इंटरसेक्शनलजेंडर सीरियल बैरिस्टर बाबू की बौन्दिता को देखकर मज़बूत हो रही लैंगिक भेदभाव की जड़ें

सीरियल बैरिस्टर बाबू की बौन्दिता को देखकर मज़बूत हो रही लैंगिक भेदभाव की जड़ें

बौन्दिता का किरदार बच्चियों को किताबों से दूर समाज के बनाए जेंडर के साँचे में ढलने और उसमें रहने को प्रेरित करता है।

‘अच्छी लड़कियां हमेशा अपने पति की बात मानती हैं।’

‘अच्छी लड़कियों को घूंघट में रहना चाहिए।’

ये बातें गांव में किशोरियों के साथ बातचीत करते हुए कुछ छोटी बच्चियों ने अच्छी औरत और बुरी औरत पर अपने विचार रखते हुए कहा। मात्र नौ-दस साल की बच्चियों के मुंह से ऐसी बातें सुनना बेहद अजीब था, क्योंकि ये बच्चियां जिस परिवेश से आती है वह आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। यहां ज़्यादातर आदमी-औरत दोनों ही मज़दूरी का काम करते हैं। शायद इसलिए महिलाएं अन्य संभ्रांत परिवारों की महिलाओं की अपेक्षा में ज़्यादा स्वतंत्र है। वे घूंघट नहीं लेती है और न ही अपने पति की हर बात मानती है। कम ही सही लेकिन खुद पैसे कमाती हैं, इसलिए सभी नहीं लेकिन कुछ फ़ैसले ज़रूर खुद लेती हैं। अब ऐसे परिवार की बच्चियों का अच्छी औरत के नाम पर घूंघट करने और पति की बात मानने की बात करना अजीब था। जब मैंने उनसे पूछा कि ये सब तुम्हें किसने बोला? तो ज़वाब में बच्चियों ने कहा टीवी पर आता है। बौन्दिता ऐसे ही करती है।

ये बौन्दिता टीवी पर आने वाले सीरियल बैरिस्टर बाबू की नायिका है। सीरियल में बौन्दिता का किरदार एक आठ-नौ साल की बच्ची ने निभाया है। बैरिस्टर बाबू की कहानी आज से सौ साल पहले की है। कहने को तो सीरियल से जुड़े लोग इंटरव्यू में कहते हैं कि ‘ये सीरियल उस समय के समाजिक ढांचे की तरफ ध्यान दिलाता है। सामाजिक समस्याओं का समाधान सिर्फ तर्क से है इसीलिए शो की टैगलाइन भी ‘तर्क से फर्क’ रखी गई है और बौन्दिता जो कि एक बच्ची है, अपने तर्कों, सवालों और जिज्ञासा से सामाजिक खामियों को तार-तार करती है। बैरिस्टर बाबू की लड़ाई सामाजिक सोच से है।’ साथ ही यह भी कहा गया कि सीरियल रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ने की कहानी है।

तस्वीर साभार: bestmediainfo

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बौन्दिता का किरदार बच्चियों को किताबों से दूर समाज के बनाए जेंडर के साँचे में ढलने और उसमें रहने को प्रेरित करता है।

लेकिन अब सोचने वाली बात ये है कि इस सीरियल को दिखाने का विचार आमलोगों तक ख़ासकर बच्चियों तक कैसे पहुंच रहा है? क्योंकि बच्चों को तो समाज क्या है इसका मतलब भी नहीं पता। समाज में बचपन से ही लड़की को लड़की की तरह रहने का पाठ पढ़ाया जाता है। हर पल डांट-मार और उपदेश देकर उनके लड़की के खांचे में ढालने की कोशिश की जाती है। ऐसे में बैरिस्टर बाबू सीरियल में बौन्दिता जैसे किरदार बच्चियों को घुट्टी की तरह दी जाने वाली सीख को और मज़बूत कर देते है। लैंगिक भेदभाव की जड़ें मज़बूती से बच्चियों के मन में पैठ जमा लेती हैं और उन्हें लगता है सारी डांट-मार और बंदिशें उन्हें अच्छा बनाने के लिए है। बौन्दिता क्या कह रही है, क्या कर रही है, ये सब समझना गांव की छोटी बच्चियों के लिए बेहद मुश्किल है, क्योंकि उन्हें शहरी बच्चों की तरह अच्छे क्या स्कूल भी नसीब नहीं है और न वैचारिक स्तर पर घर में भी कोई मज़बूत है। ऐसे में बौन्दिता के कपड़े, उसके माथे की बिंदी, चूड़ी, सिर का पल्लू और पति के नाम पर प्यार-सम्मान दिखाने का तरीक़ा उन्हें अलग ही दुनिया में ले जाता है।

कोरोना के दौर में स्कूल बंद है। गांव में बच्चों की पढ़ाई और दस साल पीछे जा रही है। छोटे बच्चे जिन्हें संज्ञा-सर्वनाम पढ़ना था वो क-ख भी नहीं पढ़ पा रहे है। पर घर में टीवी देखकर वो अब टीवी कलाकारों की कहानियों को जीने ज़रूर लगे हैं।

हो सकता है कि बहुत लोग मेरी बात से सहमत न हो और इसके लिए वे ऐसे टीवी सीरियल की खूबी बताएं। पर ऐसे लोगों से मैं यही कहूंगी कि सीरियल में कही जाने वाली बातें हम और आप समझ सकते है लेकिन छोटी बच्चियों को ये समझाना मुश्किल है। वे जो अपने सामने घटित होता देखती हैं वही समझती हैं, उसे ही सच्चाई मान लेती हैं। इसलिए ऐसे सीरियल और किरदारों पर रोक लगनी चाहिए क्योंकि आज के ज़माने में यह दिखाना कि हर बौन्दिता को बैरिस्टर बाबू मिले इसकी संभावना न के बराबर है। सभी बच्चियां बौन्दिता जैसी समझदार हो ये ज़्यादा ही अपेक्षा है। पर ये तय है कि बौन्दिता का किरदार बच्चियों को किताबों से दूर समाज के बनाए जेंडर के सांचे में ढलने और उसमें रहने को प्रेरित करता है। इसलिए हमें और आपको भी इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी कि घर में बच्चे ऐसे सीरियल से बचे, क्योंकि इनसे बचना ही बच्चों के बचपन को बचाएगा।  

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तस्वीर साभार : tellyreviews

About the author(s)

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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