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सदियों से समाज ने महिलाओं की ख़ुशी का आधार ‘पति के साथ’ को बना दिया है। तलाक होने या पति की मौत होने पर महिलाओं से समाज उम्मीद रखता है कि महिलाएं दुखी रहें। लड़कियों को बचपन से यह स्वीकार करने के लिए तैयार किया जाता है कि पति के बिना एक महिला अधूरी और असहाय है। इस तरह परिवार और समाज महिलाओं को यह बताने की कोशिश करते हैं कि साथी के साथ जीने और मरने के अलावा किसी महिला का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। महिलाओं की अपनी कोई वैकल्पिक दुनिया नहीं है। महिलाओं की पूरी दुनिया उनका घर, साथी और बच्चे ही हैं। सभी को महत्व देना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सुनिश्चित करना कि एक की अनुपस्थिति में दूसरे का कोई अस्तित्व ही नहीं है, यह एक समस्या है। अधिकतर परिवारों में यह देखने को मिलता है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की फिर से शादी नहीं होती। तलाकशुदा और विधवा महिला का जीवन परिवार और समाज द्वारा रूढ़िवादी तरीकों से ही संचालित किया जाता है।

पति के न होने पर महिलाओं का अस्तित्व नहीं है यह समझने के लिए हमें इस पर ध्यान देना होगा कि हमारे समाज में तलाकशुदा पुरुषों और जिन पुरुषों के साथी की मौत हो गई है उनकी क्या स्थिति है। जब किसी पुरुष के साथी का साथ छूटता है तो परिवार और समाज कहता है कि पुरुष अब अपना जीवन अकेले कैसे जी पाएगा। महिला के साथी की मौत होने पर शायद ही यह सोचा जाता है कि वह फिर से अपना साथी चुनें। साथी की मौत के बाद महिला से उम्मीद की जाती है कि वे अकेले जीवन जीएं। यह महिलाओं पर समाज द्वारा किया जाने वाला मानसिक शोषण है। यदि हम साथी के न होने पर महिलाओं की दूसरी शादी में लागू सामाजिक प्रतिबंधों का विश्लेषण करते हैं तो यह समझ में आता है कि समाज महिलाओं की सेक्सुअलिटी पर नियंत्रण करना चाहता है। समाज ये मानता है कि एक बार शादी होने पर और संबंध बनने पर महिला अपवित्र हो जाती है। पुरुषों के लिए इस पितृसत्तात्मक समाज में अपवित्रता की अवधारणा नहीं है। समाज में पुरुषों का फिर से साथी चुनना सहज है। 

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पितृसत्तात्मक संरचना में तलाकशुदा और विधवा महिलाओं को फिर से शादी करने की अनुमति नहीं है क्योंकि महिलाएं बच्चों की देखभाल कर सकती हैं, वो खाना बना सकती हैं, घर का ध्यान रख सकती हैं। लेकिन पुरुष एक महिला के साथ न होने पर बच्चों की देखभाल नहीं कर सकते हैं, खाना नहीं बना सकते हैं, घर का ध्यान नहीं रख सकते हैं। इस प्रकार एक महिला का अस्तित्व पुरुष और परिवार की ज़रूरत को पूरा करने के इर्द-गिर्द रह जाता है। यह दर्शाता है कि परिवार और समाज की पितृसत्तात्मक संरचना ने महिलाओं और उनके जीवन को किस तरह दूसरों की ज़रूरतों के हवाले कर दिया है।

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परिवार और समाज महिलाओं को यह बताने की कोशिश करता है कि साथी के साथ जीने अथवा मरने के अलावा किसी महिला का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। महिलाओं की अपनी कोई वैकल्पिलक दुनिया नहीं है।

तलाकशुदा और विधवा महिलाओं की शादी के बाद अगर कोई संतान नहीं है तब शायद शादी की कुछ गुंजाइश होती है, लेकिन उनके लिए विकल्प के तौर पर वही पुरुष होता है जो या तो तलाकशुदा हो या उसके साथी की मौत हो गई हो। पुरुष के साथी की मौत होने पर उनका फिर से किसी अनब्याही महिला के साथ विवाह होना सामान्य तरीके से देखा जाता है। इस स्थिति में हमारा समाज और परिवार ‘विवाह के बाद महिलाएं अशुद्ध हैं’ इस परिकल्पना को सही ठहराते हुए दिखते हैं। शादी के बाद यदि महिला तलाकशुदा है या विधवा है तो महिला का अकेले रहना सहज मान लिया जाता है। यह भी कहा जाता है कि यह महिला की नियति में है, लड़की ही अभागिनी है, कुलक्षिणी है, डायन है, अशुभ है जबकि पुरुषों के बारे में ऐसे कोई विशेषण नहीं प्रयोग किए जाते हैं। इन विशेषणों का प्रयोग में लाया जाना और महिला के जीवन को ‘पति’ के बिना व्यर्थ कहना महिलाओं के सामाजिक और राजनीतिक जीवन को ‘पति के साथ और शादी’ तक नियंत्रित करता है।

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बदलती रहती हैं समाज की महिलाओं से उम्मीदें

जब तक किसी महिला का साथी जीवित होता है तो महिला का परिवार उससे उम्मीद रखता है कि महिला स्वभाव से शांत, कोमल और भावुक हो। कभी-कभी तो अगर साथी की आय अच्छी है तो महिलाओं को नौकरी छोड़ने के लिए भी मजबूर किया जाता है। अचानक साथी की मौत होते ही पूरा परिवार उसी महिला से तुरंत यह उम्मीद करने लगता है कि उन्हें मजबूत होना चाहिए, अब सब कुछ महिला की जिम्मेदारी है, यदि वो कमज़ोर हो गईं तो आगे कैसे चलेगा। अब घर-बाहर सब महिला को ही संभालना है। समाज और परिवार के लोग ही तलाकशुदा या साथी की मौत पर महिलाओं को तरह-तरह से ताना देते हैं, कहते हैं -‘शादी किस्मत का खेल है, तुम्हारी किस्मत ही खराब है’, ‘डोली में आना और अर्थी में पति के घर से विदा लेना ही औरत का सौभाग्य है’, ‘पति की मौत होने का मतलब है अब औरत के जीवन का कोई मतलब नहीं है’, ‘तलाकशुदा औरत होने से बेहतर है मर जाना’।

शादी एक ऐसी संस्था है जिसमें शादी के बाद संतान होने की उम्मीद परिवार को सामान्य लगती हैं। इसलिए जब तक महिला बच्चों को जन्म नहीं देती तब तक बच्चे न होने की वजह से अपमानित की जाती है। यदि बच्चा होने के बाद तलाक या साथी की मौत हो गई तो महिला की शादी होना इसलिए मुश्किल हो जाती है क्योंकि महिला ‘मां’ है। इस तरह अगर हम देखें तो समाज और परिवार ने महिलाओं के जीवन के लिए एक ऐसा घेरा बनाया हुआ है जिसमें पहले से ही बहुत सारे मानदंड हैं। महिला का विधवा या तलाकशुदा होना समाज में एक ‘सोशल स्टिग्मा’ है। जो महिला के अस्तित्व को साथी की मौत होने या अलग होने के बाद ‘पति रहित या पति बिन’ की पहचान देता है। 

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भारत के कई हिस्सों में साथी की मौत होने अथवा तलाकशुदा होने के बाद यदि महिला शादी नहीं करती तो उनको रंगीन कपड़े, रंगीन चूडियां, बिंदी, पायल आदि का त्याग करना होता है। विधवा होने पर सफ़ेद और काला रंग महिला के हर दिन के कपड़ों में शामिल हो जाते हैं। महिलाएं किसी शादी-ब्याह या दूसरे त्योहारों में भी अपनी मर्ज़ी से कपड़े नहीं पहन सकती। अगर महिलाएं लाल, गुलाबी, नीला या किसी दूसरे गहरे या चमकीले रंग के कपड़े पहनकर घर-परिवार के किसी कार्यक्रम में जाती हैं तो महिलाओं के परिवार वाले उन पर टिप्पणी और तंज कसने लगते हैं। कुछ तीज- त्योहारों में उनका शामिल होना भी अशुभ माना जाता है।

तलाकशुदा या विधवा महिलाओं का किसी पुरुष से बात करना भी परिवार वालों को अच्छा नहीं लगता है। यदि महिला किसी पुरुष से बातचीत करती हैं तो परिवार वाले महिला को ‘चरित्रहीन’ कहने लगते हैं। कई परिवार महिला को साथी के बिन रहने के लिए बाध्य करते हैं, साथ ही महिला की मोबिलिटी को सीमित करने लगते हैं। कोई पुरुष मित्र जब महिला के घर मिलने आता है तो परिवार वाले मोरल पोलिसिंग करते हैं, महिला की यौनिकता और उनके अकेलेपन को जोड़कर देखते देते हैं। जबकि महिलाएं तो स्वयं विधवा और तलाकशुदा होने की वजह से इस समाज से हर दिन लड़ती है और जीवन जीती हैं।

एक महिला जिसका साथी अब दुनिया में नहीं है वो क्यों दुनिया से विरक्त और दुखी जीवन जीने को मजबूर है। क्यों उस महिला को भी शादी या अपनी मर्ज़ी से जीवन जीने की आज़ादी नहीं है। जन्म से पहले ही महिलाओं के जीवन में सब कुछ निर्धारित कर देना कहाँ तक सही है। विधवा विवाह कानून होने के बाद भी कितनी महिलाएं हैं जो फिर विवाह करती हैं या उनको शादी करने की स्वतंत्रता है। क्यों महिला को तलाकशुदा या विधवा होने के बाद दया और हीन भावना के साथ देखा जाता है। क्यों उनके जीवन को बेरंग और खामोश बना दिया जाता है। मेरा मानना है कि यदि सचमुच हम महिलाओं के जीवन का आदर करते हैं, तो महिलाओं की ख़ुशी का पैमाना पुरुष के साथ को नहीं बनाना चाहिए। यह महिलाओं के जीवन के आधार को संकुचित कर देता है। एक स्वस्थ और सुखी परिवार के लिए यह ज़रुरी है कि महिलाओं को सुनें, समझे और उनको आज़ाद रहने दें। साथी के न होने पर महिलाएं किस तरह का जीवन जीना चाहती हैं, यह महिलाओं को ही तय करने दें।

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तस्वीर साभार : nationalheraldindia

Ritika Srivastava has completed her M.Phil. in Education from Tata Institute of Social Sciences, Hyderabad. Presently She is pursuing Ph.D. in Education from the same institute. After M.Phil., She worked in the Regional Institute of Education (NCERT) Bhopal as Assistant Professor in Education. She likes to work with children and teachers. She likes to read, write, and discuss contemporary equity and equality issues of education and society.

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2 COMMENTS

  1. Moreover it is difficult to change the mindset because the females themselves have made their lives centred around their husbands and kids and not agreeing to change the taboo.

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