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साल 2018 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर 15 मिनट में एक बलात्कार होता है। देश में बलात्कार के मामलों की संख्या साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। इतने भयावह आंकड़ों के बावजूद भारतीय समाज तब तक नहीं जागता जब तक कोई बड़ा हादसा न हो। साल 1973 में 26 वर्ष की एक नर्स, अरुणा शानबाग का इस बर्बरता के साथ बलात्कार किया गया कि वे चालीस साल तक कोमा में चली गई। साल 2012 में 27 वर्ष की एक डॉक्टर, ज्योति सिंह का इस बेरहमी से सामूहिक बलात्कार किया गया कि उन्हें अपनी जान गँवानी पड़ी। डरा देने वाले ये हादसे वजह बने है भारत के बलात्कार सम्बंधित कानून में बदलाव के। आइये देखते हैं, कैसे। 

धारा 375, भारतीय दंड संहिता 1860

बलात्कार एक ऐसा कृत्य होता है जो पीड़िता को झकझोर कर रख देता है। इसके जख़्म लंबे समय तक नहीं जाते। बलात्कार के बाद अपराधी की जगह पीड़िता को समाज की घृणा झेलनी पड़ती है। भारत में ‘बलात्कार एक अपराध है,’ यह कानून बना साल 1860 में, जब भारतीय दंड संहिता में धारा 375 को जोड़ा गया। इस धारा के अनुसार, ‘जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध, उसकी सहमति के बगैर उससे सम्भोग करता है तो उसे बलात्कार कहते है।’ अगर महिला की सहमति डरा धमका कर ली गयी है तो भी यही माना जाएगा कि महिला का बलात्कार हुआ है।  

अगर पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम है तो उसकी सहमति की कोई अहमियत नहीं है। दूसरे शब्दों में, अपराधी अपने बचाव में ये नहीं कह सकता कि जो भी हुआ पीड़िता की सहमति से हुआ। कानून की नज़रों में 18 वर्ष के कम उम्र की लड़की की सहमति का कोई महत्व नहीं है। दुर्भाग्यवश, अगर पीड़िता शादीशुदा है, उसकी उम्र 15 साल से ऊपर है और ये कृत्य करने वाला उसका अपना पति है तो उस कृत्य को कानूनन बलात्कार नहीं माना जाएगा। इस अपराध की सजा धारा 376 में बतायी गयी है, जिसके अनुसार अपराधी को अधिकतम आजीवन कारावास तक की सजा दी जा सकती है। बलात्कार के इस कानून में लगभग सौ सालों तक कोई बदलाव नहीं आया। इतने लम्बे समय के बाद बदलाव की वजह बना साल 1972 का मथुरा बलात्कार केस। 

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मथुरा बलात्कार केस से ‘आपराधिक संशोधन अधिनियम’

कथित तौर पर, 26 मार्च 1972 को एक आदिवासी युवती, ‘मथुरा’, का महाराष्ट्र के देसाई गंज पुलिस स्टेशन में कुछ पुलिसवालों ने मिलकर बलात्कार किया। इस आधार पर की मथुरा यौन सम्बन्धो की आदी थी, सेशन न्यायालय ने पुलिस वालों को बरी कर दिया। कोर्ट ने ये फैसला दिया कि पुलिस स्टेशन में जो भी हुआ वो बलात्कार नहीं था। सेशन न्यायालय के इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। उच्च न्यायालय ने सेशन न्यायालय के फैसले को पलट दिया। परिणामस्वरूप मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा। 

उच्चतम न्यायालय ने सेशन न्यायालय के फैसले को सही ठहराया और ये कहा की मथुरा के साथ जो भी हुआ वो बलात्कार नहीं था। इसके पीछे ये तर्क दिया गया कि हादसे के बाद मथुरा के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं मिले। ये अपने आप में साबित करता है कि पुलिस स्टेशन में जो भी हुआ उसमे मथुरा को कोई आपत्ति नहीं थी, बल्कि उसकी भी सहमति थी। ये फैसला साल 1978 में आया। इस फैसले का पूरे देश में विरोध हुआ और साल 1983 में सरकार ने बलात्कार के कानून में कई बदलाव किए। जैसे कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 में धारा 114A को डाला गया। इसके अनुसार बलात्कार सम्बन्धी मामलों में पीड़िता के बयान को ही सही माना जाएगा। अगर पीड़िता कह रही है कि उसने सहमति नहीं दी तो ये मान लिया जाएगा कि उसने सहमति नहीं दी।   

इसके अतिरिक्त, भारतीय दंड संहिता 1860 में धारा 228A को डाला गया। इसके अनुसार पीड़िता की पहचान का खुलासा करना एक अपराध है। यही नहीं, एक और धारा डाली गयी जिसने पीड़िता से उसके चरित्र पर प्रश्न पूछने पर भी रोक लगा दी। साल 1983 के बाद इस कानून में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ।

निर्भया गैंगरेप से ‘आपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013’

16 दिसंबर 2012 की रात को नई दिल्ली में 23 साल की एक लड़की के साथ चलती बस में 6 लोगों ने रेप किया। इस गैंगरेप के बाद पूरे देश में बलात्कार संबंधी कानून को बदलने की मांग एक बार फिर उठी। देशभर की जनता सड़कों पर निकल आयी और ये मांग की बलात्कार जैसे गंभीर अपराध करने वालों को सजा-ए-मौत दी जानी चाहिए। बढ़ते दबाव को देखते हुए, सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति का गठन किया। 

जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट के आधार पर साल 2013 में कानून में कई बदलाव किये गए। जैसे कि यौन हमले के मामलों में सजा की अवधि को बढ़ा दिया गया। अगर बलात्कार के बाद पीड़िता की मौत हो जाती है या पीड़िता स्थायी तौर पर वेजटेटिव स्टेट में चली जाती है तो अपराधी को मौत की सजा दी जाएगी। यही नहीं, ऐसे बहुत सारे कृत्य जिनकी वजह से महिलाओं और लड़कियों का मानसिक उत्पीड़न होता है, उन सभी को अपराध के तौर पर पहचाना गया जैसे कि महिला की इच्छा के खिलाफ उसे पोर्नोग्राफी दिखाना, उसका पीछा करना, आदि। 

लेकिन क़ानून काफ़ी नहीं है

निस्संदेह, समय के साथ बलात्कार सम्बन्धी कानून में काफी बदलाव आया है। ये बदलाव सराहनीय है। लेकिन समस्या का पूरा निवारण तब होगा जब पीड़िता को कम से कम समय में जल्दी न्याय मिलेगा। जब पीड़िता के अधिकार सिर्फ कानून की किताबों में नहीं रहेंगे बल्कि यथार्थ में भी मिल पाएंगे, जब न्याय सिर्फ बातों में नहीं बल्कि वास्तविकता में भी मिलेगा।      

निर्भया केस में आरोपियों को सजा मिलने में सात साल लग गए। ये हाल तो तब था जब ये केस लगातार सुर्ख़ियों में रहा था। बलात्कार के मामलों में आरोपी को सजा मिलने में औसतन 10 से 20 साल लग जाते है। ऐसे में सजा-ए-मौत जैसे कठोर प्रावधानों का क्या कोई औचित्य भी रह जाता है?

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तस्वीर साभार : ijlpp.com  

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