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शुरुआती समय में कबीलाई संघर्ष होते थे, जो सदस्यों की संख्या के बल के आधार पर जीते जाते थे। महिलाएं प्रजनन क्षमता के कारण सदस्यीय-संख्या में इज़ाफ़ा करती थीं, इसलिए दूसरे दल स्त्रियों पर हिंसा करके विरोधी दलों को कमज़ोर करने की कोशिश करते थे। इससे महिलाओं को दायरों में बांधकर घरों तक सीमित कर दिया गया। नतीजतन बाहरी क्षेत्र सीधे पुरुषों के दायरे में आया। पुरुषों की शारीरिक क्षमता भी उसी के अनुरूप विकसित हुई और क्रम-विकास की प्रक्रिया में वह आगे रहे। समाज में भी उनका ही प्रभुत्व रहा। इससे जितने भी विकास हुए, चाहे वह भाषा, दर्शन या विज्ञान में हुआ हो, सबमें पुरुष प्रभुत्व रहा, महिलाएं इससे बाहर ही रहीं। मानव जाति की विकास प्रक्रिया में भाषा का उद्भव महत्वपूर्ण चरण है। यह संचार का माध्यम है। भाषा संदेशों यानी विचारों के आदान-प्रदान में सहूलियत देती है। इन्हीं विचारों से सामाजिक मानक, नियम और कानून आदि निर्धारित होते हैं। पुरुष-प्रभुत्व वाले समाज में सब कुछ आदमी के परिप्रेक्ष्य से कहा गया। दरअसल, भाषा समाज से उपजी थी। समाज में पुरुष प्रभुत्व था, जिसके कारण भाषा भी पुरुष केंद्रित रही

इस संबंध में भाषाविद ‘जूलिक़ स्टेनली’ अपने भाषायी शोध में बताती हैं कि ‘मर्दवाद अचिह्नित अवधारणा है’ अर्थात उसका कोई सीमित दायरा नहीं है। संसार में, वह सब कुछ जो सिद्ध नहीं है, पुरुष परिप्रेक्ष्य से देखा जाता है। इसके उलट स्त्रीत्व ‘कुछ-और’ के रूप में चिह्नित है। उदाहरण के लिए ईश्वर, चाहे वह किसी भी समाज या संस्कृति में है, पुरुष है जबकि देवियां,जो चमत्कारिक शक्तियों को धारण तो करती है, वे भगवान के समानांतर नहीं है। वे भगवान के बाद हैं। असल में, समाज में पुरुष प्रभुत्व को स्त्री पर लागू करने के लिए भाषा एक माध्यम है, जिससे उसे चुप कराया जा सके, शोषित किया जाए या उसके अस्तित्व को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। इसके बाद ही पितृसत्ता जड़ तक स्थापित होती है।

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भाषा पर प्रभुत्व होने के कारण इतिहास, दर्शन व विज्ञान इत्यादि सब पुरुषों के हिसाब से विकसित हुए। उनके केंद्र में पुरुष स्वामित्व को जायज़ ठहराना सम्मिलित था। इसके कारण धर्म, संस्कृति और ज्ञान के सभी माध्यम पुरुषों द्वारा संचालित हुए, जिन्होंने सोचने के तरीके को प्रभावित किया। इसका प्रभाव जीवन शैली में दिखता है, जहाँ महिलाएं दोयम दर्जे तक धकेल दी गयी हैं। विश्व में किसी भी धर्म की प्रणेता स्त्री नहीं है। असल में, भाषा के बाद धर्म ही वह सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बना,जिसने स्त्री शोषण और विभेद को और अधिक बढ़ाया।

समाज में पुरुष प्रभुत्व को स्त्री पर लागू करने के लिए भाषा एक माध्यम है, जिससे उसे चुप कराया जा सके,शोषित किया जाए अथवा उसके अस्तित्व को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए।

भाषा ने लिंग को केवल बाइनरी में देखा। यह पारंपरिक रूढ़ मान्यताएं ही हैं जिसके कारण किसी तीसरे लिंग या अन्य लैंगिक पहचानों को महत्व नहीं दिया गया है। यह समाज के एक समूह को सीधे तौर पर खारिज़ कर देता है। असलियत में, इस पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के लिए संज्ञा और सर्वनाम अभिव्यक्ति पुरुषों के मुक़ाबले कम है। बहुत सारे पद केवल पुरुष अभिव्यक्ति करते हैं,जैसे- राष्ट्रपति,फायरमैन(अग्निशामक) या चैयरमैन(अध्यक्ष)। इसी तरह, तीसरे लिंग के लिए भी सर्वनाम नहीं हैं। कुछ समय पहले तक तो सरकारी दस्तावेजों तक में उनका उल्लेख नहीं होता था। अब ‘अन्य’ की श्रेणी में वे रखे जा रहे हैं।

दूसरे नारीवादी आंदोलन के बाद लगभग 1973 में भाषाविद रॉबिन लकॉफ ने ‘लैंग्वेज एंड वीमेंस प्लेस’ शीर्षक से एक लेख लिखा,जो ‘लैंग्वेज एंड सोसाइटी’ जर्नल में छपा। उन्होंने इस पितृसत्तात्मक समाज में भाषायी विश्लेषण करते हुए उन समस्याओं का अध्ययन किया जिससे महिलाएं रोज़ जूझ रही हैं। उन्होंने कहा कि भाषाई असंतुलन (Linguistics Imbalance) अध्ययन के योग्य है क्योंकि वे वास्तविक दुनिया के असंतुलन और असमानताओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। यह असंतुलन इस बात का प्रमाण है कि भाषाओं में बदलाव किए जाने चाहिए। असल में, महिलाओं को हमेशा से सीमित किया गया है। उन्हें बीच में टोककर रोकने, बात काटकर अपनी बात (पुरुष की बात) स्थापित करने, आश्रय देकर अपने आप को शक्तिशाली स्थापित करने और नकार दिए जाने की प्रक्रिया ऐतिहासिक रूप से सभी संस्कृतियों में चलती आयी है। आज भी महिलाओं को बहसों, भाषणों और समूहों या उन सभी संगठनों से अलग-थलग कर दिया जाता है, जो शक्ति संचालन में भागीदार हैं। आज भी महिलाएं उन शब्दों से लक्षित की जाती हैं जिनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में स्त्री-द्वेष,अपमान और शोषण निहित था। मिश्रित लिंगीय बहसों में रुकावट डालने और नकारने की प्रवृत्ति आज के भाषायी व्यवहार में निहित ढांचागत लैंगिग असमानता को दर्शाती है।

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सामाजिक संरचनाओं को तोड़कर नए बदलाव स्थापित करने के लिए बात-चीत और संवाद एकमात्र ज़रिया है। लेकिन अगर यह माध्यम ही शोषण को स्थापित करने वाला हो, तब पितृसत्ता का खात्मा मुश्किल जान पड़ता है। दुनिया की लगभग 75 फ़ीसद भाषाएँ सेक्स-आधारित प्रणाली का उपयोग करती हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर पुरुष सर्वनामों का प्रयोग होता है। ये सर्वनाम स्पष्ट रूप से ‘जेंडर बाइनरी’ दर्शाते हैं, जो लिंग को दो रूपों को मान्यता देता है, जिससे कई अन्य लिंगों के अस्तित्व की अनदेखी होती है। इसके साथ ही, सभी महत्वपूर्ण शब्दकोशों,सोशल मीडिया साइट्स के अधिकतर कर्मचारी पुरुष है, विश्व की लगभग सभी भाषाओं के लेखकों में पुरुषों की संख्या ज़्यादा है। इनमें से अधिकतर समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच को पोषित करते हैं जिससे एक जटिल चक्र के रूप में विचार दूसरे लोगों तक पहुंचते हैं और पितृसत्तात्मक ढांचे बने रहते हैं। इस संबंध में रैडिकल नारीवादियों का विचार जान लेना ठीक रहेगा। उनके अनुसार, संस्कृति, धर्म, भाषा और ज्ञान के स्रोतों पर पुरुष प्रभुत्व के कारण उसके पास यह एजेंसी होती है कि वह जनमानस क्या सोचेगा, वह तय कर पाता है।

इस ऐजेंसी पर उसके प्रभुत्व, एकाधिकार को तोड़कर और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाकर भाषायी परिवर्तन और लैंगिक समानता की मांग की जानी चाहिए। साथ ही भाषाओं का पुनः निर्माण कर उनमें शोषण और विभेद खत्म होने चाहिए जिससे समाज का प्रत्येक समूह अपने आप को भाषा से जोड़ पाए। इन सब में 70 के दशक के बाद से लगातार नारीवादियों ने अकादमिक जगत में बदलाव लाने का प्रयास किया है जिससे नई पीढ़ी शोषण के इन स्तरों को जान पाए और आगे बदलाव संभव हो। अब धीरे-धीरे इस ओर लोगों को ध्यान बढ़ रहा है। बहुत सारे ‘जेंडर न्यूट्रल’ शब्दों की खोज हो रही है और उन्हें व्यवहार में लाया जा रहा है। यह परिवर्तन सभी भाषाओं में बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए, तब ही पितृसत्तात्मक दायरों का खात्मा होगा।

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तस्वीर साभार : telegraphindia

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