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11 अक्टूबर को ‘कमिंग आउट डे’ मनाया जाता है। ‘कमिंग आउट’ का मतलब है एलजीबीटीक्यू समुदाय के व्यक्तियों का बाहर की दुनिया के सामने अपनी लैंगिकता या लैंगिक पहचान का खुलासा करना। ‘कम आउट’ करना एक एलजीबीटीक्यू इंसान के जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि यही वो पल है जब ज़िंदगीभर अपना परिचय, अपना अस्तित्व छुपाए रखने के बाद हम दुनिया के सामने आकर यह बोलने की हिम्मत जुटा पाते हैं कि, “हां, मैं एलजीबीटीक्यू हूं और हम सम्मान और बराबर अधिकार की उम्मीद करते हैं।” इस दिन कई एलजीबीटीक्यू लोग दुनिया को अपनी पहचान बताते हैं या वह दिन याद करते हैं जब उनका यह राज़-राज़ नहीं रहा था। 

‘कमिंग आउट’ आसान नहीं है और ऐसा करते हुए हम कई जोखिम उठाते हैं। आज भी कई देशों में एलजीबीटीक्यू होना गैरकानूनी है या कानूनन वैधता मिलने के बावजूद समाज को यह स्वीकार नहीं है। हर रोज़ एलजीबीटीक्यू व्यक्तियों पर जानलेवा हमले होते हैं, घर या नौकरी से निकाल दिया जाता है, उनका शोषण किया जाता है और मौलिक अधिकारों से वंचित किया जाता है। इन हालातों में अपनी पहचान दुनिया को बताना खतरे से खेलने से कम नहीं है। 

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इतना बड़ा और मुश्किल कदम उठाने के लिए आसपास के लोगों का साथ चाहिए होता है। उनकी सहानुभूति चाहिए होती है। हमारे ‘होमोफोबिक’ समाज और प्रशासन से यह सहानुभूति तो मिलने से रही, पर कई प्रगतिशील स्ट्रेट व्यक्ति जो खुद को एलजीबीटीक्यू के ‘साथी’ कहते हैं, वे भी कई पूर्वाग्रहों से ग्रसित होते हैं और एक कम आउट करनेवाले व्यक्ति के प्रति उनकी प्रतिक्रिया उस व्यक्ति को असहज या मानसिक तौर पर विचलित महसूस करवा सकती है। 

अगर आप एक हेटरोसेक्शुअल व्यक्ति हैं जो अपने एलजीबीटीक्यू दोस्तों, परिवारवालों या सहकर्मियों का साथ देना चाहता है, आपका लक्ष्य यह होना चाहिए कि वे आप पर भरोसा कर पाएं और आप उन्हें भावनात्मक सहारा दे पाएं। इसके लिए अपने शब्द ध्यान से चुनने की बहुत ज़रूरत है ताकि आप जिन्हें समर्थन दे रहे हैं उनकी भावनाएं आहत न हों। यहां पर हम कुछ चीज़ों की बात करेंगे जो एक ‘कमिंग आउट’ एलजीबीटीक्यू व्यक्ति को बिल्कुल नहीं बोली जानी चाहिएं। ये हैं: 

1. “ओह, तुम तो एलजीबीटीक्यू लगते ही नहीं हो!”

यह कहने का कोई मतलब ही नहीं होता। एलजीबीटीक्यू कोई भी हो सकता है और ऐसा ज़रूरी नहीं है कि उसे देखकर पता चले कि वो एलजीबीटीक्यू है। गैर-एलजीबीटीक्यू लोगों के मन में यह धारणा बना दी गई है कि सभी एलजीबीटीक्यू लोगों के चलने, बोलने और पहनावे का एक ही तरीका होता है जो कि बिल्कुल गलत है। एलजीबीटीक्यू एक विविध समाज है और इस परिचय का हर इंसान अपने में अलग और अनोखा है।  इस पूरे समुदाय के बारे में मन में एक विशेष छवि बना लेना ठीक नहीं है। यह ध्यान में रखना बहुत ज़रूरी है कि एलजीबीटीक्यू कोई भी हो सकता है और किसी को देखकर बताया नहीं जा सकता कि वो है या नहीं। 

2. “तुम सेक्स कैसे करते हो?”, “तुम शादी किससे करोगे?”, “तुम्हारे बच्चे कैसे होंगे?”

सबसे पहली बात तो यह है कि इस तरह के सवाल व्यक्तिगत प्रकृति के हैं। दूसरों की सेक्स लाइफ, उनके प्रेम या पारिवारिक जीवन से आपको कोई मतलब नहीं होना चाहिए, खासकर अगर वे आपके सहकर्मी हो। दूसरी बात यह है कि ऐसे सवाल आप किसी हेटरोसेक्शुअल से तो नहीं करेंगे। आप किसी हेटरोसेक्शुअल विवाहित दंपति से उनकी सेक्स लाइफ के बारे में तो नहीं पूछते होंगे। उम्मीद है कि आप एलजीबीटीक्यू व्यक्तियों से भी इसी शालीनता से पेश आएं। कई एलजीबीटीक्यू लोग अपने शरीर को लेकर असहजता महसूस करते हैं और इस तरह के सवाल उन्हें मानसिक पीड़ा पहुंचा सकते हैं, इसलिए अपने शब्दों को सावधानी से चुनना और ज़रूरी हो जाता है। 

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3. “तुम ऑपरेशन कब करवा रहे हो?” या “तुम ऑपरेशन के बाद अच्छे दिखोगे”

एक ट्रांस व्यक्ति सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी कब करवाएंगे या करवाना चाहते भी हैं या नहीं यह उनका खुद का निर्णय है। क्योंकि यह उनके शरीर से संबंधित है, यह एक बहुत ही व्यक्तिगत मामला है और आपको इस बात पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं कि वे अपने शरीर के साथ क्या करते हैं। आपको यह मांग करने का भी कोई अधिकार नहीं कि वे आपके द्वारा तय किए गए सुंदरता के पैमानों के मुताबिक अपने शरीर का ऑपरेशन करवाएं। 

4. “तुम बाईसेक्शुअल हो? क्या तुम ग्रुप सेक्स करना चाहोगी?” या “एक बार किसी मर्द के साथ रहकर तो देखो” जैसी अश्लील प्रस्तावनाएं

हेटरोसेक्शुअल पुरुष अक्सर लेस्बियन और बाईसेक्शुअल महिलाओं से इस तरह के प्रस्ताव करते हैं। उनके अनुसार हर बाईसेक्शुअल औरत हर वक़्त ग्रुप सेक्स के लिए तैयार रहती है और औरतें लेस्बियन सिर्फ़ किसी मर्द के अभाव के कारण ही होती हैं। यह धारणाएं ग़लत हैं और किसी महिला से इस तरह की बातें करना यौन उत्पीड़न के दर्जे में आता है। दूसरों का सम्मान करना सीखें और इस तरह की अश्लीलता से उन्हें शर्मिंदा या असहज महसूस न कराएं।

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5. ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से उनका ‘असली नाम’ पूछना, उन्हें ‘मिसजेंडर’ करना इत्यादि

एक ट्रांस व्यक्ति को उनके जन्म के समय जो नाम दिया गया था, वे उसका प्रयोग नहीं करते। बल्कि वे अपने लिए ऐसा नाम चुनते हैं जो उनके लैंगिक परिचय से मिलता-जुलता हो। उनके जन्म पर दिया गया नाम ‘डेडनेम’ कहलाता है क्योंकि उन्होंने उस नाम को नकार दिया है और वे उस नाम और परिचय से ताल्लुक नहीं रखना चाहते। ऐसे में उनसे उनका डेडनेम पूछना सरासर नाइंसाफ़ी है क्योंकि वे उस नाम को भुला देना चाहते हैं। उनका ‘असली नाम’ वही नाम है जो उन्होंने अपने लिए चुना है और आपको बताया है। उनके डेडनेम को उनका असली नाम कहना यह दिखाता है कि आप उनके ट्रांस परिचय को स्वीकार नहीं करते। 

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‘मिसजेंडर’ करने का मतलब है एक ट्रांस व्यक्ति को उस लैंगिक परिचय से जोड़ना जो उन्होंने नकार दिया है। अगर कोई ट्रांस व्यक्ति खुद को महिला बताते हैं पर उनके शरीर के आधार पर आप उन्हें पुरुष कहते हैं और बात करते वक़्त उनके लिए पुल्लिंग सर्वनामों और संज्ञाओं का प्रयोग करते हैं तो यह बेहद अपमानजनक और निंदनीय है और आपको यह नहीं करना चाहिए। 

एक कमिंग आउट इंसान के लिए एक सुरक्षित माहौल बनाना आपकी ज़िम्मेदारी है ताकि वे बिना किसी डर और असहजता से अपनी ज़िंदगी जी सकें। एक सच्चे साथी की तरह एक सरल और सम्मानपूर्वक जीवन जीने में उनकी मदद कीजिए ताकि और एलजीबीटीक्यू व्यक्ति कम आउट करने की हिम्मत कर पाएं और सर उठाकर जी पाएं।

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तस्वीर साभार : Deccan Herald

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