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हर रोज़ की खबरों में एक बात समान पाई जाती है वो है विकास और अर्थव्यवस्था से जुड़ी खबरें जिनपर सबकी निगाहें टिकी होती हैं। हर किसी को यह जानने की जिज्ञासा रहती है कि भारत की जीडीपी में कितने फ़ीसद की बढ़ोतरी हुई और महंगाई का स्तर कहां तक पहुंचा। विकास का पैमाना पूरी तरह आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित कर दिया जाता है। शायद ही कोई विकास के दूसरे जरूरी पहलुओं पर ध्यान देता है जो है, सामाजिक विकास। सामाजिक विकास जिनमें समाज के कमजोर वर्ग की स्थिति, महिलाओं का विकास, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं। भारत में सामाजिक विकास के इन सभी पहलुओं की स्थिति दयनीय है। इन सब में भी सबसे दयनीय हालत है महिलाओं के विकास से जुड़े मुद्दों की।

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पॉपुलेशन फंड की ओर से भारत में महिलाओं की स्थिति को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है, जिसमें महिलाओं के जीवन के संदर्भ में गहरी चिंता जाहिर की गई है। रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ होने वाले 19 मानवाधिकारों के उल्लंघन पर प्रकाश डाला गया है जिनमें से तीन सबसे अधिक प्रचलित अपराध है – फीमेल जेनाइटल मूटिलेशन, बेटियों के साथ होनेवाला भेदभाव और भ्रूण हत्या, बेटों को मिलने वाला बढ़ावा और बाल विवाह

इस रिपोर्ट में भारत की स्थिति कुछ खास बेहतर नहीं दिखाई दी बल्कि महिलाओं से जुड़े इन मामलों को पढ़कर तो ऐसा महसूस होता है कि भारत में आधुनिकता पर रूढ़िवादी मानसिकता भारी पड़ रही है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते है कि साल 2013-2017 के बीच विश्व में लिंग चयन के कारण 142 मिलियन लड़कियां गायब हुई जिनमें से लगभग 46 मिलियन (4.6 करोड़) लड़कियां भारत में लापता हैं। भारत में पांच साल से कम उम्र की हर नौ में से एक लड़की की मृत्यु होती है जो कि सबसे ज्यादा है। इस रिपोर्ट में एक अध्ययन को आधार बनाते हुए भारत के संदर्भ में यह जानकारी दी गई कि प्रति 1000 लड़कियों पर 13.5 प्रति लड़कियों की मौत प्रसव से पहले ही हो गई।

रिपोर्ट के आंकड़े बताते है कि साल 2013-2017 के बीच विश्व में लिंग चयन के कारण 142 मिलियन लड़कियां गायब हुईं जिनमें से लगभग 46 मिलियन (4.6 करोड़) लड़कियां भारत में लापता हैं।


इतना ही नहीं इस रिपोर्ट में बाल विवाह के मामले भी देखे गए जिसमें हर दिन, 18 वर्ष से कम उम्र की क़रीब 33,000 लड़कियों को शादी के लिए जबरन तैयार किया जाता है, वो भी अपनी से दोगुनी उम्र के व्यक्ति के साथ। भारत में बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं का सीधा संबंध यहां की गरीबी, खराब शिक्षा व्यवस्था, भौगौलिक स्थान और ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बंटवारे से है। इस रिपोर्ट में प्रकाशित किए गए सभी आंकड़े तो इस बात का प्रमाण है कि नई तकनीकें, प्रौद्योगिकी में उन्नति और देश की प्रति व्यक्ति आय सामाजिक हालातों को नहीं सुधार सकती। लड़कियों के गायब होने की संख्या, जन्म से पहले उनकी मृत्यु भी कन्या भ्रूण हत्या के साफ संकेत दे रही है।

अंग्रेजों ने आकर बाल विवाह निषेध जैसे कानून तो बना दिए लेकिन भारतीय समाज आज भी उन रूढ़िवादी विचारधाराओं को जड़ से मिटा नहीं पाया है। भले ही सरकार महिला सुरक्षा के लिए कितने ही कानून बना लें लेकिन यदि बात उसे समाज में अमल करने पर आए तो यहां मानसिकता में बदलाव होना बेहद जरूरी है। यह रूढ़िवादी मानसिकता ही है जिसके कारण लड़कियों को आज भी गर्भ में ही मार दिया जाता है, आखिर वो पितृसत्तात्मक समाज पर एक बोझ जो है।

भारत जैसे देशों में तकनीक के विकास ने पितृसत्तात्मक समाज के साथ मिलकर औरत के खिलाफ ही काम करना शुरू कर दिया। अल्ट्रासाउंड, अल्ट्रासोनोग्राफी, एम्नियोसिंटेसिस जैसी तकनीकों का इस्तेमाल तेज़ी से अजन्मे बच्चे के लिंग की जांच के लिए किया जाने लगा। पहले के समय में जन्म के बाद लड़कियों को बहा दिया जाता था और अब उन्हें जन्म ही नहीं लेने दिया जाता। यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी पुत्र मोह के चलते इस अपराध को बढ़ावा दिया जा रहा है।

लड़कियों के गायब होने की संख्या, जन्म से पहले उनकी मृत्यु भी कन्या भ्रूण हत्या के साफ संकेत दे रही है।

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हालांकि भारत में गर्भधारण और प्रसवपूर्व लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994 के तहत ये सभी काम गैर-कानूनी है। इस अधिनियम के लागू करने की सरकार की मंशा ही लिंग निर्धारण करने वाली तकनीकों पर प्रतिबंध लगाने की थी। किसी भी प्रयोगशाला या स्वास्थ्य जांच केंद्र में लिंग चयन के उद्देश्य से की जाने वाली अल्ट्रासोनोग्राफी प्रतिबंधित है। यहां तक कि डॉक्टर के इशारों या शब्दों के माध्यम से भी भ्रूण का लिंग नहीं बताया जा सकता। इस कानून में उल्लेखित प्रावधानों के माध्यम से यह बात बहुत आसानी से मालूम पड़ती है कि भारतीय समाज की मानसिकता कैसी है। सरकार ने कानून बनाए जाने के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में कन्या भ्रूण हत्या, लड़कियों का गायब होना या, उनका जन्म ही नहीं लेना कहीं न कहीं इस बात पर सोचने को मजबूर कर देता है कि आखिर समाज की रूढ़िवादी मानसिकता को किस प्रकार बदला जाए।

अगर कानून के अलावा दूसरी समस्या पर नज़र डाली जाए तो यह मुद्दा अधिकारों का भी है, वो अधिकार है जीवन का अधिकार, समानता का अधिकार, महिलाओं का प्रजनन संबंधी अधिकार। जब भी लैंगिक समानता की बात होती है तो लोग नारीवाद विषय को घेरकर खड़े हो जाते है, जब भी जीवन के अधिकार की बात होती है तो कहा जाता है कि जिसने जन्म ही नहीं लिया उसका कैसा अधिकार? जब महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की बात होती है तो यह तर्क सामने आता है कि यहां दंपत्ति की मंजूरी मायने रखती है, जिसमें वर्चस्व तो पुरुषों का ही अधिक रहता है। इन सभी तर्क – वितर्क की झड़ी में आज तक इन गंभीर समस्याओं का हल नहीं निकल पाया है कि कन्या भ्रूण हत्या जैसे घिनौने अपराध को किस प्रकार रोका जाए। फिर ऐसी आधुनिकता और विकास का क्या लाभ जिसमें सिर्फ आर्थिक पहलुओं पर ही जोर दिया जाए और सामाजिक पहलुओं को इस प्रकार नजरंदाज किया जाए जैसे कि ये गैर ज़रूरी है, क्योंकि यह विकास समाज के एक वर्ग पर शोषण के समान हावी है।

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तस्वीर साभार: dailyo

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