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समाज और धर्म का संबंध हमेशा से द्वंदात्मक रहा है। समय के साथ बदलती सामाजिक संरचना में जैसे-जैसे निजी संपत्ति और पुरुष के वर्चस्व वाली व्यवस्था कायम होती गई वैसे-वैसे धर्म की जड़ें और गहरी होती चली गई। दुनियाभर में धर्म को एक वर्चस्वशाली हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। हर धर्म में औरतों को कभी भी उच्च धार्मिक पदों पर जगह नहीं दी गई। धर्म ने स्त्री को हमेशा निचले पायदान पर सिर्फ एक सहयोगी के रूप में ही जगह दी। उन्हें अपवित्र घोषित किया गया। इसके बाद भी सदियों से स्त्रियों के जीवन में धर्म और धार्मिक कर्मकांड एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते चले आ रहे हैं।

गोपा जोशी धर्म और पितृसत्ता के संबंध को रेखांकित करते हुए लिखती हैं, “सदियों से पितृसत्ता और धर्मसत्ता एक दूसरे के पूरक रहे हैं।” दुनियाभर में धर्म का चरित्र पितृसत्तात्मक है। इससे जुड़ी हर गतिविधि भी पितृसत्तात्मक है। उदाहरण के तौर पर देवताओं के साथ संपर्क बनाने का काम पुरोहित या यजमान का होता है और दोनों ही पुरुष होते थे। धर्म स्त्री और पुरुष दोनों के जीवन में एक खास भूमिका अदा करता है। पितृसत्तात्मक मूल्यों से निर्धारित होने के बावजूद पुरुषों की रुचि हमारे परिवार में होने वाले धार्मिक कर्म-कांडों में बहुत कम देखने को मिलती है लेकिन धर्म से मिलने वाली सत्ता का उन्हें सबसे ज्यादा लाभ होता है। गौरतलब है कि हमारे परिवारों में स्त्रियां ही धर्म की सबसे बड़ी वाहक होती हैं। पूजा पाठ, उपवास, भजन, सत्संग तमाम धार्मिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी बढ़-चढ़कर महसूस की जा सकती है।

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बचपन से ही घर-परिवार और अपने आस-पास के माहौल में हम धर्म के अलग-अलग रूप का सामना करते हैं। धर्म हमारी जिंदगियों पर गहरा प्रभाव डालता है। धीरे-धीरे यह हमारे स्वतंत्र विचारों को नियंत्रित करता है। हमारे घर में भी एक आम हिन्दू परिवार की तरह ही त्योहार व्रत, पूजा- पाठ, कीर्तन आदि होते हैं। पूजा-पाठ परिवार के सदस्यों की दिनचर्या का हिस्सा है। घर में सबसे ज्यादा धार्मिक मेरी मां ही हैं। बचपन से मैं उन्हें इसी एक रूप में देखते आई हूं। पढ़ने-लिखने में रुचि होने के बावजूद मैंने उन्हें अखबार के अलावा किसी दूसरी किताब को पलटते नहीं देखा। पढ़ने के लिए उनके पास वही धार्मिक ग्रंथ, व्रत कथाओं की किताबें हैं। अब पूजा-पाठ उनके व्यक्तित्व का ज़रूरी हिस्सा बन चुका है। एक मध्यम वर्गीय हिन्दू औरत की तरह करवाचौथ से लेकर जीतिया, नवरात्र, जन्माष्टमी और सारे धार्मिक पर्व और सैंकड़ो व्रत-अनुष्ठान उनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। सोमवार का व्रत तो उनका नियमित व्रत है। पापा भी नियमित पूजा-पाठ करते हैं। पूजा-पाठ वाला घर हो तो व्रत के दौरान खाना भी शुद्ध शाकाहारी बनता है। मम्मी को छोड़कर घर में सब ही मांसाहारी है। इसके बावजूद वह हमारे लिए बड़ी सहजता से मांसाहारी भोजन बना लेती हैं। हर साल वैष्णो देवी की यात्राओं की भी योजना बनाती हैं लेकिन मैं इस यात्रा को धार्मिक रूप से न देखते हुए परिवार के साथ ज्यादा वक्त बिताने के अवसर और एक आउटिंग की तरह लेती हूं। 

बचपन से ही बच्चों को घर में होने वाली पूजा-पाठ का हिस्सा बनाया जाता है। बचपन में तो हर मंगलवार को मैं पापा के साथ मंदिर जाती थी, रविवार को मम्मी के साथ। लेकिन मंदिर भी लड़कियों को परेशान करने और यौन हिंसा के केंद्रस्थल हो सकते हैं इस सच्चाई को छोटी-सी उम्र में ही मैंने अच्छे से समझ लिया था। मंदिर के शांत माहौल में तल्लीनता से खोई एक लड़की को जब बार-बार यह एहसास हो कि कोई उस पर कोई नज़र रख रहा है, कोई उसे पीछे से छूकर गायब हो जा रहा है, इस स्थिति में यह भरोसा करना मुश्किल हो जाता कि ये सब सच में हो रहा है या महज़ वहम है। धीरे-धीरे आडंबरों में दिलचस्पी न होना, असुरक्षा की भावना ने मंदिर जाने, व्रत अनुष्ठानों जैसी हर चीज के प्रति मेरे अंदर असहमति के भाव भी पैदा किए।

पितृसत्तात्मक मूल्यों से निर्धारित होने के बावजूद पुरुषों की रुचि हमारे परिवार में होने वाले धार्मिक कर्म-कांडों में बहुत कम देखने को मिलती है लेकिन धर्म से मिलने वाली सत्ता का उन्हें सबसे ज्यादा लाभ होता है।

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जब मैं स्कूल में थी तो नवरात्र में पापा के साथ आरती वगैरह पढ़ा करती थी, वह जो पुस्तिका खत्म करते उसे मैं तुरंत पढ़ने के लिए बेचैन रहती ताकि अगली पुस्तिका की बारी आए। बुदबुदाते हुए एक लय के साथ पढ़ने में ज्यादा मज़ा आता। उस उम्र के हिसाब से मेरी पढ़ने की गति तो बढ़ी ही संस्कृत के शब्दों के उच्चारण में सहजता भी आने लगी। मेरे घर में एक कथा हमेशा पढ़ी जाती थी। इस कथा में एक ब्राह्मण था जो देवी माता की नियमित पूजा करता था। उसके साथ उसकी बेटी भी पूजा में बैठा करती थी। एक दिन बेटी खेलने में इतनी मगन हो गई कि वह पूजा में शामिल होना ही भूल गई। इस बात से क्रोधित उसके पिता ने उसकी शादी ह एक बीमार व्यक्ति से तय कर दिया। बेटी ने भी अपने भाग्य का फल और पिता की आज्ञा मानकर अपने पति के साथ जंगलों में भटकती रही तब उसे माता की शक्ति और नवरात्र की पूजा विधि की मालूम पड़ी तो उन दोनों ने यह पूजा और व्रत किए जिससे उनका जीवन संवर गया।

यह कथा बताती है कि भक्ति और आस्था के पीछे कितना बड़ा डर जोड़ा गया है। धर्म का मुख्य स्तंभ डर ही है। ये किसी एक धर्म की बात नहीं है। पाप-पुण्य, पुनर्जन्म, ग्रहों की दशा, तो कभी स्वर्ग-नरक जैसी बातों से हमारे वर्तमान ही नहीं अगले जन्म का लेखा भी जोड़ा जाता हैं। पूजा छूटने, उस पर संदेह करने के लिए सज़ा भी मिलती है। ऐसी कई अवधारणाओं को इन धार्मिक कथाओं के ज़रिये सही ठहराया जाता हैं। एक बार मैंने ऐसे ही पूछा कि हम पूजा पाठ क्यों करते हैं? इसका मुझे कोई संतोषजनक जवाब तो नही मिला उल्टा मां ने मुझे डांट-डपट कर चुप करा दिया, जैसे मैंने यह सवाल पूछ कैसे लिया।

आज धर्म का स्वरूप बदल चुका है। धर्म एक राजनीति बन चुका है। मठ, पुरोहित, शास्त्रों ने हमारे विचारों को अनुशासित ही किया। धार्मिक आयोजन, कर्म-कांड, हर दिन किसी न किसी व्रत-त्योहार पर किए जाने वाले कार्यक्रम, प्रतिदिन के धार्मिक अनुष्ठान-पूजा, विवाह-संगीत जैसे अवसर में स्त्रियों की एक निर्धारित भूमिका होती है। एक मध्यवर्गीय स्त्री की कल्पना इन अनुष्ठानों के बगैर नहीं की जा सकती उनके जीवन का आधे से ज्यादा भाग ऐसे ही धार्मिक पूजा-पाठ और व्रत का पालन करने में बीतता है। बीमारी में भी पूरी ईमानदारी और निष्ठा से वह इसका पालन करती है ताकि इसका फल उनके परिवार और खास कर पति पर हमेशा बना रहे। व्रत और पूजा का कोई भी क्रम टूटने या छूट जाने से वह अपराध बोधमहसूस करती है। अगली बार उससे भी ज्यादा तपस्वी भाव से वह पूजा, व्रत का और कठोरता से पालन करने को उतारू रहती है। 

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इसके पीछे यह तर्क काम करता है कि अपने आप को कष्ट देकर स्त्रियां पुरुष और परिवार के कल्याण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। ऐसा करना और ज्यादा तब आसान हो जाता है जब स्त्रियां देवियों की छवियों से अपने-आप को जोड़कर देखने लगती हैं। कहीं स्त्री पवित्र और पूजनीय हैं तो कुछ मामलों में घोर-अपवित्र और अपशकुन है। स्त्रियों को कभी स्वतंत्र मनुष्य समझा ही नहीं गया बल्कि ऐसा मान लिया जाता है कि वह पुरुषों से बिल्कुल अलग है। उनके पास अमरता-अजरता का कोई दैवीय गुण है जिसे ईश्वर ने उनके अंदर पहले से ही कूट-कूट के भर कर भेजा हैं और वह खुद का बलिदान देने में भी नहीं हिचकती।

ऐसे ही विषय पर एक फ़िल्म आई थी ‘पद्मावत’। फ़िल्म में दिखाए जाने वाला विषय था जौहर। जिसमें रानी पद्मावती ज़िंदा आग में कूदकर अपना जीवन त्याग देती है। फ़िल्म को लेकर कई तरह की चर्चा भी हुई। ऐसी प्रथाएं आखिर औरतें के लिए क्यों बनाई गई, जिसमें वह आग में कूदे या सती हो जाए। क्या इससे रुढ़िवादी समाज के विभस्त चेहरे का पता नही चलता। सती प्रथा हो या जौहर, दोनों ही एक तरह से आत्महत्या से हुई मौत की तरह ही है जो बहुत कष्टकारी होती है। लेकिन क्यों जौहर या सती प्रथा को गौरवमयी स्त्री की कहानी कहकर उसका बचाव किया जाता है? रानी पद्मावती के इस ‘साहस’ को बलिदान और स्त्री गरिमा की याद में आज भी कई मंदिर खड़े हैं जिनपर पितृसत्ता के विजयी पताके लहरा रहे हैं। इन मंदिरों में पूजनीय है वह स्त्री जिसने अपने राज्य और स्त्री गरिमा को बचाने के लिए खुद को आग के हवाले कर दिया। ऐसे ही सतही संघर्ष को स्त्रियां पूजती और आत्मसात करने से भी नही हिचकती हैं। 

धर्म के साथ बाज़ार की भूमिका को भी समझना जरूरी हैं। करवाचौथ के व्रत का क्रेज आज हर वर्ग की स्त्रियों में देखा जा सकता हैं। इन व्रत से जुड़ी बाकी गतिविधियां को इतना ज्यादा सजावटी बना दिया गया हैं कि हर वर्ग की स्त्रियां इसमें भाग लेना चाहती हैं। मेरी मां भी करवा चौथ का व्रत रखती हैं। वह तो ऐसे धार्मिक आयोजन और पूजा विधि की जानकारी लेने के लिए मोहल्ले की सभी स्त्रियों की प्रेरणा स्रोत हैं। करवाचौथ की कथा हर साल मम्मी ही सुनाती हैं उनके इर्द-गिर्द महिलाएं उस कथा को सुनकर आत्मविभोर हो उठती हैं जिसमें पत्नी ऐसा अकल्पनीय साहस दिखाती है जिसमे वह अपने पति का जीवन यमराज से भी वापस ले आती है।

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कोई धार्मिक समारोह हो, रात भर जाग कर किया जाने वाले जागरण, ‘ज्ञान’ प्राप्त कराने वाली टोलियां हो या गीता का पाठ, ऐसे आयोजनों में स्त्रियों की भीड़ देखने लायक होती है। मैंने कभी मोहल्ले की औरतों को धार्मिक गतिविधियों के अलावा एकजुट होते नहीं देखा। घर और समाज में अक्सर वही स्त्रियां सराही जाती है जो धार्मिक और ‘गाय’ जैसी स्वभाव वाली होती हैं। मुझे एग्जाम से पहले मंदिर जाना, माथे पर बड़ा सा टिका लगा देना, मुंह मे बताशे भर देना मम्मी की अभी भी आदत है। बचपन में मैं देखा-देखी व्रत भी रखती थी लेकिन शाम तक भूख की वजह से सहनशीलता टूट जाती। धीरे-धीरे मैंने महसूस किया इस तरह खुद को दर्द देने से मुझे कुछ हासिल होने वाला नहीं। लेकिन कभी मेरी बात को तवज्जो नही दी गई। पहली बार जेएनयू में मुझे मेरे जैसे सोचने-बोलने वाले लोग मिले। जेएनयू आने के बाद बची-खुची धार्मिकता के बादल भी छंट गए। उसके बाद मेरी मां को पूरा विश्वास हो चला कि मैं नास्तिक हो चुकी हूं। अब वह व्रत रखने के लिए कोई दबाव नहीं देती लेकिन भगवान में मेरी आस्था बची रह जाए किसी तरह, इसकी कोशिश जरूर करती रहती हैं।

धर्म से जुड़े अंधविश्वास और कुप्रथाएं भी हमारे जीवन का हिस्सा है। हर घर में यह पूर्वाग्रह हमारे सामान्य व्यवहार का हिस्सा है। उन पर इतनी मज़बूती से विश्वास करना सिखाया जाता है कि कोई भी विज्ञान और तर्क काम नही करता। पीरियड्स के दौरान मंदिर जाना मना होता था। किसी मूर्ति को नही छू नहीं सकती, पेड़ पौधों से दूर रहने को कहा जाता था। लेकिन अब मां को बिना बताए भी मैं पीरियड्स के दौरान मंदिर की सफाई कर हूं या किसी मूर्ति को छू लेती हूं। इसके साथ ही यह समाज की विडंबना है कि एक धर्म को श्रेष्ठ दूसरे को कम श्रेठ समझने की मानसिकता बचपन से सीखाई जाती है। जैसे मुस्लिम समुदाय को अक्सर बुरा दिखाने की कोशिश की जाती है और उन्हें वैसा ही समझने पर ज़ोर दिया जाता हैं। शादी किसी से भी कर लो लेकिन लड़का मुसलमान न हो इस बात पर चेताया जाता है। 

हमारे मोहल्ले में अलग-अलग धर्म और समुदाय के लोग सालों से एकसाथ रह रहे हैं। घर में इर्द पर सेवई भी आती है, क्रिसमस पर केक भी। संविधान हर धर्म को बराबरी का दर्जा देता है। लेकिन इसके बाद भी सांप्रदायिकता, धर्म-परिवर्तन या किसी धर्म से जुड़ी कोई भी बात लोगों की भावनाओं को आहत कर देती है। हाल ही में तनिष्क के एक एड में हिन्दू मुस्लिम सौहार्द को ‘लव जिहाद’ कह कर बायकॉट की मांग उठने लगी जिसके बाद तनिष्क को वह ऐड वापस लेना पड़ा। परिवार ही पितृसत्तात्मक समाज की वह महत्वपूर्ण इकाई है जिसमें हमें इसके अनुकूल रहने का अभ्यास करवाया जाता है। धर्म जैसी सामाजिक संस्थाओं की नींव डाली जाती है। हमारे समाज में धर्म आज भी गहरी पैठ बनाए हुए हैं और इसे बनाए रखने की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं पर है। हमारे समाज में नास्तिक होने को लेकर भी कई भ्रम हैं। भीड़ से अलग एक स्वतंत्र राय रखना जैसे गलत है, उसी तरह नास्तिक होना भी। 

धर्म का प्रभाव इस तरह से है कि घर की औरतें भी अपने बेटों से ज्यादा बेटियों को पूजा- अनुष्ठानों के प्रति प्रोत्साहित करती हैं ताकि वह ज़्यादा आज्ञाकारी और घरेलू लगे। लेकिन लड़कियों को धर्म से जुड़े अंधविश्वास और प्रथाओं के प्रति जागरूक नहीं किया जाता। मेरी शिक्षा और जेएनयू जैसे स्वतंत्र माहौल ने ही मुझे धर्म, अंधविश्वास, आडंबर और ऐसी सामाजिक संस्थाओं और शक्तियों के प्रति जागरूक बनाया जो हमारे सोचने और जीने के ढंग को नियंत्रित करती है।

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तस्वीर साभार : pri.org

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