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भारत में काले या सांवले लोगों के खिलाफ़ भेदभाव आम बात है। पर क्या आप जानते हैं गोरी चमड़ी के लिए हमारा जुनून कितना हानिकारक है? आईए बताते हैं यह गोरे-काले का भेद किस तरह जातिवाद, वर्गवाद, और नस्लवाद पर आधारित है। 

VICE India ने बॉलीवुड में ‘ब्राउनफ़ेस’ के इस्तेमाल पर रोशनी डाली है। ऐसी कई फ़िल्में हैं जिनमें गोरे अभिनेताओं ने पिछड़े वर्ग या जाति से आनेवाले इंसान का किरदार निभाया है, और खुद को उनकी तरह ‘काला’ दिखाने के लिए चेहरे पर काले रंग का इस्तेमाल किया है। जैसे ‘उड़ता पंजाब’ में आलिया भट्ट और ‘गली बॉय’ में रणवीर सिंह। ऐसे काले रंग का तथाकथित निचली जातियों से संबंध स्पष्ट किया जाता है। साथ में यह संदेश दिया जाता है कि काली चमड़ी वाले लोगों के किरदार निभाने के लिए भी गोरे, उच्चवर्गीय  लोग ही चाहिएं। 

हमारे देश में जाति प्रथा धर्मग्रंथों में उल्लेखित ‘वर्ण व्यवस्था’ पर आधारित है। ‘वर्ण’ शब्द का मतलब ‘रंग’ है, इसलिए ‘वर्ण व्यवस्था’ का मतलब ‘रंग के आधार पर व्यवस्था’ हो सकता है। यानी यह संभव है कि जातियों में भेदभाव उनके रंग के आधार पर किया गया हो। 

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