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1 जून 2020। केरल के मलप्पुरम में रहने वाली देविका बालाकृष्णन आत्महत्या से मृत पाई जाती है। एक गरीब दलित परिवार से आने वाली देविका नवीं कक्षा में पढ़ती थी। वह पढ़ाई में बहुत तेज़ थी। पर इस बीच कोरोनावायरस महामारी के चलते स्कूल बंद रहने के कारण उसकी पढ़ाई को नुकसान पहुंच रहा था। घर की टीवी खराब होने की वजह से वह सरकार द्वारा प्रसारित ‘वर्चुअल क्लासरूम’ नहीं देख पा रही थी। उसके घर में स्मार्टफ़ोन या इंटरनेट भी नहीं था। परीक्षाएँ भी नज़दीक आ रही थीं और वह बहुत तनावग्रस्त रहती थी। परीक्षा में पास न हो पाने की आशंका और डर के कारण उसकी मौत हुई।

इस घटना के महज़ 3-4 दिन बाद पंजाब में भी ऐसा ही हुआ। पंजाब के मनसा में ग्यारहवीं कक्षा की एक लड़की 5 जून को मृत पाई गई। उसकी मौत भी आत्महत्या से हुई। मौत का कारण भी स्मार्टफ़ोन जैसे संसाधन न होने की वजह से पढ़ाई में हो रही नुकसान था। 

इन परिस्थितियों को नजर में रखते हुए केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने जुलाई में होनेवाली बोर्ड की परीक्षाएँ रद्द कर दी हैं। कई राजकीय बोर्डस की परीक्षाएँ भी रद्द हो गईं हैं। पर जहां स्कूल और कई कॉलेजों ने वार्षिक परीक्षाएँ बंद कर दी हैं, कुछ संस्थाएं अभी भी ऐसा करने को नामंजूर हैं। एक उदाहरण है दिल्ली विश्वविद्यालय जो इस महीने ऑनलाइन माध्यम से ‘ओपेन बुक’ परीक्षाएँ लेने वाला है। इसके ख़िलाफ़ छात्र और अध्यापक पुरजोर संघर्ष कर रहे हैं पर अभी तक विश्वविद्यालय ने परीक्षा बंद करवाने की तरफ़ कोई कदम नहीं उठाया।

विरोध इसी बात पर हो रहा है कि हमारे देश में ऑनलाइन परीक्षा एक सुविधाजनक विकल्प नहीं है। हमारे समाज का एक बड़ा तबका आज भी गरीबी में जी रहा है। इंटरनेट, स्मार्टफोन जैसे संसाधन तो छोड़ो, उन्हें खाने-पीने और रहने की न्यूनतम सुविधाएं  भी मुश्किल से प्राप्त हैं। 2015 के आंकड़ों के अनुसार भारत में सिर्फ़ 18 फ़ीसद जनता ही स्मार्टफोन का प्रयोग करती है। ऑनलाइन शिक्षा का लाभ भी इसलिए बहुत कम लोग उठा पाए हैं । इस छोटे, संभ्रांत अंश की स्थिति को मद्देनज़र रखते हुए पूरे देश के छात्रों का भविष्य तय करने के लिए परीक्षाएँ रखना उनके साथ बेहद नाइंसाफ़ी है। 

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वैश्विक महामारी में यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि हर छात्र की ज़िंदगी स्वाभाविक रूप में है और वे सामान्य दिनों की तरह पढ़कर पास हो जाएंगे।

दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी (डीटीयू) के एक छात्र अयान कहते हैं, ‘मेरा प्लेसमेंट हो चुका है। जॉइनिंग अगस्त या सितंबर के आसपास है। अब नौकरी शुरू करने के लिए मुझे कॉलेज से एग्जाम का ‘पास सर्टिफिकेट’ दिखाना पड़ेगा, मगर पता नहीं मैं एग्जाम कैसे दे पाऊंगा। उत्तर प्रदेश के मेरे गांव में दो-तीन घंटों तक इंटरनेट या बिजली का इस्तेमाल कर पाना नामुमकिन के बराबर है। यूनिवर्सिटी की ‘ऑफलाइन’ परीक्षा भी अगस्त या सितंबर के आसपास है, जिस समय मुझे ऑफिस जॉइन करना होगा।’

 अयान अकेले नहीं हैं। वंचित वर्गों के हजारों छात्रों के लिए ऑनलाइन परीक्षा न दे पाने का कारण जगह की कमी भी है। कई छात्र अपने पूरे परिवार के साथ एक ही कमरे में रहते हैं और अकेले बैठकर लिखने की जगह उन्हें नसीब नहीं है। इसी कारण कई छात्र ऑनलाइन क्लासों में ही उपस्थित नहीं रह पाए, परीक्षा तो फिर भी दूर की बात है। 

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सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं कश्मीर और उत्तर-पूर्वी भारत जैसे विचलित क्षेत्रों से आनेवाले छात्र। 5 अगस्त 2019 में कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के बाद वहाँ की स्थिति अभी भी स्वाभाविक नहीं है। इंटरनेट लंबे समय तक बंद रहने के बाद अब 2G सेवाएं किसी तरह चालू हुई हैं, और सरकारी वेबसाइटों के अलावा सभी साइटें ब्लॉक हैं। नियमित हिंसा और शोषण का असर छात्रों के दिमागी हालत पर भी पड़ता है और उनकी पढ़ाई का नुक़सान होता है। ऐसे में परीक्षा तनाव के एक अतिरिक्त कारण के अलावा कुछ नहीं है।

दूसरे शहरों या देशों से आनेवाले छात्र भी ऑनलाइन परीक्षा की मुसीबत नहीं झेल पा रहे। लॉकडाउन की शुरुआत में घर जाने से पहले वे किताबें हॉस्टल या कमरे में छोड़ आए थे, यह सोचकर कि कुछ ही दिनों में वापस आ जाएंगे। क्योंकि उनके पास किताबें नहीं हैं, ज़ाहिर है कि परीक्षा की तैयारी नहीं हो पाई। 

एक वैश्विक महामारी के दौरान यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि हर छात्र की ज़िंदगी स्वाभाविक रूप से चल रही हो और वे सामान्य दिनों की तरह पढ़कर पास हो जाएंगे। कई छात्र मानसिक रूप से तनावग्रस्त हैं, कइयों के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, कइयों के परिवार वाले बीमार हैं। इसके अलावा ऊपर उल्लेख की गई अमीर-गरीब, सवर्ण-दलित इत्यादि सामाजिक समस्याएं तो हैं ही, जिसके कारण हर कोई समान रूप से ऑनलाइन शिक्षा और परीक्षा प्रणाली का हिस्सा नहीं बन सकता।

ऐसे हालातों में हमारी शैक्षणिक संस्थाओं को संवेदनशील होने की ज़रूरत है। यह अहसास होना ज़रूरी है कि हर बच्चे की स्थिति एक ही नहीं है और सुविधा-संपन्नों के लिए बना सिस्टम हर किसी के ऊपर नहीं थोपा जा सकता। यह भी सोचना चाहिए कि हालात बहुत बुरे चल रहे हैं और इस वक़्त कई परीक्षार्थियों का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है। इस वक़्त परीक्षाएँ नहीं होनी चाहिए और सभी छात्रों को इस साल पास कर देना चाहिए। इस साल की विशेष परिस्थितियों को नज़र में रखते हुए ऐसा ही कुछ करने की आवश्यकता है।

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तस्वीर साभार : thewhistler

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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