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लोकतंत्र यानी लोक के लिए तंत्र। ऐसा तंत्र, जिसमें लोक की आकांक्षाएं निहित हो। लोकतंत्र एक आधुनिक अवधारणा है जिसकी शुरुआत यूरोप से हुई। असल में, सामंतवादी संरचना की भ्रष्टता और अत्याचार के ख़िलाफ़ फ्रांस से शुरू हुए विद्रोह के बाद राजशाही और सामंतवादी तत्वों के लिए अपने आप को दोबारा स्थापित करना संभव नहीं हुआ। उस व्यवस्था की क्रूरता और विभेद से जूझते हुए जनता बाज़ार और समाज के संचालन के लिए एक नया माध्यम तलाश रही थी। उसी समय स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे आदर्श मज़बूती से रखे गए, जिसे व्यापक जनसमर्थन मिला। दुनिया के अलग-अलग भागों में राजशाही और सामंती व्यवस्था के ख़िलाफ़ रोष विद्रोह में तब्दील हुआ और व्यक्तिगत चेतना का उभार हुआ। 

यूरोप के देशों से लोकतांत्रिक विचार इनके उपनिवेशों तक पहुंचे। उपनिवेशवाद की अवधारणा मूल रूप से व्यापार के एक नए और व्यापक स्वरूप के लिए विश्व के अलग- अलग भूखंडों पर कब्ज़ा करने से हुआ। जहां शुरुआत में दूरवर्ती समृद्ध जगहों को बाज़ार बनाकर इस्तेमाल किया गया और बाद में उनपर राजनीतिक कब्ज़ा किया गया। आगे चलकर, अमेरिका ने पूंजीवाद को रूस के साम्यवाद के ख़िलाफ़ मज़बूती देने के उद्देश्य से, एक आदर्शवादी ढांचे के रूप में मान्यता दिलाने के लिए लोकतंत्र को दुनिया के सामने विकल्प के तौर पर रखा। बाद में, दुनिया के लगभग सभी उपनिवेशों और अन्य देशों में पूंजीवाद और लोकतंत्र साथ-साथ विकसित हुए। पूंजीवाद के केंद्र में मुक्त बाज़ार की अवधारणा है, इसी तरह लोकतंत्र की नींव भी स्वतंत्रता के विचार पर टिकी है। ये दोनों ही मिलकर एक आदर्शवाद गढ़ते हैं, मगर असलियत यह है कि संसाधनों को अपने क़ाबू में रखकर पूंजीपति आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बढ़त बनाए हुए है। इस तरह से स्वतंत्रता असल में सीमित है, यह तब तक है, जबतक स्थापित पूंजीवादी संरचना को खतरा न हो।

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लोकतंत्र सभी नागरिकों चाहे वे किसी भी रंग, धर्म, जाति वर्ण, लिंग के हों, एक समान अधिकार देने की बात करता है। संविधान सभी के अस्तित्व की गारंटी लेता है लेकिन असलियत में समाज के बहुत सारे समूह हाशिए पर हैं।

आज लगभग विश्व के अधिकतर देश लोकतांत्रिक प्रणाली से संचालित हैं। लोकतंत्र में सरकार किसी राजनीतिक इकाई के भीतर रहने वाले लोगों द्वारा अपने प्रतिनिधियों के चुनाव से बनी होती है। यह मूल रूप से बहुमत की सरकार होती है। विश्व के अलग-अलग भागों में मानव जाति अपनी विविधताओं सहित निवास करती है। उनके अस्तित्व और बसने के अपने ऐतिहासिक कारण हैं। उदाहरण के तौर पर- अमेरिका के अश्वेत नागरिक मूल रूप से औपनिवेशिक काल में दक्षिण अफ्रीका से ले जाए गए दासों के वंशज हैं, जबकि वहां के श्वेत नागरिक मूल रूप से यूरोपीय पूर्वजों के वंशज हैं, जो औपनिवेशिक दौर में ‘नेटिव अमेरिकियों’ को खदेड़कर वहां बस गए थे। अमरीकी स्वतंत्रता के इतने सालों बाद, वहां के इतिहास में बराक ओबामा पहले अश्वेत राष्ट्रपति हुए और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए चुने गए। लेकिन आज भी अमेरिका नस्लीय भेदभाव से उबर नहीं पाया है। हाल ही में नस्लवाद की घटना और ‘ब्लैक लाइफ मैटर्स’ जैसे आंदोलन ने लोकतंत्र की भीतर की सच्चाई दुनिया के सामने खोलकर रख दी।

लोकतंत्र सभी नागरिकों चाहे वे किसी भी रंग, धर्म, जाति, वर्ण, लिंग के हों, एक समान अधिकार देने की बात करता है। संविधान सभी के अस्तित्व की गारंटी लेता है लेकिन असलियत में समाज के बहुत सारे समूह हाशिए पर हैं। विकसित से लेकर विकासशील तक, सभी देशों में स्त्रियां समानता के लिए लगातार संघर्ष लग रही हैं। उत्तर-आधुनिक विश्व में शिक्षा के व्यापक प्रसार के बावजूद महिलाएं स्त्री-द्वेषी और महिला-विरोधी टिप्पणियां झेल रही हैं। महत्वपूर्ण पदों तक अभी भी उनकी पहुंच संभव नहीं हुई है। हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस की डेमोक्रैट सदस्य अलेक्जेंड्रिया ओकासियो कार्टेज के ख़िलाफ़ रिपब्लिकन सदस्य टेड योहो ने ‘डिस्गस्टिंग’ और ‘यू आर आउट ऑफ योर फ्रीकिंग माइंड’ जैसी भाषा का इस्तेमाल किया। बाद में उन्होंने अपने घर में पत्नी और बेटियां होने का हवाला देते हुए अपने स्त्री-द्वेषी व्यवहार से मुकरने की कोशिश की। इस घटना के ख़िलाफ़ बोलते हुए कार्टेज कहती हैं कि ‘असल में, यह मुद्दा एक घटना के बारे में नहीं है। यह सांस्कृतिक मसला है। लंबे समय से महिलाओं के ख़िलाफ़ भेदभाव और हिंसा होती रही है। भाषा में भी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसक शब्दावलियों का प्रयोग होते रहा है और सत्ता की संपूर्ण आंतरिक संरचना इसका समर्थन करती आई है।’

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पुरूष अपने समकक्ष स्त्री की मौजूदगी को अभी भी स्वीकार नहीं कर पाए हैं। इसीलिए तो अक़्सर ही महिलाओं को ‘किचन’ संभालने की नसीहत दी जाती है। इन सबके पीछे कारण हैं सत्ता के सर्वोच्च पद से महिलाएं सदैव विस्थापित रही। लोकतंत्र से दुनिया को रूबरू करवाने का दावा करने वाले देश अमेरिका के आजतक के इतिहास में एक भी महिला राष्ट्रपति नहीं हुई। यह अपने आप में लोकतंत्र की मूल अवधारणा के ही ख़िलाफ़ है। भारत में भी सत्ता के सभी महत्वपूर्ण पदों पर हमेशा पुरुष ही काबिज रहे हैं। भारत के इतिहास में इंदिरा गांधी एकमात्र महिला प्रधानमंत्री रही। हालांकि अगर वे नेहरू की बेटी नहीं होतीं, तो ठीक तौर पर नहीं कहा जा सकता कि उन्हें यह अवसर मिलता भी या नहीं। आज भी बंगाल को छोड़कर भारत के अन्य सभी राज्यों के प्रमुख पुरुष हैं।

लोकतंत्र में आज भी बहुत सारे पद ‘टोकन’ के रूप में महिलाओं और पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को दे दिए जाते हैं, जो मात्र दिखावा भर होता है। प्रगतिशील होने का दिखावा, जिसके सहारे इन वर्गों का वोट ऐंठा जाता है। याद कीजिए, 2017 का राष्ट्रपति चुनाव, जहां दलित बनाम दलित समीकरण बने थे। ऐसे समीकरण मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री पद की होड़ में नहीं दिखते। ज़रूरी बात यह है कि जितने भी महत्वपूर्ण और शक्तिशाली पद हैं, वहां दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और महिलाओं के लिए स्थान आज भी नहीं है। आधी आबादी के बावजूद संसद में महिलाओं की कुल संख्या मात्र 14.39 फीसद है। इस राजनीतिक दौर में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और स्त्रियों के लिए मुखरता से अपनी बात रखना मुश्किल है क्योंकि वे मात्र चेहरा हर हैं और किसी भी क्षण नज़रअंदाज़ कर दिए जा सकते हैं, पार्टी के भीतर इससे ज़्यादा उनकी अहमियत न के बराबर रह गई है।

दुनियाभर में 15 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया जाता है। इस मौके पर दुनियाभर में सरकारों के लोकतांत्रिक चरित्र को परखना और उसकी कमियों को उजागर कर बेहतर सुझाव देना और उस पर विचार करना ज़रूरी हो जाता है। लोकतंत्र में नागरिक सर्वोपरि होते हैं। उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी सबसे महत्वपूर्ण होती है। सरकारों के काम करने और व्यवहारिकता पर आलोचना करने के लिए उन्हें स्वतंत्र होना चाहिए। भारत सहित दुनिया भर में हाल के समय में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाया गया है। हालांकि इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि वर्तमान दौर में दुनिया भर में दक्षिणपंथी सरकारों का उदय हुआ है ,जिन्होंने व्यापक तौर पर विरोध के स्वरों को कुचलकर लोकतंत्र की हत्या की है। भारत में सरकारी नीतियों के विरोध में संलग्न लोगों के ख़िलाफ़ लगाई गई यूएपीए की नीति असल में लोकतंत्र की हत्या करने में एक कील की तरह है।

देश में आज भी दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों का जीवन बद्तर है। सामाजिक-आर्थिक स्तर पर अब भी उन्हें अलगाया जाता है। दलित एक्टिविस्ट पॉल दिवाकर नेशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स से जुड़े हुए हैं, वे बताते हैं कि दलितों की कुल आबादी लगभग 200 मिलियन है। भारत के 6 लाख गांवों में लगभग सभी की बाहरी सीमा पर छोटे समूह के रूप में इनके आशियाने संकुचित किए गए हैं। आज भी सीवर और नालों की सफ़ाई करने वाला व्यक्ति दलित अथवा पिछड़ा ही होता है। ये समूह भुखमरी से पीड़ित हैं और शिक्षा इनके लिए एक ‘प्रिविलेज’ की तरह है। किसी आदिवासी इलाके में कोई बच्ची भात-भात कहते हुए मर जाती है और इस लोकतांत्रिक देश में आदिवासियों की बात करने वालों से जेलें भर दी जाती हैं जबकि एक अपराधी संसद में बैठकर धर्म की बात करता है। असल में, जीवन और अस्तित्व के संघर्ष में जूझते ये लोग नहीं जानते कि लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है।

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तस्वीर साभार : theweek

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