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‘ये देखो, लड़का तो इतना हैंडसम है। पर इसकी बीवी इतनी मोटी है।

‘कितना खाती है, मोटी? फट जाएगी एक दिन!

‘बेटा, ये स्कर्ट  वैसे तो ठीक है, पर तुम्हारे फिगर पे अच्छी नहीं लग रही।

‘थोड़ा वज़न कम कर लो। नहीं तो कौन शादी करेगा तुमसे?

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अगर आपके शरीर का वज़न थोड़ा ज़्यादा है या सीधे कहूं कि अगर आप मोटे हैं, तो आपने अपनी ज़िंदगी में इस तरह के ताने ज़रूर सुने होंगे। हमारे समाज में सुंदरता के पैमाने इस तरह तय हैं कि दुबले-पतले लोगों को ही सुंदर माना जाता है। फ़िल्मों, टीवी विज्ञापनों, पत्रिकाओं में हम जिन ‘खूबसूरत’ लोगों को देखते हैं, वे सभी ज़्यादातर पतले ही होते हैं। उनमें से किसी के शरीर में अगर ज़रा भी मोटापा हो तो एडिटिंग से उसे छिपा दिया जाता है। इस तरह हमारे मन में यह धारणा पैदा कर दी जाती है कि जिनका वज़न ज़्यादा है, वे कभी खूबसूरत नहीं हो सकते। वे कभी तस्वीरों या फ़िल्म के परदे पर अच्छे लग ही नहीं सकते। 

मोटे लोग इसीलिए आज भी हमारे लिए व्यंग्य के पात्र ही बने रह गए हैं। पतले लोगों की तरह अगर वे फैशनेबल कपड़ों व पोज़ में तस्वीरें खिचवाना चाहें तो तारीफ़ की जगह उन्हें तिरस्कार मिलता है। मोटापे को बदसूरती और नकारात्मकता के साथ ही जोड़ा जाता है। हम कह सकते हैं कि हमारा समाज बेहद ‘फैट-फोबिक’ (मोटापा-द्वेषी) है जो आए दिन लोगों की ‘फैट-शेमिंग’ (वज़न के आधार पर मानसिक उत्पीड़न) करते नहीं थकता। इसी ‘फैट-फोबिया’ और ‘फैट-शेमिंग’ से लड़ने के लिए पैदा हुआ था ‘फैट ऐकसेपटेन्स मूवमेंट’ या मोटापा-स्वीकृति आंदोलन। क्या है यह आंदोलन? यह कब शुरू हुआ था और इसके मक़सद क्या हैं? बताते हैं।

फैट ऐकसेपटेंस मूवमेंट का इतिहास

यह शुरू हुआ था साल 1967 में जब न्यू यॉर्क में कुछ लोग सेंट्रल पार्क में इकट्ठे हुए। यहां उन्होंने फ़ैशन की पत्रिकाओं की तरह ऐसी कई पुस्तकें जलाईं जिसमें सिर्फ़ पतले शरीरों के सुंदर होने की बात की गई हो। मक़सद था मोटे लोगों के ख़िलाफ़ मीडिया द्वारा फैलाए द्वेष और भेदभाव का विरोध करना। और यह व्यक्त करना कि हमारे व्यक्तित्व की तरह हमारे शरीर भी विभिन्न प्रकार के होते हैं और हर किसी के लिए पतला होना संभव नहीं है। इसलिए सिर्फ़ पतले होने को सुंदरता का प्रतीक समझने से बेहतर है हर तरह के शरीर को सुंदर माना जाए। 

इसके कुछ ही समय बाद ल्यूलिन लाऊडरबैक और बिल फ़ेब्री ने ‘नैशनल एसोसिएशन टु एडवांस फैट ऐक्सेपटेंस’ (नाफ़ा) की स्थापना की, जिससे इस आंदोलन को संगठन का रूप मिला। इस संगठन से बाद में ‘फैट अंडरग्राउंड’ नाम के नारीवादी संगठन ने जन्म लिया।   

धीरे धीरे यह एक नारीवादी मुद्दा बनता गया। 1979 में कैरल शॉ ने BBW (बिग ब्यूटिफुल विमेन) शब्द का निर्माण किया और इसी नाम का फैशन मैगजीन शुरू किया जिसमें मॉडलों के तौर पर सिर्फ़ मोटी औरतों की तस्वीरें होतीं थीं। तब से आज तक कई नारीवादी कार्यकर्ताओं व संगठनों ने इस मुद्दे को उठाया है। महिलाओं पर पतली और ‘सुंदर’ होने के सामाजिक दबाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है। आज फैट ऐक्सेपटेंस आंदोलन दुनियाभर में फैला हुआ है।

फैट ऐकसेपटेंस मूवमेंट के अनुसार हर शरीर सुंदर और अनोखा है, चाहे मोटा हो या पतला। यह मोटापे को बुरी नज़र से नहीं देखता।

क्यों ज़रूरी है फैट ऐकसेपटेंस?

चूंकि हर इंसान का शरीर एक जैसा नहीं होता, एक विशेष आकृति के शरीर को ही स्वाभाविक मानकर हम उन लोगों के साथ भेदभाव करते हैं जिनका शरीर इससे अलग है। अक्सर मोटे लोगों को उनके शरीर की आकृति की वजह से मज़ाक का पात्र बनाया जाता है जो उन्हें मानसिक तकलीफ़ पहुंचा सकता है। मिशिगन विश्वविद्यालय के एक शोध के अनुसार मोटे बच्चों को स्कूल में औरों से 65 फ़ीसदी ज़्यादा मानसिक उत्पीड़न सहना पड़ता है। सिर्फ़ उनके शरीर के बनावट के लिए। इसका उनके आत्मसम्मान पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

एक इंसान का अस्तित्व सिर्फ़ उसके शरीर तक सीमित नहीं है। इसलिए उसके शरीर के कारण उसे लांछित करना बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी है। फैट ऐक्सेपटेंस का लक्ष्य है लोगों को इस प्रकार संवेदनशील बनाने का कि वे मोटे लोगों को पतले लोगों जितना ही सम्मान दें। उन्हें बदसूरत, अजीब या अस्वाभाविक समझने के बजाय उन्हें अपने बराबर समझें और उनसे बुरा व्यवहार न करें।

एक पितृसत्तात्मक समाज में तथाकथित ‘सुंदर’ होने का बोझ महिलाओं पर कहीं ज़्यादा होता है। इसलिए वज़न कम करने और मॉडलों व फ़िल्म कलाकारों की तरह दिखने के चक्कर में अक्सर औरतों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य की बलि चढ़ जाती है। उन्हें अपने शरीर से नफ़रत हो जाती है और वे एनोरेक्सिया जैसे खतरनाक खाद्य रोगों का शिकार हो सकतीं हैं। ऐसे में औरतों को समझाना ज़रूरी हो जाता है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे मोटी हैं या पतली। उनका शरीर जैसा भी है, सुंदर है और उन्हें अपने शरीर से प्यार करना चाहिए, नफ़रत नहीं।

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फैट ऐकसेपटेंस के बारे में गलतफहमियाँ

कई लोग यह अवधारणा पालते हैं कि फैट ऐक्सेपटेंस आंदोलन ‘ओबेसिटी’ यानी अतिरिक्त मोटापे को बढ़ावा देता है। उनके अनुसार मोटापे जैसी हानिकारक चीज़ को बढ़ावा देकर यह आंदोलन स्वास्थ्य-संबंधित मुद्दों पर जनता को भ्रमित करता है। जहां अच्छी सेहत के लिए वज़न घटाने की ज़रूरत है, यह आंदोलन लोगों को मोटे और बीमार होने के लिए प्रोत्साहित करता है।

मगर हकीक़त बिल्कुल विपरीत है। फैट ऐक्सेपटेंस आंदोलन या इसके समर्थकों ने कभी यह नहीं कहा कि आप कसरत करना छोड़ दें, या अपौष्टिक खाना खाएं, या तबियत की देखभाल न करें। आखिर अपने शरीर से प्यार करने का एक बड़ा हिस्सा है उसका ख्याल रखना, तो इसका यह मतलब नहीं कि आप अपने शरीर को जोखिम में डालें। फैट ऐक्सेपटेंस का अर्थ सिर्फ़ यही है कि एक मोटे इंसान को अपने छिछले मज़ाक का निशाना बनाने का अधिकार हममें से किसी को नहीं है। हर इंसान को उसके योग्य इज़्ज़त देना ज़रूरी है, चाहे उसका चेहरा या उसके शरीर की बनावट कैसे भी हों। इंसान का मूल्यांकन महज़ उसके शरीर के आधार पर करना नाइंसाफी है। हम सबको थोड़ी सी संवेदना, करुणा और जागरूकता की ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार : indiatoday

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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