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महिलाओं से जुड़े प्रजनन अधिकारों को अक्सर केवल बच्चे पैदा करने के अधिकार के संदर्भ में देखा जाता है जबकि इसका स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक है। पहले के समय में महिला के शरीर और उसमें होने वाले बदलावों को गोपनीय रखा जाता था। पीरियड्स पर तो आज भी समाज खुलकर बात करने को तैयार नहीं होता। अगर किसी महिला की पीरियड्स से संबंधित परेशानी को उसकी शादी से पहले ससुराल वालों से छुपाया जाए तो वह अपराध है। वहीं दूसरी तरफ इसे अपराध कहने वाले लोग खुलकर पीरियड्स पर बात करना संस्कृति के खिलाफ मानते हैं। प्रजनन अधिकारों की शुरुआत तो औरत के शरीर से होती है पर इसका अंत मानवाधिकार जैसे बड़े मुद्दे पर होता है। एक औरत कितने बच्चे पैदा करेगी इसका फैसला वह खुद नहीं बल्कि पुरुष और परिवार के बड़े-बुज़ुर्ग मिलकर तय करते हैं। घर के बड़े-बुज़ुर्गो के मुंह से हमेशा एक आशीर्वाद सुनने को मिलता है, ‘दूधो नहाओ पूतो फलो।’ एक औरत को एक औरत न जनने का यह अभिशाप सदियों पुराना है जिसका पालन आज की 21 वीं सदी में रहने वाली पीढ़ियां भी करती आ रही हैं।

प्रजनन अधिकारों के लिए लड़ाई की शुरुआत नारीवादी आंदोलन की दूसरी लहर के दौरान हुई। जब यह बात साफतौर पर उजागर होने लगी कि कई सारे राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कारक मिलकर औरतों के स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल रहे थे और पारंपरिक समाज ने औरत के जीवन से जुड़े हर पहलू को जंजीरों में बांधने की कोशिश में लगा हुआ है। नारीवाद की दूसरी लहर की शुरुआत 1960 के दशक में हुई जो लगभग दो दशक तक चली। इसका उद्देश्य लैगिंक समानता को बल देना था।

जहां नारीवाद की पहली लहर मुख्य रूप से वोटिंग अधिकार और प्रॉपर्टी के अधिकार के लिए समानता के रास्ते में आने वाली कानूनी बाधाएं पार करने पर केंद्रित थी। वहीं, दूसरी लहर में बहस का दायरा बढ़ा और इसमें परिवार में महिलाओं के भेदभाव, कार्यस्थल पर शोषण, प्रजनन अधिकार जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गई। इसी के साथ घरेलू हिंसा और वैवाहिक बलात्कार के कई मुद्दे भी उभरकर सामने आए। प्रजनन अधिकारों के संबंध में रेडिकल नारीवाद का कहना है कि महिलाओं को मां बनने के लिए मजबूर किया जाता है। पितृसत्ता महिलाओं को गर्भनिरोध की पर्याप्त जानकारियों से अलग रखता है। जिन गर्भनिरोधक साधनों को पितृसत्ता उपलब्ध भी करवाता है वे सभी हानिकारक, खर्चीले होते हैं। दरअसल, प्रजनन अधिकारों की शुरुआत ही रेडिकल नारीवाद की लहर के साथ हुई जिसका उद्देश्य महिलाओं का अपने शरीर पर नियंत्रण प्राप्त करना है। यौनिकता और जेंडर जैसे विषय को निजी जीवन से सामाजिक जीवन तक लाने श्रेय ही रेडिकल आंदोलन को जाता है जिसका सबसे प्रसिद्ध नारा रहा ‘व्यक्तिगत ही राजनीतिक है।’

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प्रजनन भूमिका पर राज्य का हस्तक्षेप

भारत जब आज़ाद हुआ तो उसके विकास के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट जनसंख्या में वृद्धि बनी। इस पर काबू पाने के लिए सरकार की ओर से परिवार नियोजन के कार्यक्रम चलाए गए, 1970 के दशक में औरतों के प्रजनन पर राज्य का हस्तक्षेप रहा। इसमें गर्भनिरोधक और नसबंदी जैसे माध्यमों के जरिए जनसंख्या पर काबू पाने का प्रयास किया गया। पर भारत में आबादी नियंत्रण के लिए महिलाओं को ही अधिकतर निशाना बनाया गया। कुछ साल पहले के सरकारी आंकड़ों की बात करें तो साल 2013-2014 के दौरान करीब 40 लाख नसबंदी की गई जिसमें पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा मात्र 1 लाख तक ही सीमित रहा।

रिप्रोडक्टिव राइट्स से संबंधित मुद्दा वैश्विक स्तर पर विवादास्पद है। आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के उन्मूलन पर समिति कंवेशन ऑफ द एलिमिनेशन ऑफ ऑल फॉर्म ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट वीमेन (CEDAW) ने यह स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि महिलाओं के स्वास्थ्य के अधिकार में उनके यौन और प्रजनन अधिकार शामिल है। इसका सीधा अर्थ यह है कि राज्यों के पास महिलाओं के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य से संबंधित अधिकारों का सम्मान, संरक्षण और पूरा करने की जिम्मेदारियां हैं। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कई शर्तें रखी गई है कि महिलाएं प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी सेवाओं, वस्तुओं और सुविधाओं जिसकी वे हकदार हैं उन्हें पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हो, शारीरिक और आर्थिक रूप से सुलभ हो, उन्हें सुविधाएं देते समय किसी तरह का भेदभाव न किया जाए और वे सभी अच्छी गुणवत्ता की हो जिससे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

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गर्भसमापन पर विवाद

गर्भसमापन पर विवाद कोई नया नहीं है प्रजनन अधिकारों के समर्थक इसे महिलाओं का अधिकार मानते है जबकि दूसरा पक्ष इसके लिए परिवार की मंजूरी की बात करता है या फिर इसे एक अपराध मानकर इसका विरोध करता है। अगर गर्भसमापन एक अपराध है तो कन्या भ्रूण हत्या के उदाहरण ही क्यों देखने को मिलते है? अगर दंपत्ति की मंजूरी आवश्यक है तो पुरुष का ही इस पर अधिक वर्चस्व क्यों दिखाई पड़ता है? विरोध तथा समर्थन में बीच की कड़ी में सरकार ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट (1972) के तहत गर्भपात को कानूनी घोषित किया है। हाल ही में गर्भसमापन की समय सीमा भी 12 से 20 हफ्ते तक कर दी गई है साथ ही कुछ दिशा निर्देश भी जारी किए गए।

कानूनी मान्यताओं, योजनाओं के लागू होने के बावजूद हमारा समाज आज के इस युग में भी यह स्वीकारने को तैयार नहीं कि महिलाओं को समान अधिकार दिए जाएं, कहीं न कहीं यह बात सुनने को मिल ही जाती है यह हमारी परंपरा और संस्कृति के खिलाफ है, मनुस्मृति जैसे ग्रंथों की दुहाई दी जाती है, जिसमें औरत को एक वस्तु की तरह समझ उपभोग कर उसपर जिम्मेदारी का बोझ डाला गया। औरत केवल उपभोग का साधन और नियमों को मानने वाली कठपुतली नहीं है उसे भी समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ रहने का अधिकार है।

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तस्वीर साभार : vims

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