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जानी मानी मल्टीनैशनल कंपनी यूनीलिवर ने घोषणा की है कि वो अपनी इस क्रीम की रीब्रैंडिंग करने जा रही है। वह इस क्रीम के नाम से फेयर शब्द हटाने जा रही है। साल 1975 में लॉन्च हुई इस फेयरनेस क्रीम ने क़रीब चार दशक तक बाजार में ये बेचा कि बेदाग और गोरी त्वचा ही सुंदरता का पैमाना है। माना जा रहा है कि कंपनी के इस फैसले के पीछे वजह है दुनियाभर में जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में हुई हत्या के बाद रेसिज़्म के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन। फेयर एंड लवली के बाद लोरियल पैरिस भी अपने प्रॉडक्ट्स से वाइटनिंग, फेयरनेस, लाइटनिंग जैसे शब्द हटाने जा रही है। लेकिन क्या बस नाम बदलने से इस फेयरनेस प्रॉडक्ट्स, उनके विज्ञापनों और बाजारवाद ने जितना नुकसान किया है उसकी भरपाई हो पाएगी?

याद कीजिए टीवी पर हर घंटे आने वाले फेयर एंड लवली के विज्ञापन जिसमें सांवली और काली रंगत की लड़कियों को ये एहसास दिलाया गया कि उनकी त्वचा का रंग ही उनकी कामयाबी के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट है। जब तक उनकी रंगत गोरी नहीं हो जाती तब तक न ही उन्हें मनपसंद जीवनसाथी मिल पाएगा। न ही उनका करियर आगे बढ़ेगा। इन विज्ञापनों में हमेशा सांवले रंगत की लड़कियों को हैरान-परेशान दिखाया जाता और फिर अचानक एक गोरी त्वचा वाली लड़की आकर उन्हें क्रीम की ट्यूब या डिबिया पकड़ाकर कह जाती आपकी हर समस्या का हल है ये फेयरनेस क्रीम। फेयरनेस क्रीम बेचने वाली कंपनियों ने अपने विज्ञापनों के जरिए घर-घर में रेसिज़्म का सामान्यीकरण कर दिया। फेयरनेस क्रीम के ट्यूब भारत के हर मध्यवर्गीय घर के ड्रेसिंग टेबल का हिस्सा बन गए।

अब जाकर कंपनी प्रॉडक्ट के नाम को बदलकर यह साबित कर रही है कि उसका यह कदम क्रांतिकारी है। कंपनी को यह समझने में कि उसका प्रॉडक्ट रेसिज़्म बेच रहा है 45 साल लग गए। जबकि अगर कंपनी के फैसले पर ध्यान दें तो हम पाएंगे यूनीलिवर नाम और पैकेजिंग बदलकर वही प्रॉडक्ट बेचेगी। नाम चाहे आप फेयरनेस क्रीम का कुछ भी रखें लेकिन आखिरकार वह फेयरनेसक्रीम ही रहेगी। इस बात की भी पूरी संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि नाम बदले जाने के बाद भी यह क्रीम बाजारों में पहले की तरह ही उपलब्ध रहेगी। कंपनी का यह प्रॉडक्ट कितना सफल है उस बात का अंदाजा हम इससे ही लगा सकते हैं कि कंपनी इस प्रॉडक्ट के जरिए सालाना 24 बिलियन रुपये का रेवेन्यू कमाती है। एक स्टडी के मुताबिक भारत में 2023 का मार्केट तक फेयरनेस क्रीम 5 हज़ार करोड़ रुपये तक जाने की उम्मीद है। 

साभार : twitter

नारीवादी लेखिका और AIPWA की सचिव कविता कृष्णनन कहती हैं, ‘फेयर एंड लवली का नाम बदलना सिम्बॉलिक भी नहीं है। ये शुद्ध अवसरवादिता का मामला है।’ वो कहती हैं, ‘फेयरनेस प्रॉडक्ट का नाम बदलकर कंपनी रेसिज़्म के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों के गुस्से से बचना चाहती है। सिर्फ नाम बदल देने भर से बदलाव नहीं आएगा। आज जरूरत हैं कि कंपनियां फेयरनेस प्रॉडक्ट्स को पूरी तरह बंद कर दें, अपनी ऐड स्ट्रैटजी में बदलाव लाएं।’

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फेयरनेस और मेकअप प्रॉडक्ट्स का बाज़ार पितृसत्ता, पूंजीवाद और नस्लवाद का कॉकटेल है। ये फेयरनेस प्रॉडक्ट विज्ञापनों के ज़रिए यह तय करते हैं कि इन प्रॉडक्ट्स के बिना एक महिला सुंदरता के पैमाने पर खरी नहीं उतर सकती। यही कॉकटेल महिलाओं के बीच एक असुरक्षा की भावना पैदा करता है। मसलन अगर वह ऐसी नहीं दिखेंगी तो समाज में उन्हें हीन भावना का शिकार होना पड़ेगा और इसी असुरक्षा की भावना को बेचकर मेकअप प्रॉडक्ट्स का उद्योग हर साल अरबों रुपये का मुनाफा कमाता है। 

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इन फेयरनेस क्रीम की कंपनियों ने लैंगिक असमानता का भी भरपूर फायदा उठाया। महिलाओं के हाथों में ‘फेयर एंड लवली’ थमा दी और पुरुषों के हाथों में ‘फेयर एंड हैंडसम’। इस क्रीम के विज्ञापन में यह संदेश दिया गया कि फेयर एंड लवली क्रीम का मर्दों को इस्तेमाल किया जाना उनकी मर्दानगी के खिलाफ है उन्हें ‘लवली’ नहीं बल्कि ‘हैंडसम’ दिखना चाहिए।

पटना में मीडिया से जुड़ी ऋचा झा अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं कि बचपन में मुझे लगता था कि काश मैं भी दूसरों की तरह गोरी और सुंदर होती। ऐसा इसलिए लगता था क्योंकि हमारे अंदर बचपन से यही डाला गया कि गोरा रंग की सुंदरता की निशानी है। अब अचानक फेयर एंड लवली के महज़ नाम बदल जाने से ये मानसिकता नहीं बदल जाएगी। आगे ऋचा कहती हैं, ‘दिक्कत उस मानसिकता के साथ है जिसके हिसाब से काली और सांवली त्वचा सुंदरता के खांचे में फिट नहीं बैठती।’

फेयरनेस क्रीम कंपनियों ने लैंगिक असमानता का भरपूर फायदा उठाया। महिलाओं के लिए ‘फेयर एंड लवली’ और पुरुषों के लिए में ‘फेयर एंड हैंडसम’ बनाकर।

फेयर एंड लवली का नाम बदलने से मीडिया की छात्रा रह चुकी खुशबू बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखती। खुशबू कहती हैं, ‘मुझे पूरी उम्मीद है कि अगर मैं कभी एंकर बनना चाहती तो शायद ही मेरी रंगत के कारण मुझे मौके मिलते। इसलिए बस किसी प्रॉडक्ट का नाम बदल देने भर से बदलाव की उम्मीद बेमानी है। खुशबू के मुताबिक मार्केट में फेयरनेस प्रॉडक्ट के अब इतने सारे विकल्प मौजूद हैं कि आप एक प्रॉडक्ट का नाम बदलेंगे लोग कोई दूसरा प्रॉडक्ट खरीद लेंगे।’

अपनी किताब द ब्यूटी मिथ में नाओमी वूल्फ ने लिखा है, ‘हमारे अंदर ये डाल दिया गया है कि सुंदर दिखने का एक तय पैमाना होता है, जवान और कोमल त्वचा, रेशमी बाल, पतला शरीर वगैरह-वगैरह।’ नाओमी लिखती हैं, ‘क्या हम महिलाएं सुंदर नहीं हैं, बिल्कुल हैं। बस हम इस पर उस तरीके से भरोसा नहीं करते जैसे हमें करना चाहिए और इसके लिए हमें सुंदरता से जुड़े मिथ के खिलाफ पहला कदम उठाने की ज़रूरत है।’

उनकी किताब बताती है कि ‘कैसे सुंदरता के पैमानों को महिलाओं के खिलाफ ही इस्तेमाल किया जाता है। मेकअप और कॉस्मेटिक्स के साथ दिक्कत वहीं शुरू हो जाती है जब महिलाओं को लगने लगता है कि वे इन प्रॉडक्ट्स के बिना अधूरी हैं। सुंदरता करोड़पति उद्योगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक सुविधाजनक कल्पना है जो सुंदरता के पैमाने तय करते हैं और महिलाओं तक इसे अफीम की तरह पहुंचाते हैं। सुंदरता के ये पैमाने महिलाओं को वहां ले जाते हैं जहां पुरुष चाहते हैं।’ इसे आसान भाषा में हम ऐसे समझ सकते हैं, अखबारों में आने वाले मैट्रिमोनियल विज्ञापनों की भाषा हमेशा एक जैसी होती है। बहु चाहिए गोरी, सुंदर, पतली, लंबी। ये पितृसत्ता के तय किए गए पैमान ही हैं जो महिलाओं को ये भरोसा दिलाता है कि एक औरत को ऐसा ही होना चाहिए। जो औरतों इन पैमानों पर खरी नहीं उतरती उन्हें कभी वह स्वीकृति नहीं मिलती जो इन तय कद-काठी, रंगत की महिलाओं को मिलती है।

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ऐसा नहीं है कि इन सुंदरता के इन तय पैमानों के खिलाफ विरोध की आवाज़ मुखर नहीं हुई है। यूनीलीवर का फेयर एंड लवली का नाम बदलना, जॉनसन एंड जॉनसन का फेयरनेस प्रॉडक्ट्स की बिक्री पर रोक लगाना, शादी डॉट कॉम का अपनी साइट से स्किन टोन फिल्टर हटाना। ये सब इस विरोध का ही नतीजा है लेकिन इसे सिर्फ सिम्बॉलिक माना जाना चाहिए क्योंकि हर साल बढ़ते फेयरनेस प्रॉडक्ट के बाजार के आंकड़े इस बात की गवाही नहीं देते। कंपनियां फेयरनेस क्रीम का नाम बदलकर अब आपको बीबी, सीसी, डीडी, स्किन लाइटनिंग, स्किन ब्राइटनिंग क्रीम थमा रही हैं। ये बस उत्पादों की रीपैकेजिंग है।

जिस तरीके से जॉर्ज फ्लॉड की हत्या के बाद अमेरिकी पुलिस का घुटने के बल झुककर माफी मांगना काफी नहीं है। पुलिस के इस नस्लवादी रवैये के लिए पुलिस रिफॉर्म की ज़रूरत है। ठीक उसी तरह एक फेयरनेस प्रॉडक्ट का नाम बदल देना काफी नहीं है। हर साल अरबों-खरबों का मुनाफा कमाने वाला उद्योग अपने सबसे ज्यादा बिकने वाले प्रॉडक्ट को क्या इतनी आसानी से बंद कर देगा। पूंजीवादी व्यवस्था एक क्रूर व्यवस्था है जो हर हालात में अपने फायदे-नुकसान का आंकलन करना जानती है।

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तस्वीर साभार : bbc

Ritika is a reporter at the core. She knows what it means to be a woman reporter, within the organization and outside. This young enthusiast has been awarded the prestigious Laadli Media Awards and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing. Ritika is biased.

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