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(यह लेख असल में मेरा अपने साथ संवाद हैl मैं खुद को यह सब कह रही हूँ, खुद से सवाल पूछ रही हूँ और अपने विचारों को सुलझाने की कोशिश कर रही हूँl मुझे ख़ुशी है कि आप भी मेरी इस बातचीत में शामिल हो रहे हैं और इस सवाल जवाब की महफ़िल का हिस्सा बन रहे हैंl स्वागत हैl)

सच कहूँ तो मुझे कभी भी सिंगल नारी शब्द और इसकी आम परिभाषा पसंद नहीं आई| नारीवादी मज़ाकों की मेरी किताब जिसका नाम है, “हँसना तो संघर्षों में भी ज़रूरी है” और जिसे जागोरी दिल्ली ने छापा है, हमने एक चित्र बनाया था जिसमें एक छोटी बेटी अपनी माँ को कह रही है, “ माँ, जब हमदोनों इकट्ठे हैं तो तुम्हें लोग सिंगल औरत क्यों कहते हैं?”

मैं तलाकशुदा हूँ, इसलिए सिंगल नारी की परिभाषा के हिसाब से मैं सिंगल हूँ| मैं पूछती हूँ, क्यों हूँ सिंगल मैं? मेरा 36 साल का बेटा है जो मेरे साथ रहता हैI वैसे मेरा बेटा पूरी तरह से विकलांग है, पर है तो मेरा बेटा और मेरे साथ हैI

और ख़ुशकिस्मती से मेरे तीन भाई और दो बहनें रही हैं जिनके दिल, बाँहें और घर मेरे लिए हमेशा खुले रहे हैंl उनकी मौजूदगी में मैं कभी न सिंगल हो सकती हूँ और न महसूस कर सकती हूँl और फिर इतने सारे जिगरी दोस्त हैं ज़िन्दगी के सफ़र मेंl और ये सब मेरी ज़िन्दगी के हमसफ़र शुरू से मेरे दुःख और सुख में साथ रहे हैंl शादी तो हम जैसों की आधी उमर बीत जाने पर होती है तो फिर जिससे हमारी शादी होती है वह कैसे हमारा जीवन साथी हो सकता है और अकेला वही क्यों? है न सोचने वाली बात?

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सिंगल औरत की परिभाषा

मेरे ख्याल से, किसी पुरुष को हमारा समाज सिंगल नहीं कहताl यह विशेषण सिर्फ़ औरतों के लिए ही सुना हैl तो कौन है सिंगल औरत? उम्र हो जाने पर भी जिसकी शादी नहीं होती या जो शादी नहीं करतीl जिसका “पति” या तो गुज़र गया है या उसे छोड़ गया है या जिसके साथ तलाक़ हो गया हैl यानी सिर्फ़ वो पुरुष जिसके साथ हमारे यौन सम्बन्ध हैं वही सब कुछ हैl वह नहीं तो हम सिंगलl सिर्फ़ वही हमें सिंगल होने से बचाता हैl केवल वही हमारा सुहाग हैl

गौरतलब है कि सुहागन शब्द भी सिर्फ़ औरत के लिए हैl हमारे समाज में पुरुष या तो सदा सुहागन हैं या उन्हें सुहाग की ज़रूरत नहीं हैl पुरुषों का सुहाग होता नहीं है, इसलिए उनका सुहाग कभी लुटता नहीं हैl पत्नी के गुज़रने पर पतिओं पर आसमान नहीं टूटताl उनके जिस्म पर न कोई सुहाग का निशान होता है, न उसे बेरहमी से मिटाना पड़ता हैl उन्हें पूरी उम्र सफ़ेद कपड़ों में नहीं रहना पड़ता, न हीं वृन्दावन जाकर उम्र गुज़ारनी पड़ती हैl

औरत का सिंगल होना एक त्रासदी मानी जाती है

औरत के लिए सिंगल शब्द सिर्फ़ एक विवरण नहीं हैl यह एक मूल्याँकन हैl सिंगल है तो गडबड है, वह घटिया हैl विधवाओं का कितना बुरा हाल किया जाता है हम सब जानते हैंl कई बार तो उसे अपनी पति की मौत का ज़िम्मेदार माना जाता है, क्योंकि अगर वो सती सावित्री होती तो पति को मरने नहीं देतीl विधवाओं को मनहूस माना जाता हैl किसी नेक काम के दौरान उन्हें वहाँ मौजूद होने तक का हक़ नहीं हैl ज़रा सोचकर देखिये कितना ज़ालिम है हमारा समाजl कुछ भाषाओं में विधवा को रांड या रंडी कहते हैं और वैश्या के लिए भी यही शब्द इस्तेमाल होता हैl

हमारे समाज में पुरुष या तो सदा सुहागन हैं या उन्हें सुहाग की ज़रूरत नहीं हैl

सिंगल औरतों को हमारे शहरों में किराए पर घर मिलना मुश्किल होता हैl उन्हें लोग पार्टियों में नहीं बुलातेl डरते हैं कि सिंगल औरतें मर्दों को बहकाकर उनपर क़ाबू कर लेंगीl बड़ी उम्र की सिंगल औरत को हर एक को हमेशा बताना पड़ता है कि वो कब शादी कर रही हैl सिंगल औरतों की शादी पूरे शहर की ज़िम्मेदारी बन जाती हैl

औरतों के लिए शादी ज़रूरी

सिंगल औरत की स्थिति को समझने के लिए एक औरत की ज़िन्दगी में शादी को समझना बहुत ज़रूरी हैl अगर औरत के लिए शादी ज़रूरी न हो तो वह कभी सिंगल न कहलाये और न ही अकेले होने पर इतनी मुसीबतें झेलेl तो अब ज़रा देखते हैं कि औरत के लिए शादी का मतलब क्या हैl

 समाज के लिए औरत की वैवाहिक स्थिति जानना बहुत ज़रूरी है

उसके  पहनावे, चूड़ियों, सिन्दूर, मंगल सूत्र से दूर से ही पता लग जाना चाहिए कि औरत शादीशुदा है या नहींl बहुत से पंजाबी समुदायों में वधु को चूड़ा पहनाया जाता हैl ये लाल और सफ़ेद रंग की मोटी चूड़ियाँ होती हैं जो कलाई से लेकर कोनी तक पहनी जाती हैंl कुछ औरतें इन्हें सालभर तक पहनती हैंl सालभर तक ये औरतें नवविवाहिता दिखाई देती हैंl पुरुष तो दो दिन बाद से ही सामान्य हो जाता हैl ये सब निशानदेही औरतों पर ही क्यों? क्या ये सब इसलिए है कि सब को पता चल जाए कि यह सम्पत्ति अब बिक चुकी हैl इस पर नज़र न डाली जाए? सोचने का विषय है या नहीं?

यही नहीं औरत को बग़ैर देखे भी पता लगना चाहिए कि वह शादी-शुदा है कि नहींl इसलिए उसके नाम के सामने कुमारी या श्रीमती होता हैl इंग्लिश में मिस या मिसेज लगाना पड़ता हैl जर्मन भाषा में और भी ग़ज़ब हैl बिन-ब्याही महिला को कहते हैं फ्रौलें या छोटी औरतl यानी बग़ैर “पति” के औरत छोटी ही रहती हैl उसका बड़ा या पूर्ण होना ”पति” पर निर्भर हैl नारीवादी कोशिशों की वजह से अब इंग्लिश में मिस शब्द का इस्तेमाल होने लगा है| मिस्टर शब्द के जैसे मिस भी हर औरत के लिए इस्तेमाल होता हैl उसकी वैवाहिक स्थिति जानने और बताने की कोई ज़रूरत नहीं हैl

इसके ठीक उलट है मर्दों की कहानीl हमारे भारतीय पुरुषों को अपनी वैवाहिक स्थिति की सूचना देने की ज़रूरत नहीं हैl उनके शरीर पर शादी के कोई निशान नहीं होते, न सिन्दूर, न चूड़ियाँ, न मंगलसूत्र, न चमकीले कपड़ेl नाम भी हमेशा श्रीमान या मिस्टर| इस सब से यही साबित होता है कि पुरुष शादी से परिभाषित नहीं होतेl उनके लिए शादी जीवन का सिर्फ़ एक पहलू हैl औरतों के लिए शादी ही सब कुछ हैl शादी के बग़ैर औरत का गुज़ारा नहीं हैl

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 हर औरत के लिए शादी क्यों है ज़रूरी?

क्या हर लड़की के लिए शादी इसलिए ज़रूरी नहीं है क्योंकि हमारे पितृसत्तामक परिवारों में जायदाद सिर्फ़ बेटों को दी जाती है? बेटियों को पराया धन समझा और कहा जाता हैl इसका मतलब है हर बेटी को पैदा होते ही बता दिया जाता है कि उसके माँ बाप का घर उसका नहीं है और उसके बड़े होते ही उसे माँ बाप का घर, उनका नाम, उनकी परवाह करना, उनसे सहारे की उम्मीद करना छोड़ना पड़ेगाl किस के भरोसे वो बच्ची अपना सब कुछ छोड़ेगी? एक अनजाने इंसान और परिवार के लिए? वाह, क्या ग़ज़ब का प्यार है बेटियों के लिए इस देश में जहाँ बेटियों को देवी कहा जाता हैl कहते देवी हैं, उससे पूरे घर के काम का बोझ उठवाते हैं और उसे बोझ समझते हैंl सिर्फ़ यही नहीं, बेटी को अच्छी शिक्षा देना और उसे अपने पैरों पर खड़ा होने लायक़ बनाने की भी ज़रुरत नहीं समझतेl क्या ऐसे परिवारों में कोई भी बेटी सुरक्षित महसूस कर सकती है, अपने पैर जमा सकती है, सिर उठाकर हिम्मत से जी सकती है? बेटियों के साथ ऐसा बर्ताव मेरी समझ के बाहर रहा है,सिर्फ़ अब से नहीं, बचपन सेl

इन हालात और परम्पराओं के चलते, हर लड़की के लिए शादी ज़रूरी हो जाती हैl अगर जीना है तो रोटी, कपड़ा और मकान चाहिएl माँ बाप, भाई ये सब देंगे नहींl खुद वह बिना तैयारी के यह सब नहीं जुटा सकतीl इसलिए अगर जीना है तो शादी करनी हैl ओउम स्वाहाl 

हमारे भारतीय पुरुषों को अपनी वैवाहिक स्थिति की सूचना देने की ज़रूरत नहीं हैl

पितृसत्तामक शादी में औरतों की स्थिति

हमारे संविधान के अनुसार औरत और मर्द बराबर हैं, दोनों आज़ाद हैं, दोनों के अधिकार हैं और दोनों की अस्मिता हैl मगर हमारे परिवारों में अभी हमारा संविधान नहीं पहुँचा हैl अधिकतर परिवारों में अभी भी मनु जी की सलाह ही मानी जा रही है, जिसके अनुसार हर औरत को हमेशा किसी मर्द के आधीन रहना चाहिए, बचपन में पिता के, शादी के बाद पति के और पति के गुजरने के बाद बेटों के अधीनl इसीलिए आज भी शादी में बेटियों का कन्यादान होता हैl भारत की एक नागरिक को उसका पिता दान करता है एक और पुरुष कोl उस दान के साथ ही उस नागरिक का मालिक बदल जाता है, पिता की जगह पतिl  उसका नाम बदल जाता हैl पिता के नाम की जगह पति का नामl उसका घर बदल जाता है, पिता के घर की जगह पति का घर और नए घर के क़ायदे क़ानून और संस्कृतिl बहुत से परिवारों में बहु को पर्दा करना पड़ता है, सब की सेवा करनी पड़ती है, सब की सुननी पड़ती हैl

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जिस व्यक्ति से औरत की शादी होती है उसे हम पति कहते हैंl  पति का मतलब है स्वामी, मालिकl यानी, शादी में और हमारे परिवारों में समानता की न बात है न जगहl जो औरतें ऐसी शादियाँ करवाती हैं उन्हें ये सब पता होता है या पता होना चाहिएl क्या ऐसी शादी में औरत की हालत बंधुआ मजदूर जैसी नहीं होती? उसी घर में गुज़ारा करना है चाहे हालात जैसे भी हों, क्योंकि कोई और चारा नहीं हैl इन शादियों में औरतों पर हिंसा ज़िन्दगी का हिस्सा होती हैl मालिकों का अपने दासों पर हाथ उठाना, उन पर हुकुम चलाना आम होता हैl उसे ग़लत नहीं माना जाताl इसीलिए सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 40 फीसद पत्नियों पर हिंसा होती हैl हर तरह की हिंसाl आज भी बहुत सारे पुरुष और स्त्रियाँ भी इसे आम बात समझती हैं, जब कि क़ानून की नज़र में यह अपराध या जुर्म है|

अगर पति अच्छा है तो ठीक है, पर अगर वह अच्छा नहीं है तो सुहागने बुझ सी जाती हैंl उनका अकेलापन बहुत दुखदाई होता हैl नए परिवार में कोई राज़दार नहीं, पुराने परिवार से कोई रिश्ता नहीं, सहेलियों के नामपर कोई नहींl ऐसे घरों में पत्नियां बेहद अकेली होती हैं, उनके अंदर एक गहरा अकेलापन होता है, मगर उन्हें सिंगल नहीं सुहागन कहा जाता हैl इन्हीं हालात के बारे में मैंने एक गाना लिखा था

कौन कहता है जन्नत इसे, हमसे पूछो जो घर में फँसेl

न हिफ़ाज़त न इज्ज़त मिली , कर कर क़ुर्बानी हम मर गएl

हमने हर शय सँवारी मगर , खुद हम बदरंग होते गएl

दुश्मनों की ज़रुरत किसे, ज़ुल्म अपनों ने हम पर कियेl

घर के अन्दर भी गर मिटना है, तो सँभालो ये घर हम चलेl

जिसमे दिन रात औरत जले, ऐसे घर से हम बेघर भलेl

शादियों में समानता ज़रूरी है और मुमकिन भी

मेरी अब तक की लिखी बातें पढ़ कर शायद यूँ लगे कि मैं शादी के ख़िलाफ़ हूँl ऐसा बिलकुल नहीं हैl मैं ग़ैर बराबरी वाली, अन्याय और हिंसा वाली शादी के खिलाफ हूँl मैं उस शादी के खिलाफ़ हूँ जिसमें परस्पर इज्ज़त और प्यार न होl मैं उन शादियों के ख़िलाफ़ हूँ जिनकी कडवाहट, टकराव और हिंसा में बच्चे भी फँस जाते हैं और दुःख सहते हैंl ग़ैर बराबर और हिंसात्मक शादियों का सबसे बड़ा नुक्सान बच्चों को होता है और यह सरासर ज़ुल्म हैl

मैं यह भी मानती और जानती हूँ कि स्त्री–पुरुष असमानता के ख़िलाफ़ उठी आवाज़ों और आंदोलनों की बदौलत हमारे परिवारों में बदलाव आये हैं और आ रहे हैंl समानता, न्याय और परस्पर सम्मान की ओर ले जाने वाले इन बदलावों की रफ़्तार को बढ़ाने की ज़रुरत हैl मैं मानती ही नहीं जानती भी हूँ कि सुंदर, प्यार और सम्मान भरी शादियां हो सकती हैं और होती हैंl मैंने देखी हैं और उन्हें सराहा हैl

मैं मानती हूँ कि औरत और मर्द दोनों के लिए शादी ज़रूरी नहीं होनी चाहिएl उनकी मर्ज़ी है शादी करें या न करेंl अगर करते हैं शादी तो जब तक प्यार है, सुख चैन है, सम्मान है, साथ रहेंl अगर शादी में सिर्फ़ बरबादी है, दुःख है, हिंसा है तो क्यों साथ रहें? सिर्फ़ रोटी, कपड़ा, मकान के लिए बंधे रहें, एक दूसरे को दुःख देते रहें और दुःख सहते रहें? मुझे तो ऐसा करना ज़िन्दगी को नकारना, ज़िन्दगी का अपमान करना लगता हैl

और हाँ मैं यह भी बता दूँ कि मेरे हिसाब से शादी के लिए जाति, वर्ग और धर्म एक जैसा होने की ज़रुरत नहीं हैl दो पुरुष या दो स्त्रियाँ भी शादी कर सकती हैंl शादी हम एक इन्सान से करते हैं, उसके लिंग या योनि से नहींl मेरे लिए शादी का मतलब है ख़ुशीl जिसके साथ खुश हैं उसके साथ शादी करेंl शादी को व्यापार या राजनीति न बनाएंl वैसे, बिना शादी के भी इकट्ठे रह सकते हैंl शादी को बेड़ियाँ न बनने देंl

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पूरी दुनिया में “एकल” औरतें सबसे ग़रीब हैं, मगर हमारे देश में ग़रीब होने के साथ-साथ उनका सामाजिक उत्पीड़न बहुत होता है औए यह सिर्फ़ हमारी मानसिकता के कारणl इसे कम किया जा सकता और कम करने के प्रयास इंसाफ़ पसंद लोगों ने हमेशा करने की कोशिश की हैl विधवा पुनर्विवाह के लिए आवाज़ उठाई गई और सती प्रथा को रोका गयाl इसी क्रम में आज भारत में “सिंगल” औरतों के सशक्तिकरण के लिए एक अभियान चल रहा हैl सिंगल नारी शक्ति संगठन नामक सँजाल दस से अधिक राज्यों में यह काम कर रहा हैl एक लाख से ज़्यादा सदस्य हैं इनकीl “सिंगल” औरत से जुड़े रीति रिवाजों को बदला जा रहा हैl विधवा महिलायें रंगीन कपड़े पहनने लगी हैं, चूड़ियाँ पहनने लगी हैं, बिंदी लगाने लगी हैंl “सिंगल” औरतों को उनके हक़ दिलवाए जा रहे हैंl नए क़ानूनो व योजनाओं की मांग की जा रही हैl उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने की कोशिश की जा रही हैl संगठन की शक्ति से इन औरतों को उनके अधिकार दिलवाए जा रहे हैं, योजनाओं को लागू करवाया जा रहा हैl

औरतों और लड़कियों को संपत्ति दिलवाने के लिए भी अभियान चल रहे हैंl सरकारी ज़मीन अगर किसी दंपत्ति को दी जा रही है तो पट्टा दोनों के नाम में देने की बात की जा रही है और दिया भी जा रहा हैl मई 2017 में पूरे दक्षिण एशिया में हमने एक अभियान शुरू किया जिसका नाम है प्रॉपर्टी फॉर हर या संपत्ति औरत की भीl इस अभियान के पीछे यही सोच है कि अगर बेटी को जायदाद नहीं दी जायेगी तो वह आत्मनिर्भर नहीं हो पाएगी और न ही हिंसा से बच पाएगीl आत्मनिर्भर बेटियाँ अपने माँ बाप का भी सहारा बन पाएंगी, अपने भाई बहनों की मदद कर पाएंगीl इस अभियान का एक मज़ेदार नारा है-

बेटी दिल में , बेटी विल में

अंत में मैं सिर्फ़ यही दोहराऊंगी कि “सिंगल” औरत की स्थिति बदलने के लिए ज़रूरी है औरत के लिए शादी के अर्थ पर पुनर्विचार करना, शादी को हर औरत की क़िस्मत न समझना, बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा कर सकने वाली शिक्षा और परवरिश देना और संपत्ति में बराबर का हिस्सा देनाl

और पढ़ें : खुद के दम पर आगे बढ़ती ‘अकेली औरत’


तस्वीर साभार : shethepeople

Kamla Bhasin is an Indian developmental feminist activist, poet, author and social scientist.

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