इंटरसेक्शनलजेंडर शादी किसी समस्या का हल नहीं बल्कि पितृसत्ता का हथियार है

शादी किसी समस्या का हल नहीं बल्कि पितृसत्ता का हथियार है

शादी पितृसत्ता का वह हथियार है जो धर्म, जाति और जेंडर की अवधारणा को मज़बूती से लागू करने और उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का काम करता है।

प्रीति अपने भाइयों की एकलौती बहन है। गरीब मज़दूर परिवार से ताल्लुक़ रखने वाली प्रीति की मां बचपन में ही गुजर गई थी। भाभी और भाई ने प्रीति का पालन-पोषण किया। साथ ही बचपन से उसके ऊपर काम का ज़्यादा बोझ लाद दिया गया। भेदभाव और हिंसा के ऐसे अनुभव रहे कि उसने कई बार आत्महत्या करने की कोशिश तक की। उसकी दोस्त अक्सर उसे समझाती, “चिंता मत करो कुछ दिन की ही बात है, जिस दिन शादी हो जाएगी तुम्हारा यहां से पीछा छूट जाएगा।” आख़िरकार महज़ सत्रह साल की उम्र में प्रीति की शादी हो गई। जुआरी और शराबी पति ने उसे इतना ज़्यादा प्रताड़ित किया कि प्रीति का मानसिक संतुलन बिगड़ गया। नतीजन, प्रीति पिछले छह महीने से ग़ायब है और उसकी खोज खबर लेने वाला कोई नहीं है।

शादी एक ऐसा शब्द है जिसे लेकर हम लोगों के घर-परिवार में लड़कियों के मन में इतनी बातें भर दी जाती हैं कि वे अपनी पढ़ाई और ख़ुद के व्यक्तित्व को निखारने के अवसर को छोड़कर राजकुमार के सपने देखने लग जाती हैं। प्रीति अकेली नहीं है जिसे अपनी ज़िंदगी का उद्धार शादी में ही नज़र आया। गांव में अक्सर मैं ऐसी किशोरियों से मिलती हूं जो शादी को लेकर बेहद आश्वस्त होती हैं। बीते दिनों अपनी संस्था की तरफ़ से ग्रामीण किशोरी के नेतृत्व विकास के लिए चलाए जा रहे एक प्रशिक्षण में जब एक दिन किशोरियों से यह पूछा गया कि आपके मौलिक अधिकार क्या हैं? इस सवाल के जवाब में लड़कियों के समूह ने कहा, “शादी के बाद पति पर हम लोगों का अधिकार होता है। पति हमारे जीते जी किसी और के पास नहीं जा सकता है और न ही कोई उसे हम लोगों से ये छीन सकता है।” हो सकता है लड़कियों के इस ज़वाब को पढ़कर आपको हंसी आए और आप यह समझें कि ये लड़कियां कभी स्कूल नहीं गई होंगी। तो आपको बता दूं कि इस समूह में कुल नौ लड़कियां थी जिनमें से तीन कॉलेज भी जाती हैं। ख़ैर, यह एक उदाहरण था जिसे मैंने हाल ही में देखा। ऐसे बहुत से उदाहरण हम आए दिन देख सकते हैं, जब शादी को लेकर लड़के और लड़कियों दोनों के ही व्यवहार और सोच उजागर होती है।

शादी पितृसत्ता का वह हथियार है जो धर्म, जाति और जेंडर की अवधारणा को मज़बूती से लागू करने और उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का काम करता है।

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पर इन सब में हमें यह समझना पड़ेगा कि शादी को लेकर हमारे घरों में बचपन से ही लड़का और लड़की को जो सीख घुट्टी की तरह पिलाई जाती है उसी वजह से कई बार लड़कियां कुछ पढ़ने और आगे बढ़ने के अवसर से पीछे हटने लगती हैं। बचपन से ही घर में किशोरियों को यह बताया जाता है कि ‘तुम्हारी शादी किसी अच्छे घर में कर देंगें तो वहां जाकर राज करोगी।‘ इस एक लाइन से लड़कियों के मन में धीरे-धीरे ज़िंदगी की हर समस्या का हल शादी लगने लगती है।

ऐसे में जब भी हम लैंगिक भेदभाव और हिंसा की घटनाओं को देखते हैं तो उसमें शादी की भूमिका सबसे अहम पाते हैं क्योंकि बचपन से ही मज़ाक़ के रूप में शादी को लेकर कही जाने वाली छोटी-छोटी बातें लड़का और लड़की दोनों के मन में एक भेदभाव को बढ़ावा देने लगती हैं। वह भेदभाव जिसमें शादी के बाद लड़का, लड़की पर ख़ुद का वर्चस्व और उसे ख़ुद के ग़ुलाम के रूप में देखता है और लड़की अपने पति को एक देवता के रूप में देखती है। ये सब जितना सरल दिखता है, वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि शादी की वाहवाही न केवल लड़कियों को ख़ुद के विकास के अवसर से दूर करता है बल्कि लड़का और लड़की के बीच भेदभाव को बढ़ावा देकर उनमें हिंसा की जड़ों को मज़बूत करता है।

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शादी पितृसत्ता का वह हथियार है जो धर्म, जाति और जेंडर की अवधारणा को मज़बूती से लागू करने और उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का काम करता है। ऐसे में ज़रूरी है कि ज़मीनी स्तर पर शादी की वाहवाही के विरुद्ध लड़कियों को ख़ुद सशक्त और स्वावलंबी बनाने के लिए प्रेरित किया जाए। उन्हें उनके मौलिक और वैधानिक अधिकारों के बारे में बताया जाए और शादी, धर्म और परंपरा के नाम पर उनके मन में बनती शादी की इस छवि के सच को सामने लाया जाए।

इसके साथ ही, हम लड़कियों को भी यह समझना होगा कि शादी हम लोगों के जीवन का एक हिस्सा हो सकता है जो हम लोगों के निर्णय पर निर्भर करता है, लेकिन शादी पूरी ज़िंदगी की किसी समस्या का हल नहीं हो सकती है। इसके साथ ही, हम लोगों को ये नहीं भूलना चाहिए कि जब हम किसी रिश्ते पर आश्रित होकर ख़ुद को देखते हैं तो हम हमेशा दूसरे पर ही आश्रित रह जाते हैं और न चाहते हुए भी हम लोगों को एक ग़ुलाम की ज़िंदगी जीना पड़ता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि हम लड़कियां शादी की वाह-वाही की बजाय शादी की राजनीति को समझ कर हमें पहले ख़ुद के विकास पर ध्यान देना होगा, वरना सदियों के परिवार, रिश्ते और घर के नाम पर महिलाओं की ज़िंदगी चूल्हे में झोंकना समाज को अच्छे से आता है।

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तस्वीर साभार : The Scroll

About the author(s)

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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