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सामने वाले व्यक्ति की अनदेखी करना, जो हुआ है उसे नकारना, उस इंसान की भावनाओं को नकारना या उसके फैसलों पर सवाल उठाना। जो लोग इसका सामना करते हैं, उन्हें यह मानने पर मज़बूर करना कि वे जैसा सोच रहे हैं वैसा नहीं है, वे जैसा अनुभव कर रहे हैं वैसा नहीं हुआ है, वे जिस तरीके से सच्चाई को देख रहे हैं वैसा नहीं है। गैसलाइटिंग का सामना करने वाले लोगों को यह आभास होना कि उनके साथ ऐसा कुछ हो भी रहा है ये भी बड़ा मुश्किल होता है। गैसलाइट अक्सर हमारे करीबी लोग ही करते है, ख़ास तौर पर गैसलाइटिंग के उदाहरण रोमांटिक रिश्तों में देखने को मिलते हैं। 

छोटा सा उदहारण- एक व्यक्ति का अपने पार्टनर के प्रति व्यवहार बदलना और जब पार्टनर इस बदलाव के पीछे की वजह पूछे तो उसका ये कहना कि आज कल तुम ज्यादा ही सोच रही हो, ऐसा कुछ नहीं है। यह एक प्रकार की गैसलाइटिंग ही होती है। इस केस में उक्त व्यक्ति का व्यवहार पत्नी के प्रति वास्तव में बदला है। लेकिन इस बदलाव के पीछे की वजह बताने की जगह पति का इस आरोप को नकारना कि ऐसा कुछ है ही नहीं गैसलाइटिंग होती है। मनोवैज्ञानिक इस शब्द का प्रयोग उन परिस्थितियों के लिए करते हैं जहां एक मैनिप्युलेटर किसी और को या लोगों के समूह को उनकी अपनी वास्तविकता, स्मृति या धारणाओं पर सवाल उठाने की कोशिश करते हैं। मनोवैज्ञानिक गैसलाइटिंग को हमेशा से एक गंभीर समस्या मानते आए हैं।

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गैसलाइटिंग में यही होता है, तथ्यों को तोडा-मरोड़ा जाता है। एक और उदहारण से समझते हैं। पति और उसके ससुराल वाले अपनी बहू के साथ घरेलू हिंसा करते हैं। इस हिंसा की शिकायत जब वह लड़की घर वालों या पुलिस से करती है, तो लड़के के घर वालों का इस प्रकार के जवाब देना; ये घाव तो इसके शरीर पर पहले से ही थे। यह लड़की झूठ बोल रही है, हमने तो इस पर कभी हाथ नहीं उठाया। इस मामले में लड़के के घर वाले तथ्यों को ही चुनौती दे रहे हैं। यह कहना कि ऐसा तो कुछ हुआ ही नहीं था, गैसलाइटिंग का सबसे आम तरीका है। ऐसा करने से विक्टिम भी कई बार गैसलाइटर की बात को ही सच मानने लगता है। विक्टिम खुद पर इतना शक करने लगता/ लगती है कि उसका अपने ऊपर से आत्मविश्वास तक डगमगाने लगता है। वह जिस तरीके से वास्तविकता को देखता/ देखती है, उसे समझता/ समझती है, उस पर भी सवाल उठाने लगता है। कई मामलों में तो कभी कभी विक्टिम को मानसिक रूप से बीमार तक घोषित करवा दिया जाता है।

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जो व्यक्ति गैसलाइटिंग का सामना करते हैं, वह कई-कई दिन आत्म-संदेह में बिता देता है। वो ये सोचना लगता है कि शायद वही गलत हैं, शायद उस की बात में सच में दम नहीं था, शायद उनका ही फैसला गलत था आदि।

इसके अतिरिक्त, गैसलाइटिंग करने का एक और तरीका होता है- टोन पुलिसिंग के द्वारा। मान लीजिए, किसी मुद्दे पर आप बहुत ही ज्यादा भावुक हैं जैसे कि गुस्सा हैं, नतीजन अपनी बात आप गुस्से में रख रही हैं। सुनने वाला व्यक्ति, आपका गुस्सा देख झल्ला जाता है, आपके ऊपर सवाल उठाने लगता है, आपकी बात सुनता ही नहीं है, यही नहीं आपके गुस्से की वजह से आपकी बात की विश्वसनीयता तक पर सवाल उठा देता है, तो यह भी गैसलाइटिंग का ही एक उदाहरण है।        

जो व्यक्ति गैसलाइटिंग का सामना करते हैं, वह कई-कई दिन आत्म-संदेह में बिता देता है। वो ये सोचना लगता है कि शायद वही गलत है, शायद उस की बात में सच में दम नहीं था, शायद उनका ही फैसला गलत था आदि। इस प्रकार के विचार जब विक्टिम के मन में बार-बार आने लगे तो ठहरने की ज़रूरत है। विक्टिम को इस प्रकार के रिश्तों और लोगों से दूर होने की ज़रूरत है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो विक्टिम के लिए वास्तविकता पर यकीन करना बेहद ही मुश्किल हो जाएगा, वह वास्तविकता को गैसलाइटर के चश्मे से ही देखेगा। ऐसा करने से न सिर्फ उसकी गैसलाइटर पर निर्भरता बढ़ जाएगी, बल्कि सारा नियंत्रण भी गैसलाइटर के हाथों में आने लगता है।          

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ये पहचानने के लिए कि कहीं आप गैसलाइटिंग का शिकार तो नहीं हो रहे, आपको गैसलाइटर के साथ अपने संबंधो और दूसरे लोगों के साथ अपने संबंधो का आकलन करना चाहिए। अगर बाकी लोगों के साथ बातचीत करने के बाद भी आपको आत्म-संदेह और कन्फूजन का अनुभव होता है तो ये मुमकिन है कि आप गैसलाइटिंग के शिकार नहीं हो रहे। लेकिन हर बार एक विशिष्ट व्यक्ति के साथ बात करने के बाद, आप को खुद पर अगर संदेह होता, अपने सोचने विचारने के तरीकों पर संदेह होता है, तो शायद आप गैसलाइटिंग का शिकार हो रहे हैं। अगर उस विशिष्ट व्यक्ति से मिलने के बाद आप खुद से कई बार कुछ इस प्रकार की बातें करते है, “क्या मैं बहुत ज्यादा संवेदनशील हूं? मैं खुश क्यों नहीं हूं? मैं हर बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हूं? मैं इतना ज्यादा क्यों सोचती हूं? तो यह संभव है कि आप गैसलाइटिंग का सामना कर रहे हैं।

अगर आप गैसलाइटिंग का सामना कर रहे हैं तो ये कुछ सुझाव हैं जिन्हें आप अपना सकते हैं, तथ्यों को समझने की कोशिश कीजिए। गैसलाइटिंग करने वाले व्यक्ति की राय और विचारों को दरकिनार करते हुए वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश करो। अपने आप पर यकीन रखिए और खुद को उस व्यक्ति के बगैर कल्पना करने की कोशिश कीजिए, अपने आप को समय दीजिए, साथ ही साथ अपनी भावनाओं को स्वीकार कीजिए। ऐसा न करने पर गैसलाइटिंग आपकी मानसिक स्वास्थ्य पर भी बेहद बुरा असर डालता है।

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Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

She may be contacted at sonaliandkhatri@gmail.com.

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