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सेना में महिलाओं को बराबरी का हक मिलना एक बहुत बड़ी जीत है। लंबे अरसे के संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 17 फरवरी को महिला अफ़सरों के लिए स्थायी कमिशन बनाए जाने का फैसला सुनाया था और इस संबंध में केंद्र सरकार को कड़े निर्देश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की सभी दलीलों को खारिज करते हुए समानता का हवाला दिया था। साथ ही कोर्ट ने सेना में शॉर्ट सर्विस कमिशन में कार्यरत महिला अधिकारियों को स्थायी कमिशन की 10 शाखाओं में प्रवेश की अनुमति प्रदान की थी। अब जाकर रक्षा मंत्रालय ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर अपनी मोहर लगा दी है और इस संबंध में औपचारिक आदेश भी जारी कर दिया है।

सेना में स्थायी कमिशन में प्रवेश की मंजूरी मिलने के बाद अब महिलाओं को इससे कई तरह के फायदे पहुंचेंगे जिनसे वे अब तक वंचित रही। इससे पहले महिला अधिकारियों के सेना में भर्ती होने का रास्ता साल 1990 में तब खुला जब शॉर्ट सर्विस कमीशन के माध्यम से उन्होंने सेना में कदम रखा। शॉर्ट सर्विस कमिशन के तहत महिला अधिकारियों को शुरू में मात्र पांच सालों के लिए लिया जाता था, जिसे बाद में बढ़ाकर 14 वर्ष तक किया गया। जबकि सेना में सेवानिवृत्ति पाने के लिए बीस वर्ष की सेवा आवश्यक है जिस कारण महिलाएं इस लाभ से वंचित रह जाती थी। परंतु अब स्थायी कमीशन मिलने से उन्हें रिटायरमेंट की उम्र तक सेवा का लाभ मिलेगा। हालांकि अभी भी महिला सैन्य अधिकारियों को युद्ध अभियानों में भेजने का फैसला नहीं किया गया है।

स्थायी कमीशन के संघर्ष की शुरुआत वायुसेना की विंग कमांडर रही अनुपमा जोशी के प्रयासों के साथ हुई। जब साल 1993 में अनुपमा ने आर्मी ज्वाइन की थी तब वह वायुसेना में महिला अधिकारियों का पहला बैच था। अपनी 5 साल की सेवा देने के बाद उन्हें 3 साल का विस्तार दो बार मिला। टुकड़ों में मिल रही इस सेवा से तंग आकर उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखा लेकिन इस पत्र का कोई जवाब नहीं आया। इसके बाद अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए अनुपमा ने साल 2006 में न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए नई भर्तियों में तो स्थायी कमिशन दिए जाने का आदेश दिया लेकिन पहले से अपनी सेवा दे रही महिलाओं की स्थिति वैसी ही बनी रही। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद महिलाओं को केवल दो शाखाओं जज एडवोकेट जनरल और शिक्षा कोर में ही स्थायी कमीशन हासिल मिल सका। साल 2008 का यह साल अनुपमा की सेवानिवृत्ति का भी साल था लेकिन उनके द्वारा शुरू किए गए संघर्ष की यह लड़ाई जारी रही।

महिला अधिकारियों के सेना में भर्ती होने का रास्ता साल 1990 में तब खुला जब शॉर्ट सर्विस कमीशन के माध्यम से उन्होंने सेना में कदम रखा।

नेवी में महिला अफसरों को स्थायी कमीशन दिलाने में उत्तराखंड से पहली महिला अफसर सुमिता बलूनी का योगदान महत्वपूर्ण भूमिका रही। सुमिता बलूनी उन पांच महिला अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने सेना में स्थायी कमीशन के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुमिता ने ग्रेजुएशन के बाद अगस्त 1993 में नौसेना में कदम रखा था। उनके भाई कैप्टन आशीष बलूनी भी नौसेना में बतौर अफसर शामिल हुए थे। उत्तराखंड के कंडलसेरा की रहने वाली कमांडर सुमिता बलूनी और कैप्टन आशीष बलूनी उत्तराखंड से इंडियन नेवी में अफसर बनने वाले पहले भाई-बहन थे।

14 साल की सर्विस में योगदान के बाद कमांडर सुमिता बलूनी साल 2007 में सेवानिवृत्त हुई। उस समय उन्होंने अपने लिए परमानेंट कमीशन की मांग की थी, लेकिन उनकी यह मांग ठुकरा दी गई, जबकि उनके साथी पुरुष अफसरों को कमीशन दे दिया गया। अपने और दूसरी महिला अधिकारियों के साथ हुए इस अन्याय को देख उन्होंने महिला अफसरों के साथ मिलकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने साल 2012 में महिला अफसरों को स्थाई कमीशन देने के निर्देश दिए थे, लेकिन इसके बाद नौसेना ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक समानता का हवाला देते हुए थल सेना समेत नौसेना में भी महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने की इजाजत दे दी है जिसमें 10 शाखाओं में वे अपनी सर्विस के बाद पेंशन का लाभ भी उठा सकेंगी।

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भारतीय सेना में महिलाओं को अपना हक पाने में एक दशक से भी ऊपर का समय लगा जो समाज की रूढ़िवादी छवि को दिखाता है। इस लड़ाई में तरह-तरह की रुकावटें आई लेकिन अदालत ने केंद्र की दलीलों को नकारते हुए उसे एक हीन मानसिकता बताया क्योंकि महिलाओं को कमांड पोस्ट न देने के पीछे केंद्र ने शारीरिक क्षमताओं और सामाजिक मानदंडों का हवाला दिया था जो आज के समय में बिल्कुल व्यर्थ मालूम पड़ते हैं। अगर सरकार समानता में विश्वास रखती है तो उन्हें तीन तलाक कानून के साथ ही महिलाओं से जुड़े दूसरे बेहद ज़रूरी मुद्दों पर विचार करना चाहिए।

केंद्र की ढील और कोर्ट के फैसले को तवज्जो न दिए जाने का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि साल 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने की इजाजत दी थी लेकिन कोर्ट के इस फैसले पर केंद्र की तरफ से गौर नहीं किया गया। लेकिन 2 सितंबर 2011 सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कर दिया था कि हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं रहेगी इसे लागू किया जाना चाहिए। इन सब के बावजूद केंद्र ने एक दशक तक अमल नहीं किया और हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तवज्जो नहीं दी। सरकार कोई भी हो अगर वोट बैंक की राजनीति को ध्यान में रखते हुए वे बराबरी की बात करती है तो उसे अपने इन वादों को अमल में भी लाना चाहिए न कि जनता की आंखों में धूल झोंकने का काम करना चाहिए। हालांकि, समानता की इस लड़ाई में तमाम रुकावटों के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने सख्ती के माध्यम से यह ज़ाहिर कर दिया कि अधिकारों और समानता से जुड़े मुद्दों को केंद्र सरकार चाह कर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।

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तस्वीर साभार : economictimes

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