FII Hindi is now on Telegram

हमारा देश अनगिनत सामाजिक आंदोलनों के आधार पर बना है। हज़ारों स्वतंत्रता आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों के बाद ही हमें साल 1947 में जाकर आज़ादी मिली। आज़ाद होने के बाद भी अनेक बार इस देश के नागरिकों को सामाजिक आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा है। मौजूदा खराब परिस्थितियों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए या सरकार द्वारा किए गए किसी अन्याय के विरोध के लिए लोग सामाजिक आंदोलनों का सहारा लेते हैं। इनमें से कई आंदोलन ऐसे हैं जो महिलाओं ने शुरू किए थे और आगे बढ़ाए थे। 

साल 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में किस तरह देशभर की महिलाएं सड़कों पर उतर आई थी वह हम सबने देखा है। ‘शाहीन बाग की दादियों’ के बारे में आज पूरी दिल्ली जानती है। यह पहली बार नहीं है जब भारत की औरतों ने एकजुट होकर नया इतिहास रच दिया हो। इसलिए हम आज बात करेंगे औरतों द्वारा शुरू किए गए उन छह सामाजिक आंदोलनों की, जो इस देश की प्रगति में मील के पत्थर साबित हुए।

1.  चिपको आंदोलन 

तस्वीर साभार: wikipedia

साल 1973 में मौजूदा उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में ‘चिपको आंदोलन’ शुरू हुआ था। इस क्षेत्र के जंगल सरकार ने इलाहाबाद के एक खेल सामग्री बनाने वाले को बेच दिए थे ताकि पेड़ों को काटकर टेनिस रैकेट बनाए जा सके। स्थानीय महिलाओं ने इस निर्णय का विरोध किया और गौरा देवी के नेतृत्व में जंगलों को कटने से बचाने के लिए वे पेड़ों से चिपककर खड़ी हो गई। यह था ‘चिपको आंदोलन’। यह सामाजिक आंदोलन चार दिनों तक जारी रहा जिसके बाद खेल सामग्री की कंपनी को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद उत्तराखंड के पहाड़ों में पेड़ काटना 15 सालों के लिए प्रतिबंधित रहा। चिपको आंदोलन भारत के सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय आंदोलनों में से एक है। 

और पढ़ें : ‘पर्यावरण संरक्षण आंदोलन’ में भारतीय महिलाओं की सक्रिय भागीदारी

Become an FII Member

2. ग्रंविक हड़ताल

तस्वीर साभार: striking-women

यह आंदोलन भारत में तो नहीं हुआ, पर इसमें शामिल सभी महिलाएं भारतीय मूल की थी। लंदन की ग्रंविक फैक्ट्री में ज़्यादातर कामगार भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों की महिलाएं थी। साल 1976 में एक कामगार जयाबेन देसाई ने फैक्ट्री के असहनीय हालात और अधिकारियों की नाइंसाफ़ी के खिलाफ़ फैक्ट्री कामगारों का हड़ताल बुलाया था। उनका कहना यह था कि कुछ ही दिनों पहले उनके बेटे देवशी को फैक्ट्री से निकाल दिया गया था। उन्होंने यह शिकायत भी थी कि फैक्ट्री के मालिक नस्लवादी हैं और जानबूझकर अपने भारतीय, एशियाई और अफ्रीकन कामगारों से अमानवीय परिस्थितियों में काम करवाते हैं। इस हड़ताल में शामिल लगभग 130 कामगारों को नौकरी से निकाल दिया गया। एक साल तक ग्रंविक फैक्ट्री के खिलाफ़ विरोध-प्रदर्शन जारी रहे जिनमें बीस हज़ार से भी ज़्यादा भारतीय महिला कामगारों ने भाग लिया। यह आंदोलन अधूरा रह गया क्योंकि इन औरतों की मांगें कभी पूरी नहीं हुई पर इतिहास में पश्चिमी दुनिया ने देखा कि भारतीय औरत शोषण के खिलाफ़ आवाज़ उठा सकती हैं और अपने अधिकारों के लिए लड़ सकती है। 

और पढ़ें : दक्षिण भारत के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की कहानी

2019 में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में किस तरह देशभर की महिलाएं सड़कों पर उतर आई थीं वह हम सबने देखा है। ‘शाहीन बाग की दादियों’ के बारे में आज पूरी दिल्ली जानती है। यह पहली बार नहीं है जब भारत की औरतों ने एकजुट होकर नया इतिहास रच दिया हो।

3. न्यूक्लियर विरोधी आंदोलन 

तस्वीर साभार: rediff.com

साल 1988 में तमिलनाडु के इडिंतकरई गांव की औरतों ने तिरुनेलवेली में बसाए जानेवाले कुडंकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट का विरोध करना शुरू किया। मछुआरा समुदाय की इन औरतों का कहना है कि न्यूक्लियर विकिरण समुंदर को नुकसान पहुंचा सकता है, जो पर्यावरण और उनके रोज़गार दोनों के लिए एक खतरा है। साल 2001 में इस पावर प्लांट का निर्माण शुरू हुआ और यह साल 2013 से क्रियाशील है। इस बीच कई हड़ताल, प्रदर्शन और आमरण अनशन भी किए गए हैं पर किसी भी सरकार ने अभी तक इन महिलाओं की नहीं सुनी है। 

4. अरक विरोधी आंदोलन

तस्वीर साभार: schools

साल 1990 से देशभर में साक्षरता अभियान शुरू हुए। इन अभियानों में महिलाओं ने भारी मात्रा में हिस्सा लिया। साक्षरता अभियान महिलाओं के लिए फ़ायदेमंद साबित हुए क्योंकि वे यहां सिर्फ़ पढ़ना-लिखना ही नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों के बारे में भी सीख रही थी। आंध्र प्रदेश के नेल्लोर ज़िले में इन्हीं अभियानों ने एक सामाजिक आंदोलन छेड़ दिया। महिलाएं जितनी जागरूक होने लगी, उन्हें एहसास होने लगा कि उनके गांव में ठेका शराब या ‘अरक’ की बिक्री एक बहुत बड़ी समस्या है। उनके पति दिनभर शराब के नशे में चूर रहते और काम पर नहीं जाते, जिसका असर उनकी आर्थिक स्थिति पर पड़ता। शराब पीकर वे घरेलू हिंसा भी करते थे। साल 1992 में महिलाओं ने ‘अरक विरोधी आंदोलन’ शुरू किया जिसका मकसद था पूरे राज्य में ठेका शराब पर प्रतिबंध लगाया जाए। यह आसान नहीं था क्योंकि शराब माफ़िया के साथ कई बड़े राजनेता भी शामिल थे, पर लंबे संघर्ष के बाद यह आंदोलन कामयाब हुआ।

और पढ़ें : अरक विरोधी आंदोलन : एक आंदोलन जिसने बताया कि शराब से घर कैसे टूटते हैं!

5.  मुन्नार चाय बागान हड़ताल

तस्वीर साभार: thehindubusinessline

साल 2015 में केरल के मुन्नार के चाय बागानों में काम करती महिलाओं ने अपनी पगार 230 रुपए से 500 रुपए में बढ़ाने के लिए आंदोलन किया। धीरे-धीरे आंदोलन बड़ा होता गया और सिर्फ़ पगार बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा। नौ दिनों तक हड़ताल करती महिला कामगारों ने कहा कि पुरुष कामगारों से कहीं ज़्यादा काम करने के बावजूद उन्हें सही वेतन नहीं मिलता और उनके साथ काम करनेवाले मर्द दिनभर शराब के नशे में पड़े रहकर भी उनसे ज़्यादा कमाते हैं। महिलाओं की शिकायत यह भी थी कि सारी बड़ी राजनैतिक पार्टियों के मज़दूर संगठन उनका साथ देने का नाटक ही करते हैं और अपने राजनैतिक फ़ायदे के लिए उनका इस्तेमाल ही करते हैं। इसलिए इस आंदोलन में सिर्फ़ महिलाओं को हिस्सा लेने दिया गया और किसी भी नेता या राजनैतिक संगठन को इसमें भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई। महिलाओं ने अपनी लड़ाई अकेले लड़ी और अपने अधिकार हासिल करने में सफल हुईं। 

6. दिल्ली गैंगरेप के विरोध में प्रदर्शन

तस्वीर साभार: slate

दिसंबर 2012 में दिल्ली की एक बस में एक छात्रा का सामूहिक बलात्कार किया गया और उसे नृशंस तरीके से मारा गया। इसके बाद दिल्ली में कई महिलाएं हमारे समाज के ‘रेप कल्चर’ का विरोध करने और एक सुरक्षित, आज़ाद ज़िंदगी जीने के अपने अधिकार के लिए सड़कों पर उतर आईं। इंडिया गेट के सामने हज़ारों प्रदर्शनकारी इकट्ठे हुए और संसद भवन के सामने भी प्रदर्शन हुए। पुलिस और प्रशासन ने बेरहमी से प्रदर्शनकारियों को दबाने की कोशिश की पर आंदोलन बड़ा होता गया और दिल्ली से पूरे देश में फैल गया।

और पढ़ें : इतिहास के आईने में महिला आंदोलन


तस्वीर साभार: aljazeera

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply