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हर्ष उरमलिया

‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ के भेद को स्पष्ट करने में नारीवाद का एक महत्वपूर्ण योगदान है। सेक्स शब्द, पुरुष और स्त्री के बीच एक जैविक अर्थ की तरफ इशारा करता है जबकि जेंडर का ताल्लुक उसके साथ गुंथे हुए सांस्कृतिक अर्थों से है जिसकी परिभाषा और भूमिका समाज ने तय की है। नारीवादी विमर्श में इस फर्क को स्पष्ट करना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव को स्त्री-पुरुष के बीच जैविक फर्क के आधार पर ही सही ठहराया जाता है। ऐसे कई दार्शनिक तर्क भी मौजूद हैं, जो तमाम तरह के उत्पीड़नों को प्राकृतिक कहकर जायज़ ठहराते हैं । इस तर्क के अनुसार जो प्राकृितिक है उसे बदला नहीं जा सकता वह जायज़ भी है । ऐसे तर्क को जैविक निर्धारणवाद भी (biological determinism) कहा जाता है ।

जाति व्यवस्था और नस्लवाद इसी प्रवृत्ति के दो उदाहरण हैं क्योंकि दोनों विचारधाराएं इसी मान्यता पर आधारित हैं कि व्यक्तियों के कुछ समूह पैदाइशी तौर पर दूसरे समूहों के मुकाबले श्रेष्ठ है। साथ ही उनकी बौद्धिक क्षमता और निपुणताएं बाकी लोगों से अधिक विकसित हैं। इसलिए समाज में उनकी सत्ता जायज़ है। जैविक निर्धारणवाद ही महिला उत्पीड़न को भी सदियों से वैधता देता रहा है। जैविक निर्धारणवाद, इस विचार को संदर्भित करता है कि सभी मानव व्यवहार जन्मजात, जीन, मस्तिष्क के आकार या दूसरी जैविक विशेषताओं के ज़रिए निर्धारित होते हैं। जैविक निर्धारणवाद स्वतंत्र इच्छा (फ़्री विल) को नकारता है और यह कहता है कि व्यक्तियों का उनके व्यवहार पर कोई आंतरिक नियंत्रण नहीं है। यह व्यवहार को प्रभावित करने में सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण की भूमिका को पूरी तरह से अस्वीकार करता है। जैविक निर्धारणवाद इस विचार को दर्शाता है कि पुरुष स्वाभाविक रूप से मज़बूत और तर्कपूर्ण होते हैं और महिलाओं की तुलना में अधिक काबिल होते हैं। जैविक निर्धारणवाद के तहत एक व्यक्ति या तो पुरुष या महिला के रूप में पैदा होता है वो भी मर्दाना और स्त्री विशेषताओं के साथ। इसलिए जैविक निर्धारणवाद को चुनौती देना नारीवाद के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जैविक निर्धारणवाद के तर्कों के खंडन से पहले हमें उन विचारकों, दार्शनिकों को जान लेना चाहिए, जिन्होंने अपने समय के समाज को प्रभावित किया और जैविक निर्धारणवाद को जायज़ ठहराया।

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अरस्तू : इन्होंने पुरुष सिद्धांत को सक्रिय और महिला को निष्क्रिय कहा। इनके लिए महिला ‘विकृत पुरुष’ है, जिसके पास आत्मा नहीं है। इनके विचार में स्त्री की जैविक हीनता ,उसकी क्षमताओं ,तर्क करने की क्षमता और इसलिए निर्णय लेने की क्षमता में भी उसे हीन बना देती है। इनका मानना है , चूंकि मर्द औरतों से श्रेष्ठ हैं, इसलिए पुरुष शासन करने के लिए और औरतें उनके शासन को मानने के लिए पैदा हुई हैं। अरस्तू ने कहा है,”किसी मर्द का साहस, महिला द्वारा उसकी आज्ञा का पालन करने में दिखाई देता है।”

फ्रायड : फ्रायड ने महिलाओं के लिए कहा कि उनकी शारीरिक रचना नियति है (Anatomy is Destiny)। फ्रायड के लिए सामान्य मनुष्य पुरुष था और महिलाएं एक विकृत मनुष्य थी, जिसमें पेनिस की कमी थी और इन्होंने कहा कि औरत का पूरा मनोविज्ञान इस अवहेलना की भरपाई के आसपास केंद्रित है।

डार्विन : महिलाएं मानसिक रूप से पुरुषों से अलग होती हैं। सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि महिलाओं में सहज बोध, किसी बात को लेकर जल्दी से प्रतिक्रिया देने की प्रवृति,नकल की प्रवृति पुरुषों की तुलना में अधिक दृढ़ता से चिन्हित होती है ऐसी विशेषताएं नीची जातियों में पाई जाती है, इसलिए यह निम्नतर सभ्यता की निशानी है।

अरस्तू, फ्रायड और डार्विन तीनों के विचार स्त्री विरोधी और तर्कहीन नज़र आते हैं। दरअसल इन तीनों ने अपने विचार पुरुष होने के नज़रिए से रखे हैं, इसलिए इनके लिए स्त्री अधूरी और विकृत है। महिलाओं और पुरुषों के बीच जैविक भेद से उनकी भूमिकाएं या काम तय नहीं किए जा सकते। ये भूमिकाएं केवल जेंडर पर आधारित नहीं हो सकती हैं। हमें विज्ञान का यह आधारभूत नियम याद रखना चाहिए कि चर को स्थिरांक द्वारा नहीं समझाया जा सकता है।

महिलाएं, पुरुषों से कमजोर नहीं हैं, बल्कि यह लैंगिक असमानता ऐसे सामाजिक – सांस्कृतिक मूल्यों, विचारधाराओं और संस्थाओं की देन है, जो महिलाओं की वैचारिक तथा भौतिक अधीनता को सुनिश्चित करती हैं।

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न तो सेक्स, जेंडर और न ही प्रकृति हमारे समाज में मौजूद असमानताओं के लिए जिम्मेदार है। जातियों, वर्गों और नस्लों के बीच असमानताओं की तरह लैंगिक असमानता भी मानव निर्मित हैं।  इसलिए इस पर सवाल उठाए जाने चाहिए, इसे चुनौती दी जानी चाहिए और बदला जाना चाहिए।  एक महिला बच्चे पैदा कर सकती है लेकिन यह उसकी हीनता और अधीनता का कोई कारण नहीं होना चाहिए। न ही यह उसकी शिक्षा, प्रशिक्षण या नौकरी के अवसरों को इससे निर्धारित किया जाना चाहिए। महिलाओं को समान अधिकार और अवसर प्राप्त करने के लिए पुरूषों की तरह होने की आवश्यकता नहीं है। 

मारिया मिज़, एक नारीवादी कार्यकर्ता और विद्वान हैं। वह अपनी पुस्तक ‘द सोशल ओरिजिन्स ऑफ द सेक्शुअल डिवीजन ऑफ़ लेबर‘ में लिखती हैं, “मेल-नेस और फीमेल-नेस बायोलॉजिकल नहीं हैं, बल्कि एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम हैं। हर युग में मेलनेस और फीमेलनेस को अलग – अलग तरीके से परिभाषित किया गया, जो कि उन युगों में उत्पादन के प्रमुख आधारों पर निर्भर करता है। वहीं, नारीवादी लेखिका सिमोन की एक प्रसिद्ध पंक्ति है,”स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।” यहां सिमोन यही कहना चाह रही हैं कि एक औरत को यह समाज ‘औरत’ बनाता है। यह समाजीकरण या लिंग निर्धारण की प्रक्रिया के माध्यम से होता है, जो कि परिवारों और समाज के भीतर चल रही एक प्रक्रिया है।  

हम सब जानते हैं कि एक नवजात बच्चे के सेक्स को पैदा होते के साथ ही वर्गीकृत कर दिया जाता है, साथ ही उसे एक जेंडर भी सौंपा जाता है। हमने देखा है कि कैसे कुछ संस्कृतियों में , एक नए जन्मे बच्चे के स्वागत का तरीका भी अलग है। लैंगिक भेदभाव घर से ही शुरू होता है। कैसे एक बच्चे को संबोधित किया जाता है, कैसा व्यवहार उनके साथ किया जाता है, उनकी देखभाल कैसे की जाती है और कैसे कपड़े पहनाए जाते हैं। इन्हीं माध्यमों से सिखाया जाता है कि उन्हें किस तरह से समाज का हिस्सा बनना चाहिए। इसे समाजीकरण कहते हैं। समाजीकरण की प्रक्रिया जो बच्चों को उनकी जेंडर भूमिकाएं सिखाती है, उन्हें जेंडर निर्धारण या जेंडर निर्विवादीकरण भी कहा जाता है।  अलग-अलग सामाजिक प्रक्रियाएं बच्चों के व्यक्तित्व की मर्दानगी और स्त्रीत्व सिखाते हैं और उनके व्यवहार, दृष्टिकोण और भूमिका में अंदर तक भर दी जाती हैं।  

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रूथ हार्टले के अनुसार, समाजीकरण चार प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है, मैनीपुलेशन-हेर फेर करके उन्हें ढालना, कैनलाइजेशन-एक विशेष दिशा में ट्रेन करना, वर्बल अपीलेशन-मौखिक अपील और एक्टिविटी एक्सपोज़र-गतिविधि जोखिम। 

मैनिपुलेशन या मोल्डिंग का मतलब है कि आप बच्चे को कैसे संभालते हैं।  यह पता चलता है कि लड़कों को शुरुआत से ही मजबूत, स्वायत्त प्राणियों के रूप में ही बड़ा किया जाता है। दूसरी प्रक्रिया, कैनलाइजेशन में , मेल और फीमेल बच्चों का ध्यान, चीज़ों के पहलुओं पर केंद्रित करना शामिल है। मसलन लड़कियों को गुड़िया या बर्तन दिया जाता है और लड़कों को बंदूक, कार जैसे खिलौनों से खेलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। दक्षिण एशिया में कामकाजी घरों में तो लड़कियां बर्तन के साथ भी नहीं खेलती हैं, उन्हें असली बर्तन के इस्तेमाल और घरों की सफाई शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और छोटे बच्चों की देखभाल करना सिखाया जाता है।  वहीं लड़कों को स्कूल भेजा जाता है या घर से बाहर काम करने के लिए तैयार किया जाता है। ऐसे लैंगिक भेदभाव के ज़रिए लड़कियों और लड़कों के हितों को अलग-अलग तरीके से बदल दिया जाता है और उनमें अलग-अलग क्षमताओं, दृष्टिकोणों, आकांक्षाओं और सपनों का विकास होता है।  

वर्बल अपीलेशन- लड़के और लड़कियों के लिए वर्बल अपीलेशन भी अलग हैं।  उदाहरण के लिए, हम अक्सर लड़कियों को कहते हैं, “ओह, तुम कितनी सुंदर और प्यारी लग रही हो” और एक लड़के को कहते हैं”, तुम डैशिंग और हैंडसम दिख रहे हो” अध्ययन से पता चलता है कि इस तरह की टिप्पणी लड़कियों और लड़कों, पुरुषों और महिलाओं की खुद की पहचान का निर्माण करती हैं। बच्चे खुद को पुरुष या महिला के रूप में सोचना सीखते हैं और इसी तरह से अन्य पुरुषों या महिलाओं की पहचान करते हैं। परिवार के सदस्य लगातार लैंगिक भूमिका के पहलुओं को सीधे, बचपन से ही सामान्य बात करते वक्त भी इसे प्रसारित करते हैं।

आखिरी प्रक्रिया एक्टिविटी एक्सपोजर की है। मेल और फीमेल दोनों बच्चों को बचपन से ही समाज के तय पारंपरिक मर्दाना और स्त्री गतिविधियों से अवगत कराया जाता है। लड़कियों को घर के कामों में अपनी मां की मदद करने के लिए कहा जाता है, लड़कों को अपने पिता के साथ बाहर जाने के लिए। इस तरह दोनों बहुत अलग-अलग गतिविधियों में शामिल होते हैं। इन प्रक्रियाओं के माध्यम से बच्चे मर्दाना और स्त्री के बीच होने वाले लैंगिक भेदभाव को महसूस करते हैं, सीखते हैं और उन्हें लगभग अनजाने में इंटरनलाइज भी करते हैं।

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इसके अलावा हमारा समाज पुरुष की विशिष्टताओं को नारीत्व की तुलना में कहीं अधिक सम्मान देता है और इसके साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करता है कि जो स्त्री- पुरुष पहले से तय इन मानकों पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते हैं ,उन्हें ‘उचित ‘ व्यवहार के सांचे में ढालने की प्रक्रिया चलती रहे। मिसाल के तौर पर अगर कोई पुरुष लोगों के सामने रोकर अपना दुख व्यक्त करता है तो उसे ताने दिए जाते हैं कि ‘औरतों की तरह रो रहे हो’, और जब कोई पुरूष समाज के तथाकथित खांचे में नहीं फिट हो पाता समाज उनसे कहता है “चूड़ियां पहन लो।” भला सुभद्रा कुमारी चौहान की वो पंक्तियां किसे याद नहीं होंगी, “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी” इसका क्या अर्थ निकलता है? एक औरत शौर्य और वीरता का प्रदर्शन कर रही है लेकिन उसके लिए मर्दानी शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है। कुल मिलाकर बहादुरी का गुण पुरुषों की ही विशेषता मानी जाती है फिर भले ही कितनी भी औरतें बहादुरी का प्रदर्शन करती रहें और कितने ही पुरुष पीठ दिखा कर भाग खड़े होते रहें। 

इसलिए यह साफ है कि महिलाएं, पुरुषों से कमजोर नहीं हैं, बल्कि यह लैंगिक असमानता ऐसे सामाजिक – सांस्कृतिक मूल्यों, विचारधाराओं और संस्थाओं की देन है, जो महिलाओं की वैचारिक तथा भौतिक अधीनता को सुनिश्चित करती हैं। आज भी जब औरतों के मुद्दों को घरेलू, निजी और हल्का माना जाता है,ऐसे में एक नारीवादी होने के नाते, हमारा एजेंडा इन मुद्दों को ‘राजनीतिक’ दायरे में स्थापित करना है, जो यह बात करता है कि इन जेंडर संबंधी समस्याओं को बदला जा सकता है और बदला जाना चाहिए क्योंकि ये समाज द्वारा गढ़ी गई हैं।

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(यह लेख हर्ष उरमलिया ने लिखा है जो हिंदू कॉलेज में हिंदी साहित्य के छात्र हैं। आप उनसे फेसबुक और ट्विटर पर जुड़ सकते हैं।)


तस्वीर साभार : The Hindu

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