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बीते दिनों मैंने नई दिल्ली की क्रिया संस्था की तरफ़ से आयोजित ‘नारीवादी नेतृत्व’ पर केंद्रित ऑनलाइन प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। इसी प्रशिक्षण में ‘पितृसत्ता’ के मुद्दे पर मेरी समझ बनी। स्वयंसेवी संस्था में काम करते हुए मैंने कई बार इस शब्द को सुना था, लेकिन इसके मायने मेरी समझ से परे थे। लेकिन जब इस शब्द के इतिहास, राजनीति और भूगोल का समीकरण समझ आया तो अपने घर और समाज में महिलाओं की स्थिति और उस स्थिति के निर्माण की प्रक्रिया साफ़ दिखाई देने लगी। मैं हमेशा से सोचती थी लड़कियां बचपन से ही नाज़ुक होती हैं। वे कोई बहादुरी का काम नहीं कर सकती। वे पुरुषों से कमजोर होती हैं और ये सब प्राकृतिक है। लेकिन इस एक प्रशिक्षण के बाद से मैंने पितृसत्ता शब्द और इसके प्रभाव को और भी जानने-समझने की कोशिश तब समझ आया कि वास्तव में समाज में लड़कियों और लड़कों की भूमिका, उनका स्वभाव, कर्तव्य और अधिकार स्वाभाविक नहीं बल्कि सामाजिक हैं।

लड़की कैसे कपड़े पहनेगी, वह कौन से खेल खेलेगी, कैसा व्यवहार करेगी, ये सब समाज ने उसे सिखाया है। ठीक वैसे ही जैसे लड़के रोते नहीं हैं, वे मज़बूत होते हैं और मर्द औरतों को अपने क़ाबू में रखते हैं। लड़का और लड़की के बीच शारीरिक रूप से जैविक फ़र्क होता है, लेकिन उन फ़र्कों को समाज उनकी ज़िंदगी से जोड़कर उन्हें ‘मालिक’ और ‘नौकर’ की भूमिका में ला देता है और ये सब होता है पितृसत्ता के विचार से। जब मैं इस पितृसत्ता को अपने परिवार में देखती हूं, इसका प्रभाव महिला और पुरुष दोनों में एकसमान पाती हूं और ये सब पीढ़ियों से इतने सामान्य तरीक़े से चला आ रहा है कि इसमें किसी को कुछ भी ग़लत नहीं लगता। बस घर में पुरुष ‘अच्छा पुरुष’ और महिलाएं ‘अच्छी औरत’ बनने की होड़ में लगे रहते हैं।

बचपन से ही मेरी मां हम बहनों को खूब डांट लगाती थी। घर के किसी भी काम में वह हम बहनों की एक लापरवाही बर्दाश्त नहीं करती। इस पर आसपास के लोग और रिश्तेदार हमेशा यह कहते कि “देखो! कितनी अच्छी मां है। अपनी लड़कियों को हमेशा अनुशासन में रखती है।” मां हमेशा इस बात पर बेहद खुश होती है। आज जब मैं अलग-अलग गांवों में जाकर महिलाओं और किशोरियों से मिलती हूं तो अक्सर लड़कियों को अपनी मां की सख़्ती की शिकायत करते हुए और महिलाओं को इस बात पर गर्व करते हुए देखती हूं “दीदी! हमारे घर की लड़कियां एकदम नहीं बोलती। हमेशा घर में रहती हैं।”

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हमारे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के लिए बनाए गए नियमों को आगे की पीढ़ी में सौंपने के लिए ‘अच्छी मां’ सबसे अहम भूमिका अदा करती है। वह अच्छी मां जो अपने आपको भूलकर अपनी पूरी ज़िंदगी का त्याग इस तैयारी में करती है कि उसकी बेटियां भी उसकी तरह सहनशील बनें। किसी से सवाल न करें, अपने अधिकारों की बात न करें। रिश्तों को समझे और कुछ भी हो रिश्ते पर आंच न आने दें। इसलिए बचपन से ही उन्हें घर के अंदर खेलने वाले चूल्हा-चौका का खेल दिया जाता है। उनके लिए नीले और काले की बजाय लाल और गुलाबी रंग की चीज़ें लाई जाती हैं। उन्हें ऐसे कपड़े पहनाए जाते हैं जिसमें जेब न हो, जिससे वे अच्छे से अपने दिमाग़ में यह बैठा लें कि पैसा कमाना उनका काम नहीं। इन सबके साथ ही वे अपनी मां को भी वैसा ही करता देखती हैं। उनके पिता जब मां को डांटते या मारते है तो मां इस पर कोई जवाब नहीं देती। कोई कितना भी अपमान करें ‘रिश्ते’ के नाम पर वह उफ़्फ़ तक नहीं करती हैं। इस तरह लड़की अपने भविष्य में अपनी ‘मां’ की छवि देखती है और ख़ुद को भी उनकी तरह ढालने लग जाती है।

लड़की कैसे कपड़े पहनेगी, वह कौन से खेल खेलेगी, कैसा व्यवहार करेगी, ये सब समाज ने उसे सिखाया है। ठीक वैसे ही जैसे लड़के रोते नहीं है, वो मज़बूत होते है और मर्द औरतों को अपने क़ाबू में रखते हैं।

पितृसत्ता की सोच में ‘अच्छा’ बनने का मतलब हर रिश्ते से जुड़ा हुआ है और इसमें अच्छा बनने का मतलब है बिना किसी नियम-शर्त या बदलाव के पितृसत्ता की सोच को आगे बढ़ाना और इस सोच को अपने परिवार में सख़्ती से लागू करवाना। चूंकि पितृसत्ता ने महिलाओं के लिए घर की दहलीज़ के अंदर की उनका कार्यस्थल परिभाषित किया है, इसलिए इसकी दोहरी मार महिलाएं ही झेलती हैं। सास, बहू, मां, बहन, पत्नी और बेटी जैसे तमाम रिश्ते के व्यवहार और भूमिकाएं कब महिलाओं से उनके इंसान होने का हक़ छीन लेती हैं, पता ही नहीं चलता।

हम अक्सर चर्चाओं में ये सुनते है कि भारत के क़ानून में महिलाओं के लिए कई क़ानून बनाए गए हैं। सरकार की तरफ़ से उनके लिए कई योजनाएं हैं लेकिन फिर भी समाज में महिलाओं की स्थिति ख़राब है, क्योंकि ये सब ज़मीन से जुड़ ही नहीं पाता है। इसका मुख्य कारण है हमारे घर में महिलाओं की ये भूमिकाएं जो उन्हें रिश्ते और इज़्ज़त के नाम पर इस कदर बांधती हैं कि वे ये तक भूल जाती हैं कि वे किसी की मां, बहन, पत्नी और बेटी होने से पहले एक इंसान हैं जिनके अपने मौलिक अधिकार हैं। इसलिए वे खुद पर होने वाली तमाम हिंसाओं का सामना करते हुए भी उफ़ तक नहीं करती और सहने की प्रवृति को ‘अच्छी औरत’ की परिभाषा समझकर ख़ुद को सांत्वना देती हैं।

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अच्छी औरत के नाम पर पितृसत्ता ने अपने विशेषाधिकार और दंड के भी नियम बनाए हैं। जब महिलाएं पितृसत्ता के नियम का पालन करती हैं तो उन्हें अच्छी औरत कहकर उन्हें घर में अच्छा बताया है। कई बार संसाधनों जैसे घर के फ़ैसले और पैसों पर उन्हें सीमित अधिकार भी दिए जाते हैं, जिससे वे खुद को दूसरी महिलाओं से बेहतर समझने लगती हैं और बाक़ी महिलाएं भी उनकी तरह बनने की अपेक्षा करने लगती हैं। ये सब इतना सहज होता है कि सब सामान्य लगता है, लेकिन धीरे-धीरे ये महिलाओं में स्त्री-द्वेष को बढ़ावा देकर उनके एकजुट होने से रोकता है। उन्हें खुद के बारे में सोचने-समझने से रोकता है। नतीजा महिलाएं इंसान नहीं बल्कि भूमिकाओं में बंधकर रह जाती हैं।

पितृसत्ता परिवार में महिलाओं के इंसान होने का हक़ छीनकर उन्हें भूमिकाओं में बांधने का काम करती है और एक समय के बाद यह इस कदर हावी होती है कि महिलाओं के बीच ही रिश्ते के नाम से उनकी भूमिकाओं और विशेषाधिकार के चलते उन्हें ‘मालिक’ और ‘दास’ जैसा व्यवहार करने और सहने को मजबूर करती हैं। हम अक्सर पितृसत्ता को एक शब्द समझने की भूल करते हैं, लेकिन जब हम इसके मतलब और प्रभाव को देखते है तो परिवार में हर भेदभाव और हिंसा में इसे अहम पाते हैं। पितृसत्ता एक विचारधारा है जिसे बदलने में वक़्त लगेगा, क्योंकि ये हमारी संस्कृति, घर, रिश्ते और राजनीति हर जगह फैला हुआ है। पर हमें कहीं न कहीं से शुरुआत करनी होगी, क्योंकि अगर हम चुप रहे तो ये भेदभाव और हिंसा का दौर कभी नहीं थमेगा। इसके लिए महिलाओं की एकता और लैंगिक समानता सबसे पहला और आसान कदम हो सकता है, जिसकी शुरुआत हमलोग अपने घर से कर सकते हैं।

हम इसे लड़का-लड़की में होने वाले लैंगिक भेदभाव को रोककर, परिवार में महिलाओं के बीच होने वाले स्त्री-द्वेष को ख़त्म करके खत्म करने की शुरुआत कर सकते हैं क्योंकि परिवार हर समाज की पहली ईकाई है इसलिए किसी भी बदलाव की शुरुआत हमें अपने घरों से करनी होगी। कई बार कुछ लोग बोलते हैं कि दुनिया को बदलना आसान है लेकिन घर को नहीं। शायद ऐसा इसलिए भी होता है कि हम अपने घर से बाक़ी जगहों की अपेक्षा ज़्यादा उम्मीद करते हैं और यहां अपनी पूरी ताक़त लगाने में ख़ुद को बंधा हुआ भी पाते हैं। महिला एकता भी अपने आप में पितृसत्ता को रोकने का प्रभावी ज़रिया है क्योंकि जब हम एकजुट होते हैं तो हमारी चेतना का भी विकास होता है। अब हमें इस चेतना का विकास करना ज़रूरी है, जिससे अब घर में महिलाएं इंसान बनकर रहें, किसी भूमिकाओं में ख़ुद के अस्तित्व को भूलाकर नहीं। 

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तस्वीर : सुश्रीता भट्टाचार्जी

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