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हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने बेटियों के सम्पत्ति के अधिकार की दोबार व्याख्या करके उन सभी शर्तों को ख़ारिज कर दिया, जिससे बेटियों को अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। वहीं दूसरी तरफ़, माहवारी के मुद्दे पर बॉलीवुड में बनी फ़िल्म ‘पैडमैन’ के बाद यह विषय इस कदर सुर्खियों में आया कि संस्थागत और सरकारी स्तर पर माहवारी से जुड़े विषयों पर ढेरों प्रयास किए जाने लगे। कहने का मतलब यह है कि बात चाहे लड़कियों के वैधानिक अधिकार की हो या फिर उनके स्वास्थ्य की, मौजूदा समय में इनसे जुड़े सभी आयामों पर अलग-अलग प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे लड़कियों के विकास में किसी भी तरह की कोई रुकावट न आए।

पर जब हाल ही में, मैं ग्रामीण क्षेत्रों में किशोरियों के साथ उनके स्वास्थ्य और अधिकार के प्रति जागरूकता को लेकर सर्वे करने गई तो मैंने पाया कि गांव में अस्सी फ़ीसद किशोरियां अपने स्वास्थ्य और अधिकार को लेकर बिल्कुल भी जागरूक नहीं हैं। उन्हें अपने मौलिक अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं है। उल्लेखनीय है कि इनमें से कई लड़कियां कॉलेज में ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही थी और संयोगवश कई लड़कियों के ग्रेजुएशन का एक विषय राजनीतिक विज्ञान भी था। क़रीब तीस फ़ीसद किशोरियां ऐसी थी जिन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि लड़के और लड़कियों के अधिकार समान हैं। वे अपने भविष्य को अपने मां-बाप के फैसले पर छोड़ देती हैं। कुछ का तो कहना है कि जो मां-बाप कहेंगे वे वही करेंगी। अपने इच्छा से वे कुछ नहीं कर सकती, फिर सवाल चाहे उनकी शिक्षा का हो या उनकी शादी का। मैं आपको बता दूं कि मैंने यह सर्वे विकास की दौड़ में भागते प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस से क़रीब पच्चीस किलोमीटर की दूरी में बसे पांच गांव की दलित और पिछड़ी जाति की बस्तियों में किया है।

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सर्वे के दौरान अधिकारों के प्रति जागरूकता के संदर्भ में जब मैंने किशोरियों से बात की तो उनमें अपने परिवार का साथ छूटने और ख़ुद को लेकर न के बराबर आत्मविश्वास को महसूस किया। अधिकतर किशोरियों का कहना था, “अपनी ज़िंदगी से जुड़ा कोई भी निर्णय अगर हम लोगों ने अपनी इच्छा के अनुसार लिया तो परिवार वाले हम लोगों का साथ नहीं देंगें और हम लोग अकेले कुछ नहीं कर पाएंगें।” लड़कियों में आत्मविश्वास की कमी का जितना उनका सामाजिक परिवेश ज़िम्मेदार है उतनी ही गांव की शिक्षा व्यवस्था भी है। वह शिक्षा व्यवस्था जिन पर सरकारें अथाह पैसे ख़र्च करती हैं, जिससे छात्राओं की पंजीकरण संख्या तो बढ़ती है लेकिन पंजीकरण के साथ-साथ उनकी सीख और सरोकार का कोई मूल्यांकन नहीं किया जाता है। यही वजह है कि घर से लेकर स्कूल-कॉलेज तक लड़कियों के प्रति उदासीन रवैया उनके आत्मविश्वास को पनपने से पहले ही ख़त्म कर देता है।

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किशोरियों से उनके पीरियड से जुड़े सवाल करती तो अक्सर ज़वाब में मुझे उनकी ‘चुप्पी’ ही मिलती।

वहीं दूसरे तरफ़ क़रीब नब्बे फ़ीसद किशोरियां ऐसी थी जिन्हें प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े माहवारी और परिवार नियोजन जैसे विषयों पर बेहद सीमित जानकारी थी। जब मैं गांव में किशोरियों से उनके पीरियड से जुड़े सवाल करती तो अक्सर ज़वाब में मुझे उनकी ‘चुप्पी’ ही मिलती और कुछ लड़कियां ज़वाब देती कि इस उम्र में हर लड़की का ‘महीना’ आता है इसलिए हमलोगों का भी महीना आता है। लेकिन ये आता क्यों है? इसका हमारे शरीर से इसका क्या ताल्लुक़ है, इन सबके बारे में उन्हें ज़रा भी जानकारी नहीं है।

माहवारी महिला स्वास्थ्य से जुड़ा एक अहम हिस्सा है। लेकिन इसको लेकर किशोरियों में जानकारी का अभाव चिंता का विषय है। हमारे घर-गांव में महिला के स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को इस तरह शर्म से जोड़ दिया जाता है कि इसपर बात तो क्या महिलाएं इन विषयों पर सोचने से भी खुद को शर्मिंदा महसूस करती हैं। वहीं, दूसरी तरह हम लगातार गांव में महिलाओं और किशोरियों में सफ़ेद पानी की समस्या और बच्चेदानी में कैंसर की समस्याओं को बढ़ते हुए देख रहे है। एक तरफ़ सैनेटरी पैड और माहवारी के मुद्दों पर फ़िल्म बन रही है, वहीं दूसरी तरफ़ गांव में अभी भी यह शर्म का विषय है।

मैंने अपने इस सर्वे के दौरान ये महसूस किया कि किशोरियों का अपने अधिकारों और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक न होना, सीधे तौर पर उनके आत्मविश्वास को प्रभावित करता है क्योंकि न्यूनतम शिक्षा-स्तर के बाद अपने स्वास्थ्य और अधिकारों के प्रति कोई जानकारी न होना उन्हें हमेशा कमजोर महसूस करवाता है। इसलिए हम जब भी महिला सशक्तिकरण या नेतृत्व की बात करते हैं तो हमें इसकी शुरुआत उनके आर्थिक स्वावलंबन से नहीं बल्कि उनके अधिकार और स्वास्थ्य के प्रति उन्हें जागरूक करके करनी चाहिए, जिससे वे किसी भी मायने में खुद को कमजोर न समझे, क्योंकि जब वे खुद अपने अधिकार और शरीर के बारे में जागरूक नहीं होती है तो अपने से जुड़ी किसी भी बात के लिए सहज नहीं हो पाती है। इसके साथ ही ज़रूरी है कि सरकार और संस्थाओं की योजनाओं को योजनाबद्ध तरीक़े से सरोकार से जोड़ने का प्रयास किया जाए।  

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तस्वीर साभार : nytimes

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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