दूसरी किस्त: लैंगिक समानता में यकीन करनेवाले पिता को उठाने चाहिए ये कदम
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सुजाता को शादी के खुछ महीनों बाद से ही घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। वह अपने तीन भाइयों की इकलौती बहन है, लेकिन उसके पिता ने बच्चों की परवरिश समाज के बताए जेंडर के नियम के मुताबिक ही की। बीए की पढ़ाई पूरी होने के तुरंत बाद उसकी शादी कर दी गई। सुजाता जब भी अपने मायके में अपने साथ होनेवाली घरेलू हिंसा के बारे में बात करती तो उसके पिता साफ़ कहते, “वह उसका परिवार है और जैसा भी है, उसको निभाना है। सुजाता खुद में सुधार करे।” शादी को पांच साल बीत गए, लेकिन हालात नहीं बदले। सुजाता अक्सर कहती है, “अगर मेरे पिता मेरा साथ देते तो मेरी ज़िंदगी में कभी यह नौबत नहीं आती जहां मुझे हर रोज़ हिंसा का सामना करना पड़े।”

पितृसत्ता ने घर की सारी ताकत पिता के हिस्से दी है, इसलिए हम माने या न माने पिता के दर्जे का समाज में अपना प्रभाव आज भी है। ऐसे में जब पिता खुद अपनी बेटियों पर हावी होते हैं, उनके साथ लैंगिक भेदभाव करते हैं तो फिर सभी को मौक़ा मिल ज़ाता है बेटियों की आवाज़ दबाने का। इसके चलते इन बेटियों की आधी से अधिक ऊर्जा सिर्फ़ संघर्ष में बीत जाती है। कई बार वे हार मान लेती हैं या बार इसे अपनी नियती समझ लेती हैं। जब हम लोग बदलाव की बात करते हैं, बेटियों के विकास और प्रोत्साहन की बात करते हैं तो शिक्षा और विकास के मौक़ों से पहले परिवार और ख़ासकर पिता का समर्थन सबसे ज़रूरी होता है, जो बेटियों को आत्मविश्वास देता है आगे बढ़ने का।  

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कई बार ये देखने को मिलता है की पिता नाज़ से अपनी बेटियों के कहते हैं, “वह मेरी बेटी नहीं बेटा है।” हमें इस बात से हमेशा बचना चाहिए, क्योंकि दुलार में कही जानेवाली यह बात अनजाने में यह जताती है कि ‘बेटा’ बेहतर होता है।

बदलते समय के साथ अब समय है खुद को भी बदलने का। बेटियों की परवरिश के तरीक़े को बदलने का। इसलिए अब इसलिए हमें भी बदलना होगा और अब पिता नहीं बल्कि लैंगिक बराबरी में यकीन करनेवाले पिता को प्रोत्साहित करना होगा। इस लेख की पहली किस्त में मैंने बात की थी दो बुनियादी बातों की जिसका एक पिता को हमेशा ध्यान रखना चाहिए। आज इस लेख की दूसरी किस्त में बात करते हैं, कुछ और ज़रूरी कदम की जो एक पिता को संवेदनशील पिता और बेटी को बढ़ावा देनेवाला पिता बनाते हैं।

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बेटी को बेटा नहीं, बेटी कहने की पहल

कई बार ये देखने को मिलता है की पिता नाज़ से अपनी बेटियों को कहते हैं, “वह मेरी बेटी नहीं बेटा है।” हमें इस बात से हमेशा बचना चाहिए, क्योंकि दुलार में कही जानेवाली यह बात अनजाने में यह जताती है कि ‘बेटा’ बेहतर होता है। जब हमें अपनी बेटी को बेहतर बताना होता है तो हमें ‘बेटा’ की उपमा का सहारा लेना पड़ता है। इससे जेंडर आधारित भेदभाव की वही धारणा अपने आप फिर से कायम होने लगती है कि लड़के लड़कियों से बेहतर होते हैं और उनके न होने पर बेटियों को बेटा बनना पड़ता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम बेटी को बेटी कहकर ही पुकारें।

पितृसत्तात्मक सोच पिता और बेटी के बीच एक दूरी को बनाने का काम करती है। इस सोच का नतीजा यह होता है कि एक समय के बाद बेटियों की पिता से दूरी बढ़ती चली जाती है।

आत्मसम्मान सबसे पहले

हमारे समाज में बचपन से ही बेटियों को उनके आत्मसम्मान के प्रति मज़बूत होने की बात को परवरिश में शामिल नहीं किया जाता है। इस वजह से जब भी महिलाएं, लड़कियां घरेलू हिंसा का सामना करती हैं तो हमेशा खुद में ही कमी तलाशने लग जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें कभी भी उनके आत्मसम्मान के लिए भरोसा नहीं दिलाया गया और न ही इसके लिए लड़ना सिखाया गया। इसलिए ज़रूरी है कि पिता बचपन से ही बेटियों को उनके आत्मसम्मान के प्रति जागरूक कर, उन्हें इसके लिए संघर्ष करना सिखाए। वह उन्हें बताए कि उनका आत्मसम्मान सबसे पहले है और अगर कभी भी वह आत्मसम्मान के लिए लड़ती हैं तो वह अपनी बेटी के साथ हैं। यह बात बेटियों में आत्मविश्वास को बढ़ावा देती है। इससे वे न केवल अपने आत्मसम्मान बल्कि अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक होती हैं।

और पढ़ें: पहली किस्त: क्या बेटियों के लिए उनके ‘पिता का घर’ सबसे महफूज़ होता है?

विश्वास और स्वस्थ संवाद का आजीवन रिश्ता

बेटियां जब छोटी होती है तो कहते हैं कि वे अपने पिता के काफ़ी क़रीब होती हैं, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़ी होती हैं उनके और पिता के बीच में दूरी आने लगती हैं। इसका कहीं न कहीं संबंध पितृसत्ता से जुड़ा हुआ होता है। पितृसत्तात्मक सोच पिता और बेटी के बीच एक दूरी को बनाने का काम करती है। इस सोच का नतीजा यह होता है कि एक समय के बाद बेटियों की पिता से दूरी बढ़ती चली जाती है। ख़ासकर उस समय में जब उन्हें बेहतर सलाहकार की ज़रूरत होती है। इसलिए ज़रूरी है कि पिता अपनी बेटी के साथ हमेशा बातचीत का स्वस्थ रिश्ता क़ायम रखें और उन्हें यह एहसास दिलाएं कि वे उन पर पूरा भरोसा करते हैं। ऐसा करना पिता और बेटी के रिश्ते को तो मज़बूत करता ही है बल्कि ये बेटियों को एक ऐसी सुरक्षित जगह भी देता है, जहां वे अपनी बातें कह सकती हैं।

पितृसत्ता ने घर की सारी ताकत पिता के हिस्से दी है, इसलिए हम माने या न माने पिता के दर्जे का समाज में अपना प्रभाव आज भी है। ऐसे में जब पिता खुद अपनी बेटियों पर हावी होते हैं, उनके साथ लैंगिक भेदभाव करते हैं तो फिर सभी को मौक़ा मिल ज़ाता है बेटियों की आवाज़ दबाने का।

हम हमेशा कहते हैं कि किसी भी बदलाव की शुरुआत अपने घर से होती है, इसलिए अगर हम कोई भी बदलाव देखना चाहते हैं तो उसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अक्सर जेंडर संवेदनशीलता की बात होती है पर बिना समानता के संवेदनशीलता कभी नहीं आ सकती है। इसलिए ज़रूरी है कि हमारे समाज और संबंधों में समानता हो। हम इंसान बचपन से ही सीखना शुरू कर देते हैं और बचपन की सीख ही हम लोगों के व्यक्तित्व और विचार को आकार देती है, इसलिए अगर हम किसी भी बदलाव की पहल बचपन से करें तो इसका परिणाम बेहतर होगा। इसलिए आप भी अपने और अपनी बेटी के रिश्ते में लैंगिक समानता से जुड़ी इन बातों को ज़रूर लागू करें।

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रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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