FII is now on Telegram
5 mins read

भारत के इतिहास और अतीत को अध्ययन करते हमें उन महिला इतिहासकारों के बारे में भी पढ़ना चाहिए जो इतिहास की हमारी जानकारी को लगातार प्रभावित करती हैं। इस लेख में हम ऐसी ही पांच ख़ास भारतीय महिला इतिहासकारों के बारे में चर्चा करेंगे।  

1. रोमिला थापर

तस्वीर साभार: बीबीसी

सबसे पहले बात करते हैं रोमिला थापर की। 30 नवंबर, 1931 को जन्मी रोमिला थापर, सेना में डॉक्टर रह चुके दया राम थापर की बेटी हैं। सीमित संसाधन होने की वजह से उनके परिवारवाले या तो उनका दहेज़ दे सकते थे या उन्हें पढ़ा सकते थे। इस बात का फैसला रोमिला के परिवार ने उनके हाथों में दिया। रोमिला थापर ने शादी की जगह आगे पढ़ने का फैसला लिया। नतीजतन पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य की पढ़ाई की। आगे जाकर, 1958 में उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की डिग्री भी ली। प्राचीन भारत के इतिहास में गहरी रूचि होने की वजह से उन्होंने इस विषय पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। वे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर एमेरिटस भी हैं। वे कॉर्नेल विश्वविद्यालय, पेनसिलवेनिया विश्वविद्यालय और कॉलेज डी फ्रांस, पेरिस की भी विजिटिंग प्रोफेसर हैं।  

उनके पूरे करियर के दौरान उन्हें ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय, ब्राउन विश्वविद्यालय और एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से ऑनररी डिग्री से भी सम्मानित किया जा चुका है। यही नहीं, दो बार उनका नाम पदम् भूषण के लिए भी जा चुका है लेकिन हर बार उनहोंने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया। उन्होंने ये प्रण ले रखा है कि वह किसी भी प्रकार के सरकारी पुरस्कार को स्वीकार नहीं करेंगी।  

वे बताती है कि उन्हें प्राचीन भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास और हिस्टोरिओग्राफ़ी में बेहद रूचि है। वे कहती हैं कि इतिहासकार को लिखते समय अपने पूर्वाग्रहों का ध्यान रखना चाहिए। उनके मुताबिक इतिहास को सामाजिक विज्ञान के तौर पर पढ़ना चाहिए न कि भारतीय विद्या के तौर पर। 89 साल की थापर भारत के प्राचीन इतिहास के क्षेत्र में एक बड़ा नाम हैं।     

और पढ़ें: गुलबदन बानो बेग़म : मुग़ल साम्राज्य की इतिहासका

2. तनिका सरकार

तस्वीर साभार: न्यूज़क्लिक

साल 1949 में जन्मी तनिका सरकार ने प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता से इतिहास की पढ़ाई की है। आधुनिक भारत की जानी-मानी इतिहासकार तनिका सरकार जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की रिटायर्ड प्रोफेसर हैं। उन्हें सेंट स्टीफेंस कॉलेज, जेएनयू, कैम्ब्रिज और शिकागो विश्वविद्यालय में भी पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया जा चुका है। वे अपने विद्यार्थियों से कहती हैं, ‘जब भी मैं आपके किसी भी सवाल का जवाब को देने की कोशिश करती हूं तो मैं ये सोचती हूं कि अगर मेरे वक़्त में मुझे इतने सारे विषयों के बारे में पता होता तो मैं अपनी रुचियों और दिलचस्पियों को काफी बेहतर ढंग से समझ पाती।’                         

तनिका सरकार कई विषयों पर लेख लिख चुकी है, जैसे कि ‘बंगाल 1928 – 1934: विद्रोह की राजनीति और हिन्दू स्त्री’, ‘हिन्दू राष्ट्र: समाज, धर्म, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’, आदि। तनिका सरकार का काम लिंग, धर्म और राजनीति के इंटरसेक्शन जैसे मुद्दों पर आधारित है। उन्होंने औरतों और हिन्दू अधिकारों पर विशेष ध्यान दिया है।    

3. उपिंदर सिंह

तस्वीर साभार: द वायर

साल 1959 में जन्मी उपिंदर सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गुरशरण कौर की बेटी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की पूर्व अध्यक्ष, उपिंदर सिंह भारत की महत्वपूर्ण इतिहासकारों में से एक है। इन दिनों वे अशोका विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर हैं। वे लिवन विश्वविद्यालय, बेल्जियम की अतिथि प्रोफेसर भी हैं। इसके अतिरिक्त, मेकगिल विश्वविद्यालय से उन्हें पीएचडी की डिग्री मिली है। साल 2005 में उन्हें हार्वर्ड विश्वविद्यालय से डेनियल इंगल्स फ़ेलोशिप से भी नवाज़ा जा चुका है।       

उनके काम का केंद्र भारत का प्राचीन इतिहास है। मध्यकालीन भारत से लेकर पुरातत्व तक, वे अब तक 8 किताबें लिख चुकी हैं। उनकी किताब, ‘प्राचीन भारत में राजनीतिक हिंसा’ में वे यह बताती हैं कि कैसे प्राचीन भारत में हिंसा और अहिंसा, दोनों ही मौजूद थे। आगे वे कहती हैं, ‘अगर हम प्राचीन भारत से कोई प्रेरणा लेना चाहते हैं तो हमें इसे पूजना बंद करना होगा और इसकी जटिलताओं को समझना होगा।’ वे यह भी कहती हैं कि हमें एक विविध आधुनिक समाज को बनाए रखने के लिए प्राचीन विचारों की महत्ता को समझना और स्वीकारना होगा।       

और पढ़ें: आदिवासी लेखिकाओं की ये 7 रचनाएँ आपको भी पढ़नी चाहिए

4. नयनजोत लहिरी

तस्वीर साभार: ओपन

नयनजोत लहिरी अशोका विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में भी पढ़ा चुकी हैं। वहां वे डीन के पद पर भी रह चुकी हैं। इनकी रूचि प्राचीन भारत, भारतीय पुरातत्व और हेरिटेज स्टडीज में है। वे कई किताबें भी लिख चुकी हैं, जैसे कि ‘द आर्किओलॉजी ऑफ़ इंडियन ट्रेड रुट्स’, ‘फाइंडिंग फॉरगॉटन सिटीज’, आदि।  साल 2010 में भारत सरकार ने एंशियंट मॉन्यूमेंट्स ऑर्डिनन्स के प्रभाव का विश्लेषण करने के लिए एक समिति का गठन किया था। बाकी दूसरे सदस्यों के अतिरिक्त, नयनजोत लहिरी भी इस समिति की सदस्य थी। इस समिति को इसी मुद्दे पर दूसरा बिल ड्राफ्ट करने की जिम्मेदारी भी दी गई थी। दूसरे बिल का जो मसौदा इस समिति ने बनाया, वही आगे चलकर कानून बना। 

साल 2013 में नयनजोत को ह्यूमेनिटीज़, आर्किओलॉजी केटेगरी में इनफ़ोसिस पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। यही नहीं, अमेरिकन हिस्टोरिकल एसोसिएशन ने उनकी किताब, ‘प्राचीन भारत में अशोका’ को जॉन एफ रिचर्ड पुरस्कार से नवाज़ा है। दक्षिण एशियाई इतिहास पर सबसे अच्छी किताब के तौर पर उनकी इस किताब को पहचान मिली है।  

5. उमा चक्रवर्ती

तस्वीर साभार: नैशनल हेराल्ड

प्रसिद्ध नारीवादी इतिहासकार, उमा चक्रवर्ती मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्विद्यालय में पढ़ाती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ने से पहले उन्होंने बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से इतिहास में मास्टर्स की डिग्री ली थी। विशेष तौर पर उनकी रूचि बौद्ध धर्म, प्राचीन भारत का इतिहास और सामाजिक समस्याएं हैं। वे अब तक 7 किताबें लिख चुकी हैं। अनगिनत लेख लिखने के अतिरिक्त, उनकी रूचि मानवाधिकारों के हनन जैसे मुद्दों में भी है।

आज वे महिला अधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों की एक्टिविस्ट के रूप में जानी जाती हैं। वह इतिहासकारों और नारीवादियों दोनों के लिए ही प्रेरणा की स्त्रोत हैं।  वे फिल्म उद्योग से भी जुड़ी हुई हैं। उन्होंने अत्याचार पर आधारित दो फिल्मों का भी निर्देशन किया है। एक बार जब उनसे जाति संबंधित अनुभवों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘हमें उन्हें वह जगह देने की जरूरत है जहां वे अपने दर्द को वास्तव में ‘अपने दर्द’ की तरह बता सके।’ उमा चक्रवर्ती के मुताबिक उत्पीड़न अलग अलग स्तर पर होता है।  

और पढ़ें : दक्षिण एशिया की पांच मशहूर लेखिकाएं जिन्हें पढ़ना चाहिए


तस्वीर साभार : फ़ेमिनिज़म इन इंडिया

Support us

Leave a Reply