समाजख़बर 2.90 करोड़ महिलाएं और लड़कियां हैं आधुनिक गुलामी की पीड़ित: रिपोर्ट

2.90 करोड़ महिलाएं और लड़कियां हैं आधुनिक गुलामी की पीड़ित: रिपोर्ट

वॉक फ्री एंटी-स्लेवरी ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार हर 130 महिलाओं और लड़कियों में से एक आज आधुनिक गुलामी में जी रही है।

उन्नीसवीं सदी के पहले से ही पूरी दुनिया के कार्यकलापों में दास प्रथा समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है। औद्योगीकरण के काल से दासता ने जो रफ़्तार पकड़ी वह आज भी थमने का नाम नहीं ले रही है। आधुनिक युग में या प्रौद्योगिकी के ज़माने में दासता का एक नया रूप आ चुका है जिसे आधुनिक दासता के नाम से जाना जाता है। सबसे दुखद बात यह कि इस आधुनिक दासता का सबसे अधिक सामना लड़कियां और महिलाओं को करना पड़ रहा है। हाल ही में इससे जुड़ी एक रिपोर्ट सामने आई है जिसके मुताबिक दुनियाभर में दो करोड़ 90 लाख महिलाएं और लड़कियां आज भी आधुनिक दासता का शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, समाज में यह दासता जबरन श्रम, जबरन विवाह, कर्ज देकर बंधक बनाना और घरेलू दासता के रूप में मौजूद है। आधुनिक दासता की शिकार महिलाओं का यह आंकड़ा वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से भी ज्यादा है।

वॉक फ्री एंटी-स्लेवरी ऑर्गनाइजेशन के सह-संस्थापक ग्रेस फॉरेस्ट ने दासता पर कहा कि हर 130 महिलाओं और लड़कियों में से एक आज आधुनिक गुलामी में जी रही है। उन्होंने यह भी कहा कि सच्चाई यह है कि मानव इतिहास में किसी अन्य समय की तुलना में आज गुलामी में रहने वाले सबसे अधिक लोग हैं। जबकि लोग आज के विकसित समाज को महिलाओं के लिए सबसे अधिक अच्छा मानते हैं। इस रिपोर्ट के स्टैक्ड ओड्स श्रेणी में लिखा गया है कि यौन उत्पीड़न के सभी पीड़ितों में 99 प्रतिशत महिलाएं हैं। वहीं, जबरदस्ती शादी के सभी पीड़ितों में 84 प्रतिशत और जबरदस्ती मजदूरी के सभी पीड़ितों में 58 प्रतिशत महिलाएं हैं। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आधुनिक गुलामी का चेहरा समय के साथ बदलकर आज के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ढल गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कहने को आज़ादी है पर गहराई में उतरें तो यह गुलामी का ही एक रूप है।

तस्वीर साभार: Walk Free

और पढ़ें : यौन दासता का शिकार होती हमारी नाबालिग़ लड़कियां

रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्था वॉक फ्री एंटी-स्लेवरी ऑर्गनाइजेशन के सह-संस्थापक ग्रेस फॉरेस्ट ने कहा कि दुनिया के पांच में से चार क्षेत्रों में आधुनिक गुलामी के पीड़ितों के रूप में महिलाएं बहुत आगे हैं। उन्होंने कहा कि एशिया और प्रशांत क्षेत्र में 73 प्रतिशत, अफ्रीका में 71 प्रतिशत, यूरोप और मध्य एशिया में 67 प्रतिशत और अमेरिका में 63 प्रतिशत महिलाएं आधुनिक दासता की शिकार हैं। इसी तरह अरब देशों में 40 प्रतिशत महिलाएं गुलामी में जीवन बिता रही हैं।

किताबों में दास प्रथा के बारे में पढ़ा जा सकता है जिसमें एक धनी वर्ग निर्धन वर्ग को गुलाम बनाकर रखता है और उनसे अपने रोज़मर्रा के काम से लेकर सभी बड़े काम भी करवाता है लेकिन औद्योगिक क्रांति के दौरान यह दासता अपने चरम पर थी जब ब्रिटिश राज के कब्जे वाले क्षेत्रों से लोगों को गुलाम बनाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर गुलामी कराने के लिए बंधुआ मजदूर के तौर पर ले जाया जाता था। यह तो ठहरी पुराने ज़माने की दासता लेकिन अब आधुनिक दासता प्रचलन है जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है दासता वही है बस समय के फ़ेरबदल के साथ उसके स्वरूप में बदलाव हुआ है।

वॉक फ्री फाउंडेशन के अनुसार, नए जमाने की गुलामी का मतलब है ‘किसी शख्स ने दूसरे की आज़ादी छीन ली हो’। दूसरे इंसान का अपने शरीर, काम करने या न करने पर अधिकार खत्म हो जाए और उसे प्रताड़ित किया जाए। इस तरह आज़ादी को डर, हिंसा, दबाव या ताकत के बलबूते पर खत्म किया जाता है। आधुनिक युग में दासता अलग-अलग तरीके की होती है जैसे मानव तस्करी, कर्ज का बोझ या जबरन कराई गई शादी आदि में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं।

वॉक फ्री एंटी-स्लेवरी ऑर्गनाइजेशन के सह-संस्थापक ग्रेस फॉरेस्ट ने दासता पर कहा कि हर 130 महिलाओं और लड़कियों में से एक आज आधुनिक गुलामी में जी रही है।

और पढ़ें : भारत में उभरती रेप संस्कृति के लिए ब्राह्मणवादी मानसिकता है जिम्मेदार

अर्थशास्त्री एवी हार्टमन ने 2016 में लिखी किताब ‘आपके पास कितने गुलाम हैं’ में आधुनिक गुलामी का ज़िक्र किया है कि औसतन एक जर्मन अप्रत्यक्ष रूप लगभग 60 गुलामों से जुड़ा हुआ है। रोलर इसपर कहते हैं, ”चाहे वह कपड़े खरीदना हो या किसी तरह का सामान खरीदना, हम कहीं न कहीं दुनिया में मौजूद गुलामी की प्रथा को बढ़ावा दे रहे हैं।

ऐसी खबरें जिसमें मानव तस्करी के मामले, कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्या के मामले, लड़की की जबरन शादी कराने के मामले आते रहते है आज़ादी पर प्रहार करने वाली ये सामान्य रूप से केवल खबरें ही लगती हैं पर असल में यह सभी आधुनिक गुलामी का जीवंत उदाहरण है जो व्यक्ति को मानसिक रूप से तनाव में बांधे रखती हैं जिसपर अभी नहीं तो भविष्य में तो ध्यान ज़रूर दिया जाएगा जब यह सभी समस्याएं एक विकराल रूप धारण कर लेंगी।

और पढ़ें : हमारे समाज में औरत की जाति क्या है?


तस्वीर साभार: Associated Press News

About the author(s)

पंजाब केसरी दिल्ली समूह के साथ कार्यरत श्वेता गार्गी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स में ग्रेजुएट है तथा जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकी हैं। घर और समाज में मौजूद विभेद के चलते उनका समावेशी नारीवाद की ओर झुकाव अधिक है। साथ ही उन्हें सामाजिक - आर्थिक - राजनैतिक और लैंगिक समानता से जुड़े विषयों पर लिखना बेहद पसंद है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संबंधित लेख

Skip to content