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मैनस्प्लेनिंग क्या होती है? इसे समझने के लिए पहले कुछ उदाहरण देना सही होगा। जब आप यह कहती हैं कि आप महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करना चाहती हैं और यह सुनकर आपके आसपास के पुरुष यह कहते हैं कि ऐसा करने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि महिलाएं अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल करती हैं और उन्हें जितनी बराबरी चाहिए थी उतनी मिल चुकी है। या फिर जब आप किसी राजनीतिक, आर्थिक मुद्दे पर अपनी राय रखती हैं या किसी प्रेजेंटेशन पर अपने विचार और सामने वाला पुरुष कहता है, रुको! मैं समझाता हूं क्योंकि उसे यह लगता है कि चूंकि वह एक मर्द है और आप औरत तो ज़ाहिर तौर पर वह आपसे बेहतर जानकारी रखता है। यह मैनस्प्लेनिंग ही होती है।

जब आप अपने पुरुष मित्र को यह कहती हैं कि आप शादी किए बगैर ही खुश रहेंगी और इसके पीछे की वजह बताती हैं और यह सुनते ही आपके पुरुष मित्र आपको ये बताने लग जाते हैं कि बिना शादी के जीवन में एक अकेली औरत को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यह भी मैनस्प्लेनिंग होती है। ये तो बस कुछ उदहारण हैं। मैनस्प्लेनिंग का अनुभव हम सभी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में आए दिन करते हैं। हम बता दें कि यह शब्द दो अंग्रेजी शब्द मैन और एक्सप्लेनिंग (समझाना) से मिलकर बना है। एक वाक्य में कहें तो मैनस्पेलिंग का मतलब है किसी पुरुष का किसी महिला का ज़रूरत से ज्यादा समझाना इस आधार पर कि वह मर्द है और सामने वाली औरत से बेहतर जानकारी रखता है मैनस्प्लेनिंग कहा जाता है।        

यह मानना की मैनस्प्लेनिंग हमारे जान-पहचान के लोग नहीं करते तो बहुत ही गलत होगा। असल में तो हमारे सबसे करीबी लोग ही यह काम सबसे ज्यादा करते हैं। याद नहीं, जब आपके पापा ने आपकी बात ही नहीं सुनी बावजूद इसके कि आप पूरे आत्मविश्वास के साथ उनके पास अपनी बात कहने गई थी। याद नहीं, जब ऑफिस में आपके सुपरवाइज़र ने आपकी बात को सुने बगैर ही कह दिया था कि आपका फैसला गलत है या आपके आइडियाज़ पुराने हैं। याद नहीं, जब आपके रिश्तेदार ने सबके सामने आपसे कहा था कि आपके लिए कौन सा कोर्स और कौन सा पेशा बेहतर होगा क्योंकि आप एक लड़की हैं, एक औरत हैं। इन सारे वाकयोॆ के बाद अपने खुद पर ही सवाल उठाए होंगे। हो सकता है यह भी सोचा होगा कि आपके पापा, सुपरवाइजर और वे रिश्तेदार ही सही बोल रहे होंगे क्योंकि उन्होंने आपसे ज्यादा दुनिया देखी है। वे उम्र में आपसे बड़े हैं, उनके पास आपसे ज्यादा अनुभव है और न जाने क्या-क्या। आपने खुद को 10 वजह बताई होगी कि क्यों आपके पापा, सुपरवाइजर और रिश्तेदार सही सलाह ही दे रहे होंगे बावजूद इसके कि उस मुद्दे पर आप उनसे ज्यादा समझ रखती हैं। एक महिला की बात या राय को दरकिनार ख़ुद को सही और बेहतर साबित करने की कोशिश का आधार भी मैनस्प्लेनिंग है।   

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जब भी कोई पुरुष किसी महिला की बात को सुने बिना या बीच में काटकर ही इस उद्देश्य से किसी मुद्दे पर समझाता है, उसे ज्ञान देता है कि वह एक मर्द होने के नाते बेहतर समझ रखता है वह मैनस्प्लेनिंग होती है। आप यह सोच रहे होंगे कि इसमें क्या समस्या है। समस्या इसलिए है कि क्योंकि इस सोच का आधार भी पितृसत्ता ही है। हर तरह के मुद्दों पर पुरुषों की बिलकुल सटीक राय हो ये जरूरी नहीं। हर विषय पर हर पुरुष को गहराई से पता हो यह जरूरी नहीं। ख़ास तौर पर महिलाओं की जिंदगी और उनके अनुभवों के बारे में हो। बावजूद इसके, जब पुरुष उन मुद्दों पर भी महिलाओं को नहीं बोलने देते है, उन्हें टोकते है, उनकी बात को अनसुना करते हैं, उनकी अवहेलना करते हैं, उनकी आलोचना करते हैं, तो यह मैनस्प्लेनिंग होती है जिसे किसी भी महिला को स्वीकारना नहीं चाहिए।        

जब भी कोई पुरुष किसी महिला की बात को सुने बिना या बीच में काटकर ही इस उद्देश्य से किसी मुद्दे पर समझाता है, उसे ज्ञान देता है कि वह एक मर्द होने के नाते बेहतर समझ रखता है वह मैनस्प्लेनिंग होती है।

पुरुषों के इस तरह के व्यवहार के पीछे कई सारी वजहें होती है। अधिकतर वे ये मानकर चलते हैं कि चूंकि हम एक महिला हैं इसलिए हमें कुछ नहीं पता और इसलिए बगैर मांगे सलाह देने लग जाते हैं जैसा कि हमारे पापा, भाई, रिश्तेदार आदि करते हैं। वहीं, कई बार ऐसे भी पुरुष होते हैं जो अपने सामने बैठी महिला के पास अधिक जानकारी है यह महसूस कर घबरा जाते हैं। असुरक्षित महसूस करने लगते हैं, उनका मेल ईगो हावी होने लगता है और इसलिए अपने इस ईगो की खातिर वह मैन्स्पेलिंग का सहारा लेते हैं।

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इस प्रकार के व्यवहार के पीछे वजह चाहे जो भी हो, पुरुषों को यह समझना बहुत ही जरूरी है कि हर मुद्दे और बात की समझ उन्हें हो ये जरूरी नहीं होता। उन्हें मुंह बंद रखना भी सीखना होगा। उन्हें अपने आस-पास बैठी महिलाओं की बातों को बिना टोके सुनना सीखना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि किसी भी मुद्दे पर उनको हर जानकारी हो ये जरूरी नहीं। उन्हें ये भी स्वीकारना होगा कि जिंदगी सिर्फ उन्हीं के अनुभवों से परिभाषित नहीं होती। किसी भी क्षेत्र में जैसे अनुभव उनके हैं जरूरी नहीं कि उनकी आस-पास की महिलाओं के अनुभव भी वैसे हो। इस प्रकार के बदलावों से न सिर्फ मैनस्प्लेनिंग बंद हो जाएगी बल्कि घरों में, ऑफिस में, सामाजिक स्थलों पर, महिलाएं बड़े ही आरामदायक रूप से अपनी बात रख पाएंगी।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल

Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

She may be contacted at sonaliandkhatri@gmail.com.

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