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साल 2018 में मीटू कैंपेन के दौरान भारत में फिल्म जगत, मीडिया, कॉरपरेट जगत से लेकर आम घरों में होने वाली यौन हिंसा की कई कहानियां हमारे सामने आई थी। इस दौरान न जाने कितनी ही नामचीन हस्तियों से लेकर हमारे आस-पास मौजूद पुरुषों पर महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाए थे। दफ्तरों से घरों तक महिलाओं के साथ हुए यौन शोषण की कहानियां एक-एक कर हमारे सामने आ रही थी। खासकर दफ्तरों में महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न की घटनाओं ने हमारे सामने यह सवाल खड़ा किया कि आखिर कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा कब सुनिश्चित होगी। भारत में मीटू कैंपेन को लगभग 3 साल पूरे होने को आए हैं लेकिन यह सवाल अब भी हमारे सामने मौजूद है। आइए सबसे पहले जानते हैं कि हमारे देश में कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा कानून कब अस्तित्व में आया।

भंवरी देवी- ये उस महिला का नाम है जो वजह बनी कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानून को अस्तित्व में लाने की। साल 1992 में भंवरी देवी राजस्थान के जयपुर के भतेरी गांव में राज्य सरकार के महिला विकास कार्यक्रम के तहत साथिन के रूप में काम करती थी। इस दौरान वह बाल विवाह के खिलाफ घर-घर जाकर प्रचार किया करती थी। एक बार एक वह ऊंची जाति की नाबालिग बच्ची की शादी रुकवाने गई तो गांव के उंची जाति के मर्दों को यह बात नागवार गुज़री। 22  सितंबर 1992 को भंवरी देवी के साथ ऊंची जाति के लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया। भंवरी देवी के लिए न्याय पाने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं थी। 15 नवंबर 1995 को कोर्ट ने सभी आरोपियों को निर्दोष बता बरी कर दिया। लेकिन भंवरी देवी के साथ हुई इस नाइंसाफी के खिलाफ गैर-सरकारी संगठनों ने 1997 में विशाखा के नाम से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की। इस याचिका में भंवरी देवी के लिए न्याय और कार्यस्थलों पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन उत्पीड़न के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। तब सुप्रीम कोर्ट ने ‘विशाखा गाइडलाइंस’ जारी की।

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