मल्टीमीडियाइन्फोग्राफिक्स पढ़ें : नारीवादी कार्यकर्ता कमला भसीन के 6 ऐसे कोट्स जो बताते हैं नारीवाद क्यों ज़रूरी है

पढ़ें : नारीवादी कार्यकर्ता कमला भसीन के 6 ऐसे कोट्स जो बताते हैं नारीवाद क्यों ज़रूरी है

कमला भसीन नारीवाद के क्षेत्र का एक जाना-पहचाना नाम हैं जो पिछले 35 से भी अधिक सालों से जेंडर, मानवाधिकार के मुद्दों पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रही हैं। कमला भसीन अपनी कविताओं, कहानियों, लेख आदि के ज़रिए समाज में लैंगिक समानता स्थापित करने की कोशिश में लगातार जुटी हुई हैं। उन्होंने साल 1972 में राजस्थान में ग्रामीण और शहरी गरीबों के सशक्तिकरण के लिए काम करना शुरू किया था। वह संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन के साथ भी काम कर चुकी हैं। साल 2002 वह संयुक्त राष्ट्र से अलग होकर संगत से जुड़ गई। कमला भसीन के अधिकतर लेख, उनकी किताबें जेंडर, महिला सशक्तिकरण, लैंगिक समानता, नारीवाद जैसे मुद्दों पर आधारित हैं।

  1. 1. पूंजीवाद और पितृसत्ता का दोहरा रिश्ता रहा है क्योंकि पूंजीवाद को सस्ते श्रम की ज़रूरत है और महिलाएं सबसे सस्ती श्रमिक हैं।

2. बलात्कार होता है तो इज़्ज़त औरत की नहीं मर्दों की लुटती है।

3. सिर्फ महिला संसद में आने से चीज़ें बेहतर नहीं होंगी। मैं चाहती हूं कि अधिक नारीवादी महिलाएं संसद में पहुंचे। नारीवादी महिला स्त्री-पुरुष समानता की बात करेगी, नारीवादी महिला कास्ट के चक्कर में पीछे नहीं हटेगी। मैं नारीवादी महिला ही नहीं, मैं नारीवादी पुरुष भी चाहती हूं क्योंकि यह जो सोच कोई जिस्मानी सोच नहीं है। नारीवाद से हमारा मतलब है, “समानता और सिर्फ समानता।”

4. कुदरत भेद बनाती है, भेदभाव नहीं। समाज कुदरत के बनाए भेद के आधार पर भेदभाव करने लगता है।

5. अगर लोगों को नारीवाद से कोई दिक्कत हो तो उन्हें संवाद करना चाहिए। नारीवाद को सबसे ज़्यादा बदनाम पूंजीवादी पितृसत्ता और इसकी पूंजीवादी मीडिया ने किया है।

6. संविधान ने सालों पहले कह दिया था कि औरत और मर्द बराबर हैं। समाज को अब तक यह समझ नहीं आया है।

नारीवादी कार्यकर्ता कमला भसीन के ये कोट्स हमें बताते हैं कि नारीवाद और नारीवाद के मुद्दे पर चर्चा क्यों ज़रूरी है, जेंडर समानता को लागू करना क्यों मायने रखता है।


और पढ़ें: सिर्फ़ पति के ना होने पर औरत सिंगल? ऐसा भला क्यों?

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