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यों तो हमारी संस्कृति में महिला के स्वरूप वाली देवीको पूजनीय माना जाता है। देवी में जितनी आस्था, विश्वास और सम्मान है, उसके ठीक उलट जीती-जागती औरत की ज़िंदगी होती है। भेदभाव, अपमान और हिंसा को हमारा समाज उनके लिए चुनता है। आमतौर पर हमारी ये धारणा होती है कि महिला हिंसा किसी ख़ास वर्ग की महिलाओं के साथ होती है, जैसे – गाँव की महिलाएँ ही हिंसा का ज़्यादा शिकार होती है। या फिर शादीशुदा औरतों के साथ बलात्कार नहीं होता है। पर वास्तव में ये सब एक मिथ्य मात्र है, जिसके कोई तथ्यात्मक स्रोत नहीं है। महिला चाहे किसी भी वर्ग, जाति, उम्र या सामाजिक प्रस्थिति से ताल्लुक़ रखें, इससे हिंसा के स्वरूप पर प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन हिंसा पर नहीं। महिलाओं की इसी स्थिति को बेहद संजीदगी से बयान करती  शॉर्ट फ़िल्म देवी।इस फ़िल्म में काजोल, नेहा धूपिया, श्रुति हासन, नीना कुलकर्नी, सांध्या मात्रे, रामा जोशी और शिवांगी रघुवंशी समते कई बड़ी महिला कलाकार हैं। इन सभी महिला कलाकार ने समाज के अलग-अलग वर्ग से आने वाली महिलाओं का किरदार निभाया है। सभी संस्कृति, शिक्षा, भाषा, जाति, धर्म, उम्र और रंग जैसे अलग-अलग मायनों में एक दूसरे से बेहद अलग है। लेकिन जब हिंसा की बात आती है तो ये सभी ख़ुद को एक पायदान पर पाती है। एक कमरे में सिमटी इन नौ अभिनेत्रियाँ की संख्या देवी‘ के नौ स्वरूप को इंकित करती है। ये कमरा मानो एक क़ब्रिस्तान जैसा है, जहां सभी महिलाएँ हिंसा के बाद पहुँची या पहुँचायी गयी है। चंद मिनट की इस फ़िल्म से हमारे समाज को बखूबी दिखाया गया है। वो समाज जिसे लगता है कि छोटे कपड़े पहनाना और शराब पीना जैसी बातें ही बलात्कार और यौन उत्पीड़न की वजह है। लेकिन देवी के इस कमरे में एक शादीशुदा, समाज की तथाकथित आदर्श नारी से लेकर एक गूँगी गरीब लड़की और कॉलेज जाने एक लड़की से लेकर बूढ़ी महिलाएँ भी शामिल है, जो यौन उत्पीड़न और हिंसा का शिकार हुई है। ये किरदार बिना कुछ कहे इस बात को बेहद कड़े और साफ़ शब्दों में बताते है कि हिंसा करने वाले के लिए सिर्फ़ औरतहोना मायने रखता है और फिर वो किसी ही उम्र, धर्म या स्थिति में हो इससे उसमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है।
स्तब्ध करने वाला फ़िल्म का आख़िरी हिस्सा बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाता है और हमारी सभ्यता पर एक बड़ा सवाल छोड़ता है।
कहा जाता है कि औरत होती नहीं बनायी जाती है। सच में हम जिस धारणा की बात कर रहे है, उन धारणाओं के तहत सदियों से महिलाओं के बीच बोए गए द्वेष के बीज को भी देख सकते है, जब एक महिला का दूसरी महिला के प्रति व्यवहार और बात करने का लहजा उसके पहनावे और शिक्षा पर केंद्रित होता है। वे एक दूसरे को ताने मारती और बहस करती है। ये सब भी उसी सोच को दर्शाती है जो समाज की है, क्योंकि वे भी समाज का हिस्सा है और उन्हें भी इसी समाज ने बनाया है। लेकिन फ़िल्म का आख़िरी मिनट समाज में हिंसा के उस घिनौने रूप को सामने लाता है, जिससे मुँह चुराना भी अब हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। स्तब्ध करने वाला फ़िल्म का आख़िरी हिस्सा बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाता है और हमारी सभ्यता पर एक बड़ा सवाल छोड़ता है। इस हिस्से पर ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगीं बाक़ी आप ख़ुद देखिएगा।   आख़िर में यही कहूँगीं इस तरह की फ़िल्में ज़्यादा देखी नहीं जाती। ये करोड़ों का बिज़नेस भी नहीं करती है, क्योंकि इसमें मसाला नहीं समाज की कड़वी सच्चाई होती है। पर इन सबके बावजूद  संजीदे विषय को बिना किसी लीपापोती के उजागर करना सराहनीय और ज़रूरी है। और पढ़ें : पितृसत्ता पर लैंगिक समानता का तमाचा जड़ती ‘दुआ-ए-रीम’ ज़रूर देखनी चाहिए
तस्वीर साभार : indiatoday

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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2 COMMENTS

  1. ऐसी फिल्म समाज का आइना होती है और ये एक सच्चाई है रेप भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन गया है
    जिसे दूर करने की कोशिश घर से ही होनी चाहिए क्यूँ की व्यक्ति हर किसी न किसी घर का हिस्सा होता है ना जाने ये कब रुकेगा

  2. कुरान सूरा 4: 34 – पति ने पत्नी पर अपना माल खर्च किया है इसलिये जरूरत पड़ने पर पत्नी को मारो-पीटो ।

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