटों से वार किया। यह जंग पांच दिनों तक जारी रही और इसमें स्टोनवॉल वालों का सहयोग वहां के गांववासियों और पड़ोसी क्लबों होटलों में मौजूद लोगों ने भी की। यही वह पल था जब क्वीयर लोग इतिहास में पहली बार संगठित हुए और अपने अधिकारों के लिए राजनैतिक शोषण के ख़िलाफ़ लड़े। 28 जून 1970 को स्टोनवॉल के पास ही सबसे पहला प्राईड परेड निकाला गया और तभी से जून को प्राईड मंथ के तौर पर मनाया जाता है।

स्टोनवॉल विद्रोह के 51 साल होने को हैं। पर आज भी हम क्वीयरों को अपने योग्य सम्मान मिलना बाकी है। आईपीसी धारा 377 से भले ही समलैंगिकता को हटा दिया गया हो, पर आज भी ट्रांसजेंडर लोगों को पुलिस की हवालात में मार दिया जाता है। आज भी पारिवारिक और सामाजिक उत्पीड़न की वजह से क्वीयर आत्महत्या करते हैं। शोषण से लड़ना हम भले ही सीख गए हों मगर शोषित हम अभी भी हैं। और शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए ज़रूरी है हर उस वर्ग के लिए आवाज़ उठाना जो शोषण से पीड़ित हो। जाति, धर्म, वर्ग, नस्ल, लिंग के आधार पर वंचित हर इंसान से सौहार्द जताए बिना यह लड़ाई जीतना नामुमकिन है। इसलिए प्राईड राजनैतिक है। और होना भी चाहिए। शोषणकारी व्यवस्था पर जीत तभी हासिल हो सकती है जब समाज का हर तबका सशक्त हो।

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तस्वीर साभार : foreignpolicy

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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