FII Hindi is now on Telegram

जिस देश में शादी ही औरत की जिंदगी का मकसद होता है उस देश में विधवा होने का मतलब होता है जीवन का निरर्थक हो जाना। जिस देश में पति परमेश्वर होता है, उस देश में विधवा होने का मतलब होता है भगवान का आसरा छूट जाना। जिस देश में औरत की ख़ुशी इस पर निर्भर करती है कि उसका पति उससे खुश है कि नहीं, उस देश में विधवा होने का मतलब होता है बिना खुशियों के जीवन जीना सीख लेना। जिस देश में शादी के बाद ससुराल ही नया घर होता है, उस देश में विधवा होने का मतलब होता है बेघर हो जाना। हमने अपने आस-पास कई ऐसी महिलाओं को देखा होगा जिनके पति की मौत के बाद उनके साथ अपने परिवार और समाज द्वारा कैसे भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है। आज हम ऐसे ही कुछ बातों की चर्चा इस लेख में कर रहे हैं।

पति की मौत के बाद अधिकतर ससुराल वाले अपनी विधवा बहू की कोई कदर नहीं करते। उसकी आवाज़ दबाने की कोशिश करते हैं। अक्सर ससुराल वाले विधवा बहू से रिश्ता ही खत्म कर देते हैं, उसे हमेशा के लिए मायके भेज देते हैं, कोशिश करते हैं कि विधवा बहू और उसके बच्चों को को उनके मृत बेटे की सम्पति में कोई हिस्सा न मिले। यह व्यवहार तभी बदल पाता है अगर उनके मृत बेटे का कोई बेटा हो जो उनके खानदान का ‘वारिस’ बन सके। यहां भी स्त्री को इज्ज़त पाने के लिए एक पुरुष पर आश्रित होना पड़ता है फिर भले ही वो उसका बेटा ही क्यों न हो। बावजूद इसके, परिवार के ज़रूरी कार्यक्रम, त्योहार, शादी आदि में विधवा बहू को शामिल नहीं किया जाता। हम भले साल 2020 में जी रहे हो लेकिन समाज की सोच आज भी वही है।

और पढ़ें : डियर शुभचिंतक रिश्तेदार, किसने दी आपको मेरी शादी की चिंता ?

पति की मौत के बाद औरत की दोबारा शादी कोई मुद्दा ही नहीं होता। समाज यह मानता ही नहीं है कि एक विधवा औरत की भी सेक्सुअल नीड्स हो सकती हैं।

आर्थिक रूप से भी महिलाओं के जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं आती हैं अगर वे खुद आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होती। खास तौर पर उन महिलाओं के लिए जो अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए पूर्ण रूप से अपने पति पर आश्रित होती है। ऐसी महिलाओं के लिए जीवन यापन करना भी एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है। ऐसे में अगर उनके मायके वालों का सहयोग न हो या वे खुद पैसे न कमाती हो, तो उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो जाता है। इसीलिए हर बार यह कहा जाता है कि महिलाओं का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना बेहद ज़रूरी होता है। लेकिन आर्थिक निर्भरता के सफ़र में भी उन्हें लैंगिक भेदभाव और असमानता से होकर गुज़रना पड़ता है।

Become an FII Member

पति की मौत के बाद औरत की दोबारा शादी कोई मुद्दा ही नहीं होता। समाज यह मानता ही नहीं है कि एक विधवा औरत की भी सेक्सुअल नीड्स हो सकती हैं। क्या पति के मरने के बाद औरत की सेक्सुअल जरूरतें भी खत्म हो जाती हैं? सिर्फ यही क्यों, क्या एक अकेली विधवा औरत को एक साथी की ज़रूरत नहीं होती जिसके साथ वह खुलकर अपने मन की सारी बातें साझा कर सके। विधवा पुनर्विवाह पर बातचीत तो शुरू हुई है हमारे समाज में लेकिन अभी भी अधिकतर विधवाएं पुनर्विवाह के लिए हिम्मत और साहस नहीं जुटा पाती। हमारे परिवार और समाज का माहौल भी विधवा पुनर्विवाह के प्रति आज भी एक सकारात्मक रवैया नहीं रखता। अकेलेपन के डर से विधवा के बच्चों का ब्याह ज़रूरी होता है, लेकिन विधवा का नहीं। क्या अकेलापन सिर्फ जवानों को खाता है, अधेड़ उम्र और बूढ़े लोगों को अकेलापन नहीं खाता?

और पढ़ें : तलाकशुदा और विधवा महिलाओं के जीवन को नियंत्रित करता परिवार और समाज

हमारे देश में एक शादीशुदा महिला को ही इस लायक समझा जाता है कि वह सारे रीती रिवाजों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले सके। इसका नतीजा ये होता है कि शादी ब्याह हो या पूजा के काम हो, विधवाओं को ऐसे कार्यक्रमों में आगे आने नहीं दिया जाता है या शामिल ही नहीं किया जाता। यही नहीं, पति के मरने के बाद भारतीय समाज के मुताबिक, एक औरत ‘अपशकुनी’ हो जाती है, उससे तैयार होने का, सजने-संवरने का अधिकार छीन लिया जाता है, उसे मजबूर किया जाता है अपनी इच्छाओं को मारकर एक ‘सादा’ जीवन जीने के लिए। और जो औरत इस प्रकार का ‘सादा’ जीवन नहीं जीती, उसका ‘बहिष्कार’ कर दिया जाता है उसी के रिश्तेदारों, समाज और परिवार के द्वारा।

अगर कोई विधवा अपना जीवन एक बार फिर से शुरू करना भी चाहे तो समाज पूरी ताकत लगा देता है उसे रोकने की। अब क्या करना है पढ़-लिख कर, क्यों करनी है नौकरी, क्यों करना है अपना कुछ और काम और न जाने ऐसे कितने सवाल।  ये सब सिर्फ सवाल नहीं होते बल्कि हमारी एक गहरी मानसिकता को जाहिर करते है जो ये है कि एक औरत को शादी के बाद जीवन खत्म कर देना चाहिए और जीवन में मतलब ढूंढ़ने कि कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। और फिर मतलब ढूंढ़ना ही है तो अपने बच्चों में ढूंढे, अपना ‘अस्तित्व’ बनाने की ज़रूरत क्या है? हमारे समाज को अपना अस्तित्व ढूंढ़ती हुई विधवा महिलाएं रास नहीं आती। अगर हमारा समाज इतना ही प्रगतिशील होता तो आज भी वृंदावन में विधवा आश्रम नहीं चल रहे होते।

और पढ़ें: शादी ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिष्ठा का सवाल है| नारीवादी चश्मा


तस्वीर साभार : Zeke Films

Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

She may be contacted at sonaliandkhatri@gmail.com.

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply