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जब हम महिला या पुरुष के खिलाफ होनेवाली हिंसा और उत्पीड़न की बात करते हैं, तो महिला या पुरुष के अपने प्रेमी या प्रेमिका से रिश्ते टूट जाने पर उन्हीं प्रेमी या प्रेमिका द्वारा की जाने वाली मानसिक या शारीरिक हिंसा और उत्पीड़न पर भी बात करना आवश्यक हो जाता है। ये हिंसा और उत्पीड़न का वह दायरा है जिसके बारे में पुरुष तो फिर भी साझा करते हैं लेकिन महिलाएं इसके बारे में खुलकर कम बात करती हैं या बात ही नहीं करती। परिवार और समाज नाम की संस्था इस मसले पर बात करने के लिए महिलाओं को कोई स्पेस ही नहीं देता। पूर्व प्रेमियों से संबंध टूटने के कारण होने वाली हिंसा, महिलाओं को उनके ही अतीत में कैद करने की कोशिश करती है। अक्सर ये भी कह दिया जाता है की ज़रूर गलती महिला की ही रही होगी। जबकि एक रिश्ते से अलग हो जाना, महिला और पुरुष में से किसी की भी मर्ज़ी हो सकती है।  

अधिकतर यह देखा जाता है कि भारतीय परिवेश में पुरुष का महिला प्रेमी से अलग होना एक सामान्य बात मानी जाती है। वहीं, महिला का पुरुष प्रेमी से अलग होना सामान्य बात नहीं मानी जाती है। पुरुष अगर कुछ सालों तक किसी महिला के साथ रिश्ते में रहने के बाद उस महिला के साथ नहीं रहने का फैसला करते है तो वो आराम से अलग हो सकते हैं। पुरुष अपने दोस्तों और परिवार वालों से भी अपनी पूर्व प्रेमिका के बारे में बात कर सकते हैं। पुरुष के ऐसा करने पर सवाल कम उठाए जाते हैं लेकिन महिलाएं अलग अपने किसी पूर्व रिश्ते का ज़िक्र करती हैं तो उन्हें शक की निगाहों से देखा जाता है, उनके चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं।

जब महिला एक पुरुष से अलग होना चाहती है भले वह रिश्ता कुछ ही दिनों का हो पर अधिकतर महिलाओं को रिश्ते से अलग होने की वजह से शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। महिला का पुरुष से अलग होना सामान्य नज़रिये से नहीं देखा जाता। कोई महिला जब पुरुष से रिश्ते को ख़त्म करने की बात करती है तो उस महिला के साथ ‘वर्जिनिटी’ के मुद्दे को जोड़ दिया जाता है। पुरुषों की वर्जिनिटी को कभी शुद्धता के तराज़ू पर नहीं तोला जाता, वे तो आराम से महिलाओं से अलग हो सकते हैं। वर्जिनिटी, शुद्धता जैसे मुद्दे पितृसत्तात्मक समाज का ही देन है, जिसकी वजह से महिलाओं को एक ही रिश्ते में रहने के लिए बाध्य किया जाता है। 

जब महिला एक पुरुष से अलग होना चाहती है भले वह रिश्ता कुछ ही दिनों का हो पर अधिकतर महिलाओं को रिश्ते से अलग होने की वजह से शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।

भारतीय समाज में अभी भी महिलाओं को प्रेम करने का अधिकार नहीं है। अगर महिलाओं ने प्रेम कर भी लिया और आगे चलकर जब वे इस रिश्ते से आज़ाद होना चाहती हैं तो उन्हें सेक्सटुअल प्यूरिटी /इम्पुरिटी के ढांचे में डाल कर उनको उसी प्रेमी से शादी करने की सलाह दी जाती है। महिलाएं जिसे पहली बार पसंद या प्रेम करें उसी से शादी करे तभी वे ‘अच्छी और शुद्ध’ औरत कह लाएंगी। ये सब समाज की महिलाओं के खिलाफ गढ़ी हुई पितृसत्तात्मक संरचना है। होता यूं है कि समाज ने गढ़ी हुई इस संरचना में फंसकर अधिकतर महिलाएं अपने जीवन में सही साथी का चयन नहीं कर पाती। यह समाज को बुरी तरह प्रभावित करता है क्योंकि इसका महिला और पुरुष की ख़ुशी से कुछ लेना-देना नहीं होता है। यह सिर्फ किसी के अहं को संतुष्ट करने का मसला है।

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महिलाओं को शादी से पहले पुरुष से कोई संबंध नहीं रखने या पुरुषों से कम बात करने की हिदायत हर महिला को दी जाती है। फिलहाल टिंडर, वू , इलीट सिंगल जैसे डेटिंग साइट्स मौजूद हैं लेकिन इनका इस्तेमाल करने वाली महिलाएं अधिकतर मध्यम, उच्च वर्ग और उच्च जाति की होती हैं। साथ ही डेटिंग साइट्स को इस्तेमाल करके भी अगर महिला किसी साथी को चुनती है और कुछ समय या सालों बाद अपने प्रेमी से अलग होती हैं तो महिलाएं अपने ही पुरुष मित्रों द्वारा ‘सेक्सुअल ऑब्जेक्टिफिकेशन’ का सामना करने को मजबूर होती हैं। 

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अक्सर यह देखा गया है कि अगर किसी रिश्ते में परेशानी महिला को होती है और वह पुरुष से अलग हो जाना चाहती है तो पुरुष उनको पहले तो प्यार से मनाने की कोशिश करते हैं और जब महिलाएं उनके साथ न रहने की बात पर डटी रहती हैं तो पुरुष महिला को डराते – धमकाते हैं। कुछ पुरुष तो अपने महिला की निजी तस्वीरों/जानकारियों को सोशल मीडिया या महिला के परिवार से साझा करने की धमकी देते हैं। महिलाएं अपने पुरुष प्रेमी के अलग हो जाने पर शायद ही ऐसा कोई कदम उठाती हैं। पर यह भी देखा गया है कि पुरुष से अलग हो जाने की बात कहने पर कुछ महिलाएं आत्महत्या या दूसरे तरीकों से खुद को तकलीफ पहुंचाने की कोशिश करती हैं। इस प्रकार महिलाओं के ये कदम भी मानसिक तनाव की वजह बनते हैं।

महिला और पुरुष दोनों को बराबर अधिकार है कि वे खुद तय करें कि उनको जीवन में किसके साथ रहना है या नहीं रहना है। इस प्रकार साथ रहने या न रहने का निश्चय और साथी का चुनाव, महिला और पुरुष दोनों के लिए सामान्य बात होनी चाहिए। जो भी अलग होना चाहे, बातचीत करके अलग हो सकता है। पुरुषों या महिलाओं ने किसी को उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ साथ रहने के लिए बाध्य करना या किसी तरीके से परेशान करना, एक दूसरे पर की जाने वाली हिंसा और उत्पीड़न का ही स्वरूप है। वो पुरुष या महिला जो सिर्फ अपने अहं को संतुष्ट करने के लिए अपने साथी को जबरन अपने प्रेम में बांधे रखना चाहते हैं वे किसी से प्रेम नहीं कर सकते। न ही ऐसे लोग कभी किसी महिला या पुरुष के लिए एक साथी का सही विकल्प हो सकते हैं ।

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यह लेख रितिका श्रीवास्तव ने लिखा है जो टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान हैदराबाद में पीएचडी की छात्रा हैं

तस्वीर साभार : wikihow

Ritika Srivastava has completed her M.Phil. in Education from Tata Institute of Social Sciences, Hyderabad. Presently She is pursuing Ph.D. in Education from the same institute. After M.Phil., She worked in the Regional Institute of Education (NCERT) Bhopal as Assistant Professor in Education. She likes to work with children and teachers. She likes to read, write, and discuss contemporary equity and equality issues of education and society.

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3 COMMENTS

  1. रितिका जी नमस्कार
    बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने,
    महिलाओं को सामान अधिकार अवश्य मिलना चाहिए परन्तु हम महिला को पुरुष के बराबर नहीं उससे अधिक मिलना चाहिए यह अभी से नहीं वरन आदिकाल से है.
    स्त्री हमेशा से पूजनीय रहीं हैं , आज भी पूजनीय है,
    इसलिए स्त्रीयों को स्वच्छ रहने कहा जाता है, क्योंकि वो स्वयं देवी स्वरूप है , पुरूष का आस्तित्व नारी से है!

    हमारे संस्कृति में हमेशा से स्त्री को प्रथम संज्ञा दी गई है,
    नारी को कभी उपभोग की वस्तु नहीं माना गया है,
    यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता…
    हम सब भगवान राम की जय बोलते हैं, लेकिन कभी भी जय राम नहीं कहते हैं ,
    जय श्री राम कहते हैं
    “श्री” का अर्थ लक्ष्मी जी से है
    “राम” का अर्थ नारायण जी से है

    जय श्री राम

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