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बीते महीने में हमने ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाया है। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से जूझने के लिए पर्यावरण संरक्षण का महत्व हम सब धीरे-धीरे समझने लगे हैं। आज कई लोग अपनी तरफ़ से पर्यावरण को बचाने की कोशिशें कर रहे हैं। पेड़ लगाने, पानी बचाने, और ‘ऑर्गैनिक’ सामग्री का इस्तेमाल करने की सलाह हर जगह दी जा रही है। पर कुछ लोग हैं जिनके अकेले का योगदान शायद हम सबके इकट्ठे प्रयासों से ज़्यादा है। अपने काम से ये पर्यावरण में सुधार लाने के साथ साथ हमारे लिए एक उदाहरण भी खड़ा करते हैं। एक ऐसी हस्ती हैं कर्नाटक की पर्यावरण कार्यकर्ता तुलसी गौडा। जिन्हें ‘वन विश्वकोश’ के नाम से जाना जाता है। 

72 साल की उम्र में तुलसी गिनकर बता नहीं सकतीं कि उन्होंने ज़िंदगीभर कुल कितने पेड़ लगाए हैं। वे 40,000 का अंदाज़ा लगाती है, पर असली संख्या शायद एक लाख से भी ऊपर है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी जंगल संरक्षण को समर्पित कर दिया है और पेड़ों के बारे में उनके ज्ञान की सीमा नहीं है। तुलसी गौड़ा अपने क्षेत्र के हर जंगल को अपने हाथ की लकीरों से अच्छा पहचानती हैं, जिसकी वजह से उन्हें जंगलों का ‘एन्साइक्लोपीडिया’ या विश्वकोश कहा जाता है। 

तुलसी का जन्म कर्नाटक के हलक्की जनजाति के एक परिवार में हुआ था। बचपन में उनके पिता चल बसे थे और उन्होंने छोटी उम्र से मां और बहनों के साथ काम करना शुरू कर दिया था। इसकी वजह से वे कभी स्कूल नहीं जा पाईं और पढ़ना-लिखना नहीं सीख पाईं। 11 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई पर उनके पति भी ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहे। अपनी ज़िंदगी के दुख और अकेलेपन को दूर करने के लिए ही तुलसी ने पेड़-पौधों का ख्याल रखना शुरू किया। वनस्पति संरक्षण में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और वे राज्य के वनीकरण योजना में कार्यकर्ता के तौर पर शामिल हो गईं। साल 2006 में उन्हें वन विभाग में वृक्षारोपक की नौकरी मिली और चौदह साल के कार्यकाल के बाद वे आज सेवानिवृत्त हैं। इस दौरान उन्होंने अनगिनत पेड़ लगाए हैं और जैविक विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

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उनका योगदान पेड़ पौधों की देखभाल और रोपण तक सीमित नहीं है। उन्होंने वन्य पशुओं का शिकार होने से रोका है और जंगली आग के निवारण हेतु काम किया है। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कई सरकारी और औद्योगिक गतिविधियों का उन्होंने विरोध भी किया है। वनों और पर्यावरण के संरक्षण हेतु योगदान के लिए उन्हें इस साल पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वे कर्नाटक सरकार के राज्योत्सव पुरस्कार, इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार, श्रीमती कविता स्मारक पुरस्कार से भी भूषित की गई हैं। 

तुलसी गौड़ा अपने क्षेत्र के हर जंगल को अपने हाथ की लकीरों से अच्छा पहचानती हैं, इसलिए उन्हें जंगलों का ‘एन्साइक्लोपीडिया’ कहा जाता है।

स्कूल में शिक्षित न होने के बावजूद वनों और पेड़-पौधों पर तुलसी का ज्ञान किसी पर्यावरणविद या वैज्ञानिक से कम नहीं है। उन्हें हर तरह के पौधों के फ़ायदे के बारे में पता है। किस पौधे को कितना पानी देना है, किस तरह की मिट्टी में कौन-से पेड़-पौधे उगते हैं, यह सब उनकी उंगलियों पर है। भारतीय वन सेवा के एएन येलप्पा रेड्डी ने उनकी सराहना करते हुए कहा है, ‘उनका योगदान अमूल्य है। बिल्कुल अमूल्य। वे जंगलों की भाषा समझतीं हैं। वे पेड़ों की भाषा समझती हैं। उन्हें पेड़ों के अंकुरन, उनके जीवन की भाषा समझ में आती है। वे ये सब विज्ञान की भाषा में समझा नहीं सकतीं मगर मालूम उन्हें सब है। और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है।’ सेवा-निवृत्त होने के बाद तुलसी आज भी वनों के संरक्षण के लिए सक्रिय हैं। वे आज भी पेड़ लगाती रहती हैं और बच्चों को पेड़ों के महत्व के बारे में सिखाती हैं। हर बच्चे को वे सिखाती हैं कि, ‘हमें जंगलों की ज़रूरत है। जंगलों के बिना हर जगह सूखा पड़ जाएगा। फ़सलें जीवित नहीं रह पाएंगी। सूरज की धूप बर्दाश्त करने लायक नहीं रहेगी। अगर जंगल बचेंगे, तो यह देश बचेगा। हमें और जंगल बनाने की आवश्यकता है।’

तुलसी गौडा जैसे लोगों के प्रयासों से पर्यावरण की रक्षा कुछ हद तक हो पाई है। मगर यह काफ़ी नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में आज हर घंटे एक पेड़ काटा जाता है। वायु प्रदूषण मृत्यु का एक बड़ा कारण हो गया है। भू क्षरण और पानी की कमी का प्रभाव लोगों के जीवन में नज़र आता है। और हर साल बड़ी औद्योगिक योजनाओं के लिए जंगलों का सफ़ाया होता है। जिससे पर्यावरण को ख़तरा पहुंचने के साथ साथ कई आदिवासी समुदायों के जीवन का भी नुकसान होता है। 

हमारी धरती को बचाने के लिए सिर्फ़ एक तुलसी गौडा काफ़ी नहीं हैं। हम सबको अपनी तरफ़ से पर्यावरण और प्रकृति की रक्षा करने की कोशिश करनी चाहिए। आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ पृथ्वी छोड़ना हमारा कर्त्तव्य है जो हम सबके सम्मिलित प्रयासों के बिना पूरा नहीं होगा। आज जब ग्लोबल वार्मिंग हमारे भविष्य के लिए एक बड़ा ख़तरा साबित हुआ है, हमें ज़रूरत है पेड़ों के संरक्षण की तरफ़ ज़्यादा से ज़्यादा ध्यान देने की। उम्मीद है तुलसी गौडा के प्रयासों को हम आगे बढ़ाते रहेंगे।

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तस्वीर साभार : punjabkesari

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