Indian women farmers gather near the Indian parliament for a protest against the Land Acquisition Bill in New Delhi, India, Friday, July 24, 2015. Indian farmers protested against the ruling Bharatiya Janata Party (BJP) demanding the withdrawal of the controversial Land Acquisition Bill, calling it anti-farmer in a country where agriculture is the main livelihood for more than 60 percent of the 1.2 billion people.(AP Photo/Altaf Qadri)
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आज भी औरत को सिर्फ खेतों में काम करने वाले मजदूर की तरह देखा जाता है, न कि मालिक की तरह। वे खेती से जुड़े हर काम में शामिल तो होती हैं लेकिन ज़मीन का मालिकाना हक़ उनमें से अधिकतर के पास नहीं होता। ग्लोबल डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट लंदन की अप्रैल 2020 में आई रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ 16 फीसद महिलाएं, भारत की सम्पूर्ण कृषि भूमि की मालिक हैं। ये हाल तब है जब एग्रीकल्चरल वर्कफोर्स का लगभग 47 फीसद शेयर महिलाओं का होता है। कृषि और खेती के काम में इतने योगदान के बावजूद, 2 फीसद से भी कम कृषि भूमि पर भारतीय औरतों का मालिकाना हक़ है।

अधिकांश महिलाओं के पास ज़मीन का मालिकाना हक नहीं है जबकि देश में ऐसे कानून मौजूद हैं जो संपत्ति में महिलाओं के हक़ को बढ़ावा देते हैं। हिन्दू महिलाओं की संपत्ति से संबंधित अधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में दिए हुए है। साल 2005 में इस कानून में ये प्रावधान डाला गया कि बेटियों को भी बेटों की तरह, पिता की पैतृक सम्पत्ति में बराबर का हिस्सा मिलेगा। जहा तक पत्नियों की बात है, तो कानून में ये प्रावधान भी है कि पति की सम्पत्ति में पत्नी का भी हक़ होगा। कानून ये भी कहता है कि ख़रीदी हुई, विरासत में मिली हुई और उपहार में मिली हुई सम्पत्ति पर पूरा हक़ महिला का होगा। सोचने वाली बात ये है कि इतने प्रगितिशील कानूनों के बावजूद भी महिलाओं को संपत्ति में उनका हिस्सा क्यों नहीं मिलता। आइए इसे समझने की कोशिश करते है।  

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महिलाओं को अपना हक़ मांगने से रोकती हैं ये ताक़तें

कानूनन हक होने के बावजूद भी औरतें इस सच्चाई से वाकिफ़ नहीं होती कि संपत्ति में उनका भी कोई हिस्सा है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उन्हें ये साफ़ तौर पर पता ही नहीं होता कि कौन सी संपत्ति में उनका हिस्सा होता है, किसमें नहीं, संपत्ति में कितना हिस्सा उनका होता है। शादी किस प्रकार से संपत्ति में उनके हिस्से को प्रभावित करती है, क्या शादी के बाद भी मायके की संपत्ति में उनका कोई हक़ रहता है, क्या पति की संपत्ति में उनका भी कोई हिस्सा होता है। पति के मर जाने के बाद संपत्ति के अधिकारों में क्या बदलाव आता है। तलाक के बाद संपत्ति का बंटवारा कैसे होता है, वगैरह वगैरह। ये सब ऐसे सवाल है जिनके जवाब आम महिलाओं के पास नहीं होते है। पितृसत्तात्मक समाज आज भी उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखता है। वो कहते है न, ‘अज्ञानता परमानन्द है’। 

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इसलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि काफी हद तक कानून ही समस्या की जड़ है। महिलाओं को संपत्ति का हक़ देने वाले कानून इधर-उधर बिखरे नज़र आते हैं। महिलाओं के धर्म के अनुसार भी अलग-अलग कानून लागू होते है। संक्षेप में कहे तो, कानून की जटिलताओं और जागरूकता की कमी के कारण महिलाएं अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाती। इसके अलावा महिलाओं की परवरिश जिस तरीके से की जाती है वह भी इसका एक कारण है। आमतौर पर महिलाओं को त्याग करना, चीज़ों को छोड़ना सिखाया जाता है। जो औरतें ऐसा करती है, उन्हें पारिवारिक और सामाजिक प्रशंसा मिलती है, उन्हें ‘अच्छी औरत’ के खांचे में डाल दिया जाता है। इसी वजह से काफी सारी महिलाएं अपनी संपत्ति के अधिकार को छोड़ना पसंद करती है, न कि उनके लिए लड़ना।     

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हमारे समाज की पिछड़ी प्रथाएं भी महिलाओं को मजबूर करती है अपना हक़ छोड़ने के लिए। कई इलाकों में आज भी ‘विच हंटिंग’ नामक प्रथा का चलन है। गोविन्द केलकर, जो कि यूएन वीमेन के साथ सलाहकार के तौर पर काम कर चुके है कहते हैं, ‘इस प्रथा के पीछे की वजह संपत्ति है। अक्सर वही औरतें इस प्रथा की शिकार होती है जो कि आर्थिक रूप से मजबूत होती है। सिर्फ ‘विच हंटिंग’ ही नहीं, हमारे समाज की और भी कुप्रथाएं जैसे की दहेज़ हत्या, सती, विधवा को छोड़ देना, आदि के पीछे भी वजह सामाजिक के साथ-साथ आर्थिक होती है।’      

उदाहरण के तौर पर राजस्थान में आज भी ‘हक़ त्याग’ नामक एक प्रथा का पालन किया जाता है। इस प्रथा के तहत, महिलाओं को पैतृक सम्पति में अपने हक़ को छोड़ना होता है। कहने को तो महिलाओं के पास ये विकल्प होता है की वो अपनी इच्छानुसार इस प्रथा का अनुसरण न करे, लेकिन ये विकल्प सिर्फ नाममात्र ही होता है। सामाजिक दवाब के चलते, अधिकतर महिलाएं इस प्रथा के अनुसार पैतृक संपत्ति में अपने हक़ को छोड़ना उचित समझती है। अगर कोई महिला अपना हक़ मांग भी ले तो हमारा समाज उसे लालची, नीच, आदि जैसे शब्दों से कलंकित करने से नहीं बचता। ये सिर्फ राजस्थान की ही नहीं, बल्कि पूरे देश की कमोबेश यही हालत है। समाज के इन्हीं पितृसत्तात्मक लांछनों से बचने के लिए अक्सर महिलाएं संपत्ति में अपने हिस्से को छोड़ना उचित समझती है, बावजूद इसके कि उन्हें संपत्ति की सख्त जरूरत ही क्यों न हो।          

अगर कोई महिला इन सारी चुनौतियों को पार करके अपने हक़ की लड़ाई की ठान भी ले तो उसे आगे बढ़ने से रोक देती है इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाला समय और खर्चा। इन दोनों के डर से भी महिलाएं अपना हक़ मांगने से घबराती है। ऊपर दिए हुई सभी सामाजिक बाधाएं, महिलाओं को उनका हक़ संपत्ति में लेने से रोकती है, जब तक इन बाधाओं को तोड़ने की कोशिश नहीं की जाएगी, तब तक कानून सिर्फ किताबों में ही रह जाएगा, भले ही फिर वो कितना ही प्रगतिशील क्यों न हो। ज़रूरत है मिलकर समाज के इस ढांचे को तोड़ने की जो हमारी महिलाओं के हक़ से उन्हें वंचित रखता है, जो महिलाओं को भू- मालिक के तौर पर नहीं देखता, जो हमारी को जायदाद में हिस्सा नहीं देता।        

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तस्वीर साभार : voanews

Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

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